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भगवान के प्रति सच्ची आराधना से मिलता है विशेष फल
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अंबाला सिटी। भगवान भोले शंकर की सच्चे मन से आराधना करने से विशेष फल की प्राप्ति निश्चित है। भोले शंकर ने भक्ति से प्रसन्न होकर असुरों व राक्षस प्रजातियों के न जाने कितनों लोगों को वरदान दिए हैं। उन्हें भलि भांति मालूम था कि यह राक्षस प्रजातियां ऋषि मुनियों आदि को परेशान करेगें, लेकिन भोले शंकर ने अपनी भक्ति के भाव में उनको वरदान दिए। यदि भक्त चाहे तो भगवान भोले शंकर की नित समय आराधना कर हर प्रकार से सांसारिक सुखों का आनंद ले सकता है। उसमें भगवान के प्रति लगन होनी चाहिए। उपरोक्त शब्द कथा व्यास आचार्य सनातन चैतन्य महाराज ने सिटी के मानव चौक स्थित श्रीकृष्ण मंदिर व श्रीगोपीनाथ सतसंग भवन में चल रही श्रीमद्भागवत सप्ताह अमर कथा में कहे।
तीसरे दिन मंगलवार को कथा के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए आचार्य सनातन चैतन्य महाराज ने कहा कि मनु सतरूपा की पांच संतान थी। इनमें तीन पुत्री अकूति, देवहूति और प्रसूति व दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। प्रजापति दक्ष की सोलह कन्याओं में सती सबसे छोटी थी। उनका विवाह भगवान शंकर से किया गया था। दक्ष प्रजापति भगवान शंकर के प्रति विरोध का भाव रखते थे। वे भगवान शंकर जी को अपमानित करने के लिए कनखल हरिद्वार में विशाल यज्ञ का कार्यक्रम रखते हैं। जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित करते हैं पर भगवान शंकर को नहीं बुलाते।
इस बात का जब सती को पता चला तो वे यज्ञ में जाने की जिद करती हैं। भगवान शंकर ने सती को बहुत समझाया कि तुम्हारे पिता हमसे बहुत विरोध करते हैं, वहां जाना हितकारी नहीं होगा, लेकिन सती नहीं मानतीं और यज्ञ कार्यक्रम में चली जाती हैं। वहां कुछ लोगों ने सती का सम्मान नहीं किया। वहीं, भगवान शंकर की निंदा भी हो रही थी, जिसको देखकर सती सहन नहीं कर पाई। उन्होंने विचार किया कि दक्ष प्रदत्त शरीर शिव लायक नहीं है। वे भगवान शंकर का ध्यान करते हुए अग्नि में भस्म हो जाती हैं। बाद में वही सती हिमवान-मैना यहां पार्वती के रूप में अवतरित होती हैं। जिसका भगवान शंकर से पुन: विवाह होता है।
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कथा में विशेष रूप से भगवान शंकर तांडव नृत्य का कार्यक्रम रखा गया। जिसमें कैथल से आए अनुभवी कलाकार विकास कुमार की टीम ने भगवान भोले शंकर जी की सुंदर झांकियां प्रस्तुत की। कथा के समापन पर सभी भक्तों ने श्रीमद्भागवत पुराण की आरती की व प्रसाद ग्रहण किया। इस मौके पर जयप्रकाश गर्ग, अरुणा गर्ग, मास्टर गजेन्द्र सिंह राणा, जगदीप सिंह राठौर, दलीप कौर, सत्या देवी धीमान, राजकुमार, राजिन्द्र कुमार, सूरज प्रकाश गोयल, सरोज बाला शर्मा, पाल बहन आदि मौजूद रहे।
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तीसरे दिन मंगलवार को कथा के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए आचार्य सनातन चैतन्य महाराज ने कहा कि मनु सतरूपा की पांच संतान थी। इनमें तीन पुत्री अकूति, देवहूति और प्रसूति व दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। प्रजापति दक्ष की सोलह कन्याओं में सती सबसे छोटी थी। उनका विवाह भगवान शंकर से किया गया था। दक्ष प्रजापति भगवान शंकर के प्रति विरोध का भाव रखते थे। वे भगवान शंकर जी को अपमानित करने के लिए कनखल हरिद्वार में विशाल यज्ञ का कार्यक्रम रखते हैं। जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित करते हैं पर भगवान शंकर को नहीं बुलाते।
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इस बात का जब सती को पता चला तो वे यज्ञ में जाने की जिद करती हैं। भगवान शंकर ने सती को बहुत समझाया कि तुम्हारे पिता हमसे बहुत विरोध करते हैं, वहां जाना हितकारी नहीं होगा, लेकिन सती नहीं मानतीं और यज्ञ कार्यक्रम में चली जाती हैं। वहां कुछ लोगों ने सती का सम्मान नहीं किया। वहीं, भगवान शंकर की निंदा भी हो रही थी, जिसको देखकर सती सहन नहीं कर पाई। उन्होंने विचार किया कि दक्ष प्रदत्त शरीर शिव लायक नहीं है। वे भगवान शंकर का ध्यान करते हुए अग्नि में भस्म हो जाती हैं। बाद में वही सती हिमवान-मैना यहां पार्वती के रूप में अवतरित होती हैं। जिसका भगवान शंकर से पुन: विवाह होता है।
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कथा में विशेष रूप से भगवान शंकर तांडव नृत्य का कार्यक्रम रखा गया। जिसमें कैथल से आए अनुभवी कलाकार विकास कुमार की टीम ने भगवान भोले शंकर जी की सुंदर झांकियां प्रस्तुत की। कथा के समापन पर सभी भक्तों ने श्रीमद्भागवत पुराण की आरती की व प्रसाद ग्रहण किया। इस मौके पर जयप्रकाश गर्ग, अरुणा गर्ग, मास्टर गजेन्द्र सिंह राणा, जगदीप सिंह राठौर, दलीप कौर, सत्या देवी धीमान, राजकुमार, राजिन्द्र कुमार, सूरज प्रकाश गोयल, सरोज बाला शर्मा, पाल बहन आदि मौजूद रहे।