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दशहरे तक चलने वाला सांझी पर्व शुरू, नवरात्र तक नौ रूपों में होगी पूजा
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The Sanjhi festival, which continues till Dussehra, will be worshiped in nine forms till Navratri
- फोटो : Ambala
(अंबाला) बराड़ा। दशहरे तक चलने वाला सांझी पर्व शुरू हो चुका है। जहां गांवों में हाथों से मिट्टी की सांझी बनाकर गोबर से दीवार पर लगाई जाती है, वहीं शहरों में आज के समय में बाजार से बनी मूर्तियों का प्रयोग किया जाता है। सांझी लगाने के बाद प्रतिदिन पूजा कर भोग लगाया जाता है। दस दिनों तक शाश्वत चलने वाली क्रिया का अंत दशहरे पर होता है। सांझी को देवी मां की संज्ञा दी जाती है जो नवरात्रों में नौ रूपों में पूजी जाती है।
ग्रामीण क्षेत्र में तो सांझी बच्चों के लिए मनोरंजन का अच्छा साधन भी होता है, क्योंकि बच्चे भी इसे बनाने में ज्यादा रुचि लेते हैं। भाद्रपद अमावस्या के दिन ग्रामीण कस्बों में परिवार के सभी लोग मिलकर मिट्टी, गोबर, चूड़ी के टुकड़े, कपड़ों की कतरन व कई साजो-सामान से देवी मां की झलक देने वाली सांझी दीवार पर बना देते हैं। तत्पश्चात प्रतिदिन शाम के समय सांझी की पूजा की जाती है। इसके बाद भोग लगाया जाता है व मंगल गीत गाए जाते हैं। इसके साथ ही पहले नवरात्र पर ही जौं भी उगाए जाते हैं।
सांझी के निर्माण में महिलाएं व बच्चे अपनी बुद्धि व कौशल का परिचय देते हैं। जिस प्रकार सांझी मां के हाथ व पैरों को सजाया और संवारा जाता है। यह अनोखी कलाकारी मन को मोह लेती है। भोजन कराने की क्रिया आश्विन शुक्ल दशमी अर्थात दशहरे से एक दिन पहले तक चलती है। दशहरे से एक दिन पहले सांझी को भोजन कराकर सांझी को तालाब व नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। वहां पर मीठा भोजन भी कराया जाता है। वर्षों से यह अनोखी परंपरा चली आ रही है। इस पर्व को बड़े ही जोश से मनाया जाता है। एक ओर जहां रामलीला का मंचन चलता है, ठीक उधर बच्चों का सांझी का पर्व धूमधाम से चलता है।
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क्यों करते हैं नौ दिन पूजा
पंडित देव शास्त्री बताते है कि सांझी भाद्रपद की अमावस्या को लगाई जाती है। मां जगदंबा के नौ रूप होते हैं। इसीलिए प्रतिदिन सांझी के रूप में मां के एक रूप को पूजते हुए उसे भोग लगाते हैं और बाद में स्वयं खाना खाते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस पर्व से धार्मिक आस्था को भी बढ़ावा मिलता है।
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ग्रामीण क्षेत्र में तो सांझी बच्चों के लिए मनोरंजन का अच्छा साधन भी होता है, क्योंकि बच्चे भी इसे बनाने में ज्यादा रुचि लेते हैं। भाद्रपद अमावस्या के दिन ग्रामीण कस्बों में परिवार के सभी लोग मिलकर मिट्टी, गोबर, चूड़ी के टुकड़े, कपड़ों की कतरन व कई साजो-सामान से देवी मां की झलक देने वाली सांझी दीवार पर बना देते हैं। तत्पश्चात प्रतिदिन शाम के समय सांझी की पूजा की जाती है। इसके बाद भोग लगाया जाता है व मंगल गीत गाए जाते हैं। इसके साथ ही पहले नवरात्र पर ही जौं भी उगाए जाते हैं।
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सांझी के निर्माण में महिलाएं व बच्चे अपनी बुद्धि व कौशल का परिचय देते हैं। जिस प्रकार सांझी मां के हाथ व पैरों को सजाया और संवारा जाता है। यह अनोखी कलाकारी मन को मोह लेती है। भोजन कराने की क्रिया आश्विन शुक्ल दशमी अर्थात दशहरे से एक दिन पहले तक चलती है। दशहरे से एक दिन पहले सांझी को भोजन कराकर सांझी को तालाब व नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। वहां पर मीठा भोजन भी कराया जाता है। वर्षों से यह अनोखी परंपरा चली आ रही है। इस पर्व को बड़े ही जोश से मनाया जाता है। एक ओर जहां रामलीला का मंचन चलता है, ठीक उधर बच्चों का सांझी का पर्व धूमधाम से चलता है।
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क्यों करते हैं नौ दिन पूजा
पंडित देव शास्त्री बताते है कि सांझी भाद्रपद की अमावस्या को लगाई जाती है। मां जगदंबा के नौ रूप होते हैं। इसीलिए प्रतिदिन सांझी के रूप में मां के एक रूप को पूजते हुए उसे भोग लगाते हैं और बाद में स्वयं खाना खाते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस पर्व से धार्मिक आस्था को भी बढ़ावा मिलता है।