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सीता हरण के साथ अहंकारी रावण के अंत का हुआ प्रारंभ

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 02 Apr 2022 01:45 AM IST
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The end of the arrogant Ravana began with the abduction of Sita
अंबाला सिटी। अहंकारी रावण के अंत का उल्लेख भगवान विष्णु अवतार श्रीराम जी ने उस वक्त लिखा था, जब वह लक्ष्मी स्वरूप माता सीता का धोखे से हरण कर ले गया था। उस दौरान भगवान की लीला अनुसार ही पूरा कार्य चल रहा था। रावण में पनप रहे अहंकार के कारण ही यह सब हुआ। एक समय वह भी था कि जब लोग रावण को एक बुद्धिमान व्यक्तित्व के नाम से जानते थे। उपरोक्त शब्द सिटी के सेक्टर सात स्थित श्री महादेव नीलकंठ मंदिर में चल रहे सामूहिक श्री 108 रामायण पाठ के दौरान मंदिर पुरोहित पंडित भगवती प्रसाद ने कहे।
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कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए पंडित भगवती प्रसाद ने अनसुइया माता द्वारा सीता माता को पतिव्रता होने की कहानी सुनाई। शूर्पणखा व लक्ष्मण संवाद के बारे में व्याख्यान करते हुए उन्होंने बताया कि लक्ष्मण के पास जाकर शूर्पणखा ने विवाह का प्रस्ताव रखा, लेकिन लक्ष्मण ने उन्हें मना कर दिया और राम के पास जाने के लिए कहा। भगवान श्रीराम ने उसे समझाया कि देवी आप यहां से वापस लौट जाएं। वह समझने को बिल्कुल भी तैयार नहीं थी। तब लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काट दी थी। इस बात से क्रोधित होकर शूर्पणखा अपने भाई खर के पास गईं। खर ने राम और लक्ष्मण को मारने के लिए राक्षस भेजे, लेकिन श्रीराम ने सभी राक्षसों का वध कर दिया।
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इसका समाचार शूर्पणखा ने अपने भाई रावण को जाकर सुनाया तो रावण क्रोधित हो उठा। शूर्पणखा ने ही रावण को सीता के बारे में बताते हुए उसको लंका की महारानी बनाने के लिए प्रेरित कर दिया। इस पर रावण ने भगवान श्रीराम व लक्ष्मण को धोखे से वनों के रास्ते पर निकाल दिया और सीता माता को साधु की वेषभूषा धारण कर भिक्षा मांगते हुए माता सीता का हरण कर लिया। रावण आकाश मार्ग के रास्ते से सीता माता को लंका में ले गया। इसी बात से दुखी होकर भगवान श्रीराम व लक्ष्मण माता सीता को ढूंढने के लिए निकल पड़ते हैं।
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इसी दौरान श्रीराम व लक्ष्मण मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचे। वहां आश्रम में वृद्धा शबरी भक्ति में लीन थी। मतंग ऋषि अपने तप व योग के बल पर अन्य ऋषियों सहित दिव्यलोक पहुंच चुके थे। ऋषि मतंग ने शबरी से एक अपेक्षित घड़ी में कह दिया था कि श्रीराम तुम्हारी कुटिया में आएंगे। जहां शबरी प्रतिदिन भगवान श्रीराम के आने का इंतजार करने लगी। वह आए दिन वनों से फलों की अनगिनत टोकरियां भरकर रखने लगी और पथ राह निहारती रही। प्रतीक्षा में शबरी स्वयं प्रतीक्षा का प्रतिमान हो जाती हैं।

एक दिन जब शबरी को पता चला कि भगवान श्रीराम स्वयं उसके आश्रम की ओर आ रहे हैं तो वह एकदम भावविभोर हो उठी और ऋषि मतंग की ओर से दिए गए आशीर्वाद को स्मरण करके गदगद हो गईं। वह दौड़कर प्रभु श्रीराम के चरणों से लिपट गईं। इसी प्रसंग के साथ कथा को विराम दिया गया। कथा से पूर्व पंडित धमेंद्र गौड व पंडित त्रिलोचन शर्मा की ओर से विधिपूर्वक कथा व्यास का पूजन करवाया गया। कथा का शुभारंभ संगीतमय गणेश वंदना प्रारंभ करके किया गया। कथा के समापन पर सभी भक्तजनों ने आरती की व प्रसाद ग्रहण किया।
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