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पाकिस्तान में हुआ अंबाला के ‘चांद’ का दीदार
अंबाला
Updated Tue, 24 Sep 2013 11:24 PM IST
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अंबाला के उर्दू अदीब महेंद्र प्रताप ‘चांद’ पर पाकिस्तान की मशहूर व पुरानी पत्रिका ‘चहारसू’ (चारों ओर) ने विशेषांक प्रकाशित किया है।
यह विशेषांक पूरे पाकिस्तान में चर्चा का विषय बना हुआ है। वहीं इसमें दोनों देशों के राजनीतिक, साहित्यिक और सामाजिक हालात पर एक विस्तृत साक्षात्कार लेख के रूप में प्रकाशित किया गया है।
इसके अलावा ‘चांद’ के कुछ लेख, दस गजलें व दस नज्में, पत्र व टिप्पणियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है।
विशेषांक में इस बात पर जोर दिया है कि दोनों देशों की आवाम अमन चाहती है।
टेंशन सिर्फ राजनीतिक स्तर पर है। इसलिए दोनों देशों की रियासतों को चाहिए कि वे सामाजिक संबंधों को मजबूत करने में जोर दें।
उन्होंने कहा कि दोनों देशाें के साहित्यकार भी संबंधों को मजबूत बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभाएं। इसके लिए जरूरी है कि दोनों देशों में साहित्यकारों की रचनाओं को एक-दूसरे देशों में प्रकाशित करवाने की अनुमति दी जाए। ताकि दोनों देशों के साहित्यकारों की ओर से ‘अमन’ के लिए किए गए प्रयास को आवाम तक पहुंचें।
लेख पाक में बना चर्चा का विषय
विशेषांक में महेंद्र प्रताप ‘चांद’ के लेख ‘इंसानियत’ कभी मर नहीं सकती’ को बेहद प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। इसमें ‘गदर’ के दौरान दोनों देशों में हुई ऐसी घटनाओं का हवाला दिया गया है, जो बेहद मार्मिक है। इसमें चांद साहब ने बताया है कि जब वे गदर के दौरान पाकिस्तान के जिला लइया स्थित करौड़ लाल ईसन कस्बे से सभी हिंदू परिवारों के साथ भारत आ रहे थे, तो दंगाइयों ने सभी को मारने की चेतावनी दे दी थी।
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मगर उस वक्त वहां एक मुसलमान थानेदार ने वहां सभी हिंदू परिवारों से वादा किया था कि हिंदू परिवार घबराएं मत, उन्हें सकुशल भारत भिजवाया जाएगा। दंगाइयों से जूझते हुए उस मुसलमान थानेदार ने सभी हिंदू परिवार को ट्रेन में चढ़वाया। जबकि छह मुसलमान धोबियों ने सभी का सामान ट्रेनों में चढ़ाया।
एक अन्य घटना का जिक्र करते हुए चांद साहब ने लेख में बताया कि पंजाब प्रांत के फिरोजपुर जिले के जीरा में एक सिख गुरमुख सिंह दर्जी और लेखक साकिब जिरवी में दोस्ती थी। लेकिन गदर के दौरान साकिब जिरवी के पूरे कुनबे को दंगाइयों ने मारने का ऐलान कर दिया था।
तब सिख गुरमुख सिंह दर्जी ने साकिब जिरवी व उनके परिवार को अपने घर में छिपाकर रखा। दंगाइयों ने उनके घर पर पहुंचकर उन्हें ढूंढने का प्रयास किया। लेकिन सिख गुरमुख सिंह दर्जी ने दंगाइयों को साकिब जिरवी व उनके परिवार की भनक तक न लगने दी और उन्हें सकुशल पाकिस्तान भिजवाया।
पाकिस्तान में जाकर उर्दू लेखक साकिब जिरवी ने अपने बहुत बड़े लेख में गुरमुख सिंह दर्जी के इस व्यवहार को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। चांद साहब कहते है कि इसी व्यवहार की वजह से वह खुद फिरोजपुर के जीरा में जाकर गुरमुख सिंह दर्जी के केवल चरण स्पर्श करने गए थे।
चांद साहिब का भारत के पद्मश्री स्वतंत्रता सेनानी चौधरी ब्रह्मनाथ दत्त कासिर पर अधारित लेख ‘साज खामोश’ को भी बहुत पसंद किया गया।
न्यूयार्क में भी छप चुकी है गजलें
उर्दू अदीब महेंद्र प्रताप चांद की गजलें न्यूयार्क में भी एक हिंदी की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा उनकी 16 किताबें छप चुकी हैं और 17वीं पुस्तक पर वह काम कर रहे हैं।
उन्हे अब तक सात बड़े सम्मानों से नवाजा जा चुका है। सुविख्यात साहित्यकार वाहिद काजमी कहते हैं चहारसू में चंाद साहब पर विशेषांक प्रकाशित होना सम्मान की बात है।
लेकिन अहम बात यह है कि इस विशेषांक में चांद साहब जो दोनों देशों की रियासतों को अमन की दिशा में काम करने का संदेश दे रहे हैं, उस पर गौर किया जाए। यह बात सच है कि दोनों देशों के आम लोगों को सियासत से कोई लेना-देना नहीं है। दोनाें तरफ लोग केवल शांति चाहते हैं।
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यह विशेषांक पूरे पाकिस्तान में चर्चा का विषय बना हुआ है। वहीं इसमें दोनों देशों के राजनीतिक, साहित्यिक और सामाजिक हालात पर एक विस्तृत साक्षात्कार लेख के रूप में प्रकाशित किया गया है।
इसके अलावा ‘चांद’ के कुछ लेख, दस गजलें व दस नज्में, पत्र व टिप्पणियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है।
विशेषांक में इस बात पर जोर दिया है कि दोनों देशों की आवाम अमन चाहती है।
टेंशन सिर्फ राजनीतिक स्तर पर है। इसलिए दोनों देशों की रियासतों को चाहिए कि वे सामाजिक संबंधों को मजबूत करने में जोर दें।
उन्होंने कहा कि दोनों देशाें के साहित्यकार भी संबंधों को मजबूत बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभाएं। इसके लिए जरूरी है कि दोनों देशों में साहित्यकारों की रचनाओं को एक-दूसरे देशों में प्रकाशित करवाने की अनुमति दी जाए। ताकि दोनों देशों के साहित्यकारों की ओर से ‘अमन’ के लिए किए गए प्रयास को आवाम तक पहुंचें।
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लेख पाक में बना चर्चा का विषय
विशेषांक में महेंद्र प्रताप ‘चांद’ के लेख ‘इंसानियत’ कभी मर नहीं सकती’ को बेहद प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। इसमें ‘गदर’ के दौरान दोनों देशों में हुई ऐसी घटनाओं का हवाला दिया गया है, जो बेहद मार्मिक है। इसमें चांद साहब ने बताया है कि जब वे गदर के दौरान पाकिस्तान के जिला लइया स्थित करौड़ लाल ईसन कस्बे से सभी हिंदू परिवारों के साथ भारत आ रहे थे, तो दंगाइयों ने सभी को मारने की चेतावनी दे दी थी।
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मगर उस वक्त वहां एक मुसलमान थानेदार ने वहां सभी हिंदू परिवारों से वादा किया था कि हिंदू परिवार घबराएं मत, उन्हें सकुशल भारत भिजवाया जाएगा। दंगाइयों से जूझते हुए उस मुसलमान थानेदार ने सभी हिंदू परिवार को ट्रेन में चढ़वाया। जबकि छह मुसलमान धोबियों ने सभी का सामान ट्रेनों में चढ़ाया।
एक अन्य घटना का जिक्र करते हुए चांद साहब ने लेख में बताया कि पंजाब प्रांत के फिरोजपुर जिले के जीरा में एक सिख गुरमुख सिंह दर्जी और लेखक साकिब जिरवी में दोस्ती थी। लेकिन गदर के दौरान साकिब जिरवी के पूरे कुनबे को दंगाइयों ने मारने का ऐलान कर दिया था।
तब सिख गुरमुख सिंह दर्जी ने साकिब जिरवी व उनके परिवार को अपने घर में छिपाकर रखा। दंगाइयों ने उनके घर पर पहुंचकर उन्हें ढूंढने का प्रयास किया। लेकिन सिख गुरमुख सिंह दर्जी ने दंगाइयों को साकिब जिरवी व उनके परिवार की भनक तक न लगने दी और उन्हें सकुशल पाकिस्तान भिजवाया।
पाकिस्तान में जाकर उर्दू लेखक साकिब जिरवी ने अपने बहुत बड़े लेख में गुरमुख सिंह दर्जी के इस व्यवहार को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। चांद साहब कहते है कि इसी व्यवहार की वजह से वह खुद फिरोजपुर के जीरा में जाकर गुरमुख सिंह दर्जी के केवल चरण स्पर्श करने गए थे।
चांद साहिब का भारत के पद्मश्री स्वतंत्रता सेनानी चौधरी ब्रह्मनाथ दत्त कासिर पर अधारित लेख ‘साज खामोश’ को भी बहुत पसंद किया गया।
न्यूयार्क में भी छप चुकी है गजलें
उर्दू अदीब महेंद्र प्रताप चांद की गजलें न्यूयार्क में भी एक हिंदी की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा उनकी 16 किताबें छप चुकी हैं और 17वीं पुस्तक पर वह काम कर रहे हैं।
उन्हे अब तक सात बड़े सम्मानों से नवाजा जा चुका है। सुविख्यात साहित्यकार वाहिद काजमी कहते हैं चहारसू में चंाद साहब पर विशेषांक प्रकाशित होना सम्मान की बात है।
लेकिन अहम बात यह है कि इस विशेषांक में चांद साहब जो दोनों देशों की रियासतों को अमन की दिशा में काम करने का संदेश दे रहे हैं, उस पर गौर किया जाए। यह बात सच है कि दोनों देशों के आम लोगों को सियासत से कोई लेना-देना नहीं है। दोनाें तरफ लोग केवल शांति चाहते हैं।