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साहब! सैकड़ों किमी चलकर पैर पत्थर और टांगे फौलाद बन गई...
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साहब, सरकार हमसे ऐसा बर्ताव कर रही हैं जैसे हम ही कोरोना वायरस फैला रहे हों। इन सरकारों से कोई पूछे कि 10-10 दिन पैदल चलकर कोई कोरोना संक्रमित स्वस्थ रह सकता है? हमें यह सरकारें प्रवासी कर रही हैं। जबकि प्रवासी तो वह लोग हैं जो विदेशों में बैठे थे। जिन्हें हवाई जहाज से भारत वापस लाया जा रहा है। हम मेहनतकश लोगों को सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने पर मजबूर किया जा रहा है। ऊपर से लठ मारे जा रहे हैं। हम तो सैकड़ों किलोमीटर चल लिये जिसके बाद पैर पत्थर के हो चुके हैं और टांगे फौलाद बन चुकी हैं। 10-10 दिन हो गए ऑनलाइन मूवमेंट बनवाने के लिए लेकिन जब पास नहीं बना और खाने के लाले पड़े तो मजबूरी में घर जाने का फैसला लेना पड़ा। हम तो हाथ जोड़ कर सरकार से यही गुहार लगाते हैं कि हमें आपका कोई अहसान नहीं चाहिए, हमें न बस चाहिए और न रेल गाड़ी। बस इतना रहम कर दो हमें कोई रास्ते में पुलिस वाला परेशान न करें।
हम 10 दिन पहले जम्मू से चले थे, पता नहीं कितने किलोमीटर चल लिए और अभी कितने किलोमीटर और चलना है। बीच में कई नदी-नाले भी पार किए हैं, यह तो फिर भी ज्यादा गहरी नहीं है। मरने से पहले बस घर पहुंच जाएं।
---सोमवती।
अपनी छह माह की बेटी को लेकर जम्मू से पैदल ही चल रही हूं। गर्मी में बच्ची को कुछ हो न इस लिए चुन्नी से ढका हुआ है। खाने को भी जो रास्ते में कोई भला आदमी दे जाता है खा लेते हैं वरना भूखे रहते हैं।
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- सपना।
न तो कुछ खाने के लिए रहा और न पीने को। अब तो पता भी नहीं लगता कि पैर चल रहे हैं। थकना क्या होता है वह भी भूल गए। सरकार से गुहार है कि हमें कुछ नहीं चाहिए। बस बिना रोके पैदल ही हमारे घर जाने दो।
--गोविंद।
दस दिन पहले पास अप्लाई किया था पर कोई फायदर नहीं हुआ। सरकार तो ऐसे कर रही है, जैसे हममें ही कोरोना हो। अगर हममें कोरोना होता तो अभी कहीं रास्ते में गिर चुके होते।
--झलकन।
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हम 10 दिन पहले जम्मू से चले थे, पता नहीं कितने किलोमीटर चल लिए और अभी कितने किलोमीटर और चलना है। बीच में कई नदी-नाले भी पार किए हैं, यह तो फिर भी ज्यादा गहरी नहीं है। मरने से पहले बस घर पहुंच जाएं।
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---सोमवती।
अपनी छह माह की बेटी को लेकर जम्मू से पैदल ही चल रही हूं। गर्मी में बच्ची को कुछ हो न इस लिए चुन्नी से ढका हुआ है। खाने को भी जो रास्ते में कोई भला आदमी दे जाता है खा लेते हैं वरना भूखे रहते हैं।
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न तो कुछ खाने के लिए रहा और न पीने को। अब तो पता भी नहीं लगता कि पैर चल रहे हैं। थकना क्या होता है वह भी भूल गए। सरकार से गुहार है कि हमें कुछ नहीं चाहिए। बस बिना रोके पैदल ही हमारे घर जाने दो।
--गोविंद।
दस दिन पहले पास अप्लाई किया था पर कोई फायदर नहीं हुआ। सरकार तो ऐसे कर रही है, जैसे हममें ही कोरोना हो। अगर हममें कोरोना होता तो अभी कहीं रास्ते में गिर चुके होते।
--झलकन।