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सर्व लक्षण संपन्न हैं भगवान गणेश : पंडित राकेश शर्मा
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शिवमहापुराण कथा में पहुंचे श्रद्धालु। संवाद
अंबाला सिटी। प्राचीन जट्टां वाले शिव मंदिर में बुधवार को शिवमहापुराण कथा के नाैवें दिन पंडित राकेश शर्मा ने भगवान गणेश की उत्पति के बारे में बताया। एक समय की बात है जया और विजया नामक पार्वतीजी की दो सखियों ने परस्पर विचार कर पार्वती से जाकर कहा कि शंकर जी के द्वार पर हमारे असंख्यगण और द्वारपाल विराजमान रहते हैं।
उन पर हमारा अधिकार होते हुए भी कुछ भी अधिकार नहीं है। अतएव हे भगवती, एक हमारा भी कोई गण होना चाहिए आप उसकी रचना कीजिए। देवी पार्वती को सखियों की यह बात प्रिय लगी और उन्होंने उसकी रचना की इच्छा की। विचार कर माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल से सर्वलक्षण-संपन्न एक पुरुष का निर्माण किया। माता पार्वती ने उसे अनेक प्रकार के वस्त्रों से सजा अनेक प्रकार के अलंकारों से युक्त कर बड़ा आशीर्वाद दिया। तब उस पुत्र ने माता पार्वती से कहा कि, हे माता मेरे लिए क्या आज्ञा है। मैं आपकी सब आज्ञाओं को पूर्ण करूंगा।
पार्वती ने कहा कि तुम मेरे द्वार के रक्षक रहो। मेरी आज्ञा के बिना कोई कैसा भी क्यों न हो, मेरे घर के भीतर न आने पाए ऐसा कह कर पार्वतीजी ने हाथों में एक लकड़ी दे दी और प्रेम से मुख चूम कर द्वार पर बैठा दिया। वह लकड़ी ले गणेशजी माता के हितार्थ द्वार पर जा बैठे। तब पार्वतीजी स्नान करने लगीं। उसी समय शिवजी द्वार पर आ गये और जब अन्दर जाने लगे तब शिवजी को न जान कर गणेश ने कहा कि मेरी माता की आज्ञा के बिना आप नहीं जा सकते। शिवजी ने कहा, मूर्ख तू किसको रोकता है क्या मुझे नहीं जानता कि मैं शिव हूं ।
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यह सुनते ही गणेश ने भगवान शिव पर लकड़ी से प्रहार कर दिया। इस पर शिवजी ने क्रोधित हो अपने गणों को आज्ञा दे दी कि इसको रोको। ऐसा कह शिवजी बाहर ही स्थित रहे। इसके बाद अद्भुत लीलाधारी संसार को अपनी लीला दिखाने लगे।
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उन पर हमारा अधिकार होते हुए भी कुछ भी अधिकार नहीं है। अतएव हे भगवती, एक हमारा भी कोई गण होना चाहिए आप उसकी रचना कीजिए। देवी पार्वती को सखियों की यह बात प्रिय लगी और उन्होंने उसकी रचना की इच्छा की। विचार कर माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल से सर्वलक्षण-संपन्न एक पुरुष का निर्माण किया। माता पार्वती ने उसे अनेक प्रकार के वस्त्रों से सजा अनेक प्रकार के अलंकारों से युक्त कर बड़ा आशीर्वाद दिया। तब उस पुत्र ने माता पार्वती से कहा कि, हे माता मेरे लिए क्या आज्ञा है। मैं आपकी सब आज्ञाओं को पूर्ण करूंगा।
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पार्वती ने कहा कि तुम मेरे द्वार के रक्षक रहो। मेरी आज्ञा के बिना कोई कैसा भी क्यों न हो, मेरे घर के भीतर न आने पाए ऐसा कह कर पार्वतीजी ने हाथों में एक लकड़ी दे दी और प्रेम से मुख चूम कर द्वार पर बैठा दिया। वह लकड़ी ले गणेशजी माता के हितार्थ द्वार पर जा बैठे। तब पार्वतीजी स्नान करने लगीं। उसी समय शिवजी द्वार पर आ गये और जब अन्दर जाने लगे तब शिवजी को न जान कर गणेश ने कहा कि मेरी माता की आज्ञा के बिना आप नहीं जा सकते। शिवजी ने कहा, मूर्ख तू किसको रोकता है क्या मुझे नहीं जानता कि मैं शिव हूं ।
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यह सुनते ही गणेश ने भगवान शिव पर लकड़ी से प्रहार कर दिया। इस पर शिवजी ने क्रोधित हो अपने गणों को आज्ञा दे दी कि इसको रोको। ऐसा कह शिवजी बाहर ही स्थित रहे। इसके बाद अद्भुत लीलाधारी संसार को अपनी लीला दिखाने लगे।