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Ambala News: प्लास्टिक के चीनी कलपुर्जों ने बढ़ाई चिंता
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अंबाला में निर्मित स्वदेशी माइक्रोस्कोप। संवाद
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अंबाला। साइंस उपकरणों की नगरी कहे जाने वाले अंबाला के स्वदेशी उद्योग के सामने इन दिनों एक नया संकट खड़ा हो गया है। शैक्षणिक संस्थानों और प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल होने वाले अंबाला निर्मित स्वदेशी साइंस उत्पाद अब बाजार में पिछड़ते नजर आ रहे हैं। इसका मुख्य कारण चीन से आयातित सस्ती गुणवत्ता के उत्पाद हैं।
साइंस कारोबारी अश्वनी नागपाल का कहना है कि माइक्रोस्कोप में 15 से 29 कलपुर्जे लगाए जाते हैं। इन कलपुर्जों को बनाने के लिए पीतल, स्टील व अन्य धातुओं का प्रयोग किया जा रहा है। परीक्षण की गुणवत्ता ठीक मिले और लंबे समय तक प्रयोगशालाओं में उत्पाद चले इसके लिए इसकी गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाता है। मगर अब बाजार में प्लास्टिक के सस्ते कलपुर्जों भी चीन से आ रहे हैं। जो स्थानीय बाजार को खराब कर रहे हैं।
गुणवत्ता में अव्वल, पर कीमत में बेबस : अश्वनी नागपाल बताते हैं कि पीतल से बने स्वदेशी कलपुर्जे हर मायने में अच्छे हैं। स्थानीय कारोबारी में गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखते हैं। यहां बने लैंस और कलपुर्जे शुद्धता और टिकाऊपन के मामले में चीनी प्लास्टिक उत्पादों से कहीं बेहतर हैं। लेकिन लागत अधिक होने के कारण स्वदेशी माइक्रोस्कोप की कीमत बढ़ जाती है। सरकारी और निजी शैक्षणिक संस्थान अक्सर बजट बचाने के चक्कर में गुणवत्ता को नजरअंदाज कर सस्ते चीनी प्लास्टिक उपकरणों को तवज्जो दे रहे हैं। सबसे अधिक दिक्कत तो एक्सपोर्ट में आती है। दाम अधिक होने के कारण माल बाजार में बेचना मुश्किल हो जाता है। ब्यूरो
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साइंस कारोबारी अश्वनी नागपाल का कहना है कि माइक्रोस्कोप में 15 से 29 कलपुर्जे लगाए जाते हैं। इन कलपुर्जों को बनाने के लिए पीतल, स्टील व अन्य धातुओं का प्रयोग किया जा रहा है। परीक्षण की गुणवत्ता ठीक मिले और लंबे समय तक प्रयोगशालाओं में उत्पाद चले इसके लिए इसकी गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाता है। मगर अब बाजार में प्लास्टिक के सस्ते कलपुर्जों भी चीन से आ रहे हैं। जो स्थानीय बाजार को खराब कर रहे हैं।
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गुणवत्ता में अव्वल, पर कीमत में बेबस : अश्वनी नागपाल बताते हैं कि पीतल से बने स्वदेशी कलपुर्जे हर मायने में अच्छे हैं। स्थानीय कारोबारी में गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखते हैं। यहां बने लैंस और कलपुर्जे शुद्धता और टिकाऊपन के मामले में चीनी प्लास्टिक उत्पादों से कहीं बेहतर हैं। लेकिन लागत अधिक होने के कारण स्वदेशी माइक्रोस्कोप की कीमत बढ़ जाती है। सरकारी और निजी शैक्षणिक संस्थान अक्सर बजट बचाने के चक्कर में गुणवत्ता को नजरअंदाज कर सस्ते चीनी प्लास्टिक उपकरणों को तवज्जो दे रहे हैं। सबसे अधिक दिक्कत तो एक्सपोर्ट में आती है। दाम अधिक होने के कारण माल बाजार में बेचना मुश्किल हो जाता है। ब्यूरो
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