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शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी एक ही व्यक्ति हो तो निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं : कोर्ट
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अंबाला सिटी। अंबाला-हिसार नेशनल हाईवे पर ट्रक को डिवाइडर के साथ वाली पहली लेन में चलाने के आरोप में फंसे ट्रक चालक को कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी अभिनव गर्ग की अदालत ने फैसले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। फैसले के अनुसार, कोर्ट ने कहा कि जब शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी एक ही व्यक्ति हो, तो निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती।
यह था मामला
21 जनवरी 2025 को थाना नग्गल की पुलिस टीम हाईवे पर गश्त कर रही थी। इस दौरान अंबाला की ओर से आ रहे एक 18-टायर वाले ट्रक को डिवाइडर के साथ वाली लेन में चलते देखा गया। पुलिस का आरोप था कि ट्रक चालक राजस्थान के अजमेर निवासी मांगी लाल यातायात नियमों का उल्लंघन कर रहा था, जिससे अन्य वाहनों के लिए खतरा पैदा हो रहा था। पुलिस ने मौके पर वीडियो बनाया और चालक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 285 के तहत केस दर्ज किया था।
अदालत ने क्यों किया बरी
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि इस मामले में कई कानूनी खामियां हैं। कोर्ट ने नोट किया कि हेड कांस्टेबल मनोज कुमार ही इस मामले में शिकायतकर्ता थे और उन्होंने ही पूरे मामले की जांच की। अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी का एक ही होना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इससे जांच की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। घटना सार्वजनिक स्थान और व्यस्त हाईवे पर हुई, इसके बावजूद पुलिस ने किसी भी राहगीर या स्वतंत्र व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया। कोर्ट ने इसे अभियोजन पक्ष की बड़ी विफलता माना। पुलिस द्वारा पेश की गई वीडियो फुटेज में यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि ट्रक को आरोपी मांगी लाल ही चला रहा था। वीडियो में केवल यातायात उल्लंघन तो दिखा रहा था, लेकिन आरोपी के साथ उसका सीधा संबंध साबित नहीं कर सका। अभियोजन पक्ष ऐसा कोई आधिकारिक सरकारी नोटिफिकेशन या नियम पेश नहीं कर सका, जो यह साबित करे कि उस विशेष लेन में ट्रक चलाना धारा 285 बीएनएस के तहत अपराध की श्रेणी में आता है।
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यह था मामला
21 जनवरी 2025 को थाना नग्गल की पुलिस टीम हाईवे पर गश्त कर रही थी। इस दौरान अंबाला की ओर से आ रहे एक 18-टायर वाले ट्रक को डिवाइडर के साथ वाली लेन में चलते देखा गया। पुलिस का आरोप था कि ट्रक चालक राजस्थान के अजमेर निवासी मांगी लाल यातायात नियमों का उल्लंघन कर रहा था, जिससे अन्य वाहनों के लिए खतरा पैदा हो रहा था। पुलिस ने मौके पर वीडियो बनाया और चालक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 285 के तहत केस दर्ज किया था।
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अदालत ने क्यों किया बरी
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि इस मामले में कई कानूनी खामियां हैं। कोर्ट ने नोट किया कि हेड कांस्टेबल मनोज कुमार ही इस मामले में शिकायतकर्ता थे और उन्होंने ही पूरे मामले की जांच की। अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी का एक ही होना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इससे जांच की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। घटना सार्वजनिक स्थान और व्यस्त हाईवे पर हुई, इसके बावजूद पुलिस ने किसी भी राहगीर या स्वतंत्र व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया। कोर्ट ने इसे अभियोजन पक्ष की बड़ी विफलता माना। पुलिस द्वारा पेश की गई वीडियो फुटेज में यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि ट्रक को आरोपी मांगी लाल ही चला रहा था। वीडियो में केवल यातायात उल्लंघन तो दिखा रहा था, लेकिन आरोपी के साथ उसका सीधा संबंध साबित नहीं कर सका। अभियोजन पक्ष ऐसा कोई आधिकारिक सरकारी नोटिफिकेशन या नियम पेश नहीं कर सका, जो यह साबित करे कि उस विशेष लेन में ट्रक चलाना धारा 285 बीएनएस के तहत अपराध की श्रेणी में आता है।
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