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Ambala News: गुम हो गया 73 साल पुराना मदन का अखाड़ा
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पवन कुमार यादव उर्फ बब्बू पहलवान ।
- फोटो : पवन कुमार यादव उर्फ बब्बू पहलवान ।
अंबाला। सात दशक से भी पुराना मदन का मंदिर अखाड़ा गुम हो गया। यह अखाड़ा बहुत से पहलवानों की कहानियों को अपने अंदर समेटे है। इस अखाडे़ से निकले पहलवानों ने देश के अलग-अलग राज्यों में जाकर कुश्ती लड़ी और वहां के नामचीन पहलवानों को हराकर अंबाला और अपने अखाड़े का नाम किया। मगर 73 साल पुराना यह अखाड़ा आज कहीं गुम हो गया है। न तो यहां पहलवान है और न ही अखाड़े का अस्तित्व।
अखाडे़ को चलाने वाले पवन कुमार यादव उर्फ बब्बू पहलवान बताते हैं कि अखाडे़ में एक समय नए व पुराने पहलवानों की कतार लगी रहती थी। मगर समय के साथ यह अखाड़ा राजनीति और विवादों की भेंट चढ़ गया। इसके बाद हमने सरकार से लेकर अफसरों तक कई चक्कर काटे मगर किसी ने एक न सुनी। आज जब कुश्ती का स्वरूप बदला है तो इस खेल की मूल भावना में ही पुरातन दंगलों की झलक तो दिखाई देती है, मगर वह पुराने पहलवान नहीं दिखाई देते तो हालात से लड़कर दांवपेंच सीखते थे और बडे़- बडे़ सूरमाओं को पटखनी देते थे।
पवन कुमार यादव उर्फ बब्बू पहलवान ने बताया कि 1963 में वह 12 साल के थे, तब उनके चाचा पहलवान सिद्धू राम ने बब्बू को पहलवानी के गुर सिखाए। कुछ समय बाद लुधियाना के शाहकौर निवासी उस्ताद हसना पहलवान अंबाला छावनी आए। उनके यहां आने पर बब्बू ने उस्ताद हसना पहलवान से पहलवानी के सभी तरह से दांव पेंच सीखे और अपने आप को निखारा। सन 1968 में पहली बार बब्बू कटक में नेशनल खेलने पहुंचे और यहां पर पहलवान से भिडे़, लेकिन यहां पर कुछ नहीं आया। इसके एक साल बाद 1969 में बनारस में दूसरे स्थान पर रहे। वहीं 1970 में गंटूर के कोचिन में आयोजित नेशनल चैंपियनशिप में भागीदारी रही।
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बब्बू पहलवान चार बार नेशनल लड़ चुके हैं। पंजाब के जिला फिरोजपुर में 1979 में टूर्नामेंट हुआ था। यहां पर बब्बू पहलवान की तीन कुश्ती हुई। जिसमें पहली कुश्ती तरनतारन के सोढी पहलवान के साथ, दूसरी कुश्ती अमृतसर के अशोकी पहलवान तथा तीसरी कुश्ती अमृतसर के सितारे पंजाब मददी पहलवान के साथ हुई। तीनों ही कुश्ती ने जीती थी। इसके बाद बब्बू पहलवान को ढाई किलोग्राम की चांदी की गदा की दी गई थी। इसके बाद बब्बू पहलवान ने हरियाणा, महाराष्ट, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हिमाचल, पंजाब और देश के अन्य राज्यों में जाकर नामचीन पहलवानों को अपने दांव पेंच से हराया। बब्बू पहलवान ने बताया कि उन्होंने अपने समय में साढे़ चार हजार से भी ज्यादा दंगल और अखाडे़ में कुश्ती लड़ी है। बब्बू पहलवान के अनुसार वह तीन दांव पेंच का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते थे। जिसमें निकाल मारनी दांवपेंच, सामने से सखी मारनी दांवपेंच और टांग मारनी दांवपेंच से वह अधिकतर कुश्ती में जीतते थे।
इस तरह हुई मदन का मंदिर अखाड़ा की शुरुआत
उस्ताद अल्लाह दिया हवड़ा पहलवान ने सन 1926 में अंबाला छावनी के रामबाग रोड स्थित पक्का बाजार में मदन का मंदिर अखाड़ा की शुरूआत की थी। इस अखाडे़ में उस्ताद अल्लाह दिया हवड़ा, पहलवान दयाल , पहलवान सिद्धू राम और अन्य पहलवानों को कुश्ती के गुर सिखाते थे, 1947 में भारत पाकिस्तान के विभाजन के बाद उस्ताद अल्लाह दिया हवड़ा पहलवान पाकिस्तान में जाकर बस गए। इसके बाद मदन का मंदिर अखाड़ा में दयाल गुरु और सिद्धू राम, पहलवानों को कुश्ती के गुर सिखाने लगे। समय के साथ साथ मदन का मंदिर अखाड़ा से कच्छू पहलवान, जितेंद्र उर्फ जद्दी पहलवान, गैंदा राम उर्फ लल्ला पहलवान, पवन कुमार यादव उर्फ बब्बू पहलवान जैसे न जाने कितने पहलवान निकले, इन पहलानों ने देश के कौने कौने में जाकर अखाड़ों में होने वाले दंगल में नामी पहलवानों को अपने दांव पेच से धूल चटाई और अपने अखाडे़ का नाम रोशन किया।
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अखाडे़ को चलाने वाले पवन कुमार यादव उर्फ बब्बू पहलवान बताते हैं कि अखाडे़ में एक समय नए व पुराने पहलवानों की कतार लगी रहती थी। मगर समय के साथ यह अखाड़ा राजनीति और विवादों की भेंट चढ़ गया। इसके बाद हमने सरकार से लेकर अफसरों तक कई चक्कर काटे मगर किसी ने एक न सुनी। आज जब कुश्ती का स्वरूप बदला है तो इस खेल की मूल भावना में ही पुरातन दंगलों की झलक तो दिखाई देती है, मगर वह पुराने पहलवान नहीं दिखाई देते तो हालात से लड़कर दांवपेंच सीखते थे और बडे़- बडे़ सूरमाओं को पटखनी देते थे।
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पवन कुमार यादव उर्फ बब्बू पहलवान ने बताया कि 1963 में वह 12 साल के थे, तब उनके चाचा पहलवान सिद्धू राम ने बब्बू को पहलवानी के गुर सिखाए। कुछ समय बाद लुधियाना के शाहकौर निवासी उस्ताद हसना पहलवान अंबाला छावनी आए। उनके यहां आने पर बब्बू ने उस्ताद हसना पहलवान से पहलवानी के सभी तरह से दांव पेंच सीखे और अपने आप को निखारा। सन 1968 में पहली बार बब्बू कटक में नेशनल खेलने पहुंचे और यहां पर पहलवान से भिडे़, लेकिन यहां पर कुछ नहीं आया। इसके एक साल बाद 1969 में बनारस में दूसरे स्थान पर रहे। वहीं 1970 में गंटूर के कोचिन में आयोजित नेशनल चैंपियनशिप में भागीदारी रही।
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बब्बू पहलवान चार बार नेशनल लड़ चुके हैं। पंजाब के जिला फिरोजपुर में 1979 में टूर्नामेंट हुआ था। यहां पर बब्बू पहलवान की तीन कुश्ती हुई। जिसमें पहली कुश्ती तरनतारन के सोढी पहलवान के साथ, दूसरी कुश्ती अमृतसर के अशोकी पहलवान तथा तीसरी कुश्ती अमृतसर के सितारे पंजाब मददी पहलवान के साथ हुई। तीनों ही कुश्ती ने जीती थी। इसके बाद बब्बू पहलवान को ढाई किलोग्राम की चांदी की गदा की दी गई थी। इसके बाद बब्बू पहलवान ने हरियाणा, महाराष्ट, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हिमाचल, पंजाब और देश के अन्य राज्यों में जाकर नामचीन पहलवानों को अपने दांव पेंच से हराया। बब्बू पहलवान ने बताया कि उन्होंने अपने समय में साढे़ चार हजार से भी ज्यादा दंगल और अखाडे़ में कुश्ती लड़ी है। बब्बू पहलवान के अनुसार वह तीन दांव पेंच का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते थे। जिसमें निकाल मारनी दांवपेंच, सामने से सखी मारनी दांवपेंच और टांग मारनी दांवपेंच से वह अधिकतर कुश्ती में जीतते थे।
इस तरह हुई मदन का मंदिर अखाड़ा की शुरुआत
उस्ताद अल्लाह दिया हवड़ा पहलवान ने सन 1926 में अंबाला छावनी के रामबाग रोड स्थित पक्का बाजार में मदन का मंदिर अखाड़ा की शुरूआत की थी। इस अखाडे़ में उस्ताद अल्लाह दिया हवड़ा, पहलवान दयाल , पहलवान सिद्धू राम और अन्य पहलवानों को कुश्ती के गुर सिखाते थे, 1947 में भारत पाकिस्तान के विभाजन के बाद उस्ताद अल्लाह दिया हवड़ा पहलवान पाकिस्तान में जाकर बस गए। इसके बाद मदन का मंदिर अखाड़ा में दयाल गुरु और सिद्धू राम, पहलवानों को कुश्ती के गुर सिखाने लगे। समय के साथ साथ मदन का मंदिर अखाड़ा से कच्छू पहलवान, जितेंद्र उर्फ जद्दी पहलवान, गैंदा राम उर्फ लल्ला पहलवान, पवन कुमार यादव उर्फ बब्बू पहलवान जैसे न जाने कितने पहलवान निकले, इन पहलानों ने देश के कौने कौने में जाकर अखाड़ों में होने वाले दंगल में नामी पहलवानों को अपने दांव पेच से धूल चटाई और अपने अखाडे़ का नाम रोशन किया।

पवन कुमार यादव उर्फ बब्बू पहलवान ।- फोटो : पवन कुमार यादव उर्फ बब्बू पहलवान ।