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बीस साल में लगवाए 40 लाख पौधे,कारवां अभी जारी है...
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पेड़ के साथ खड़े त्रिवेणी बाबा
- फोटो : Ambala
कोरोना महामारी के बीच ऑक्सीजन की कमी ने हमें भले ही पेड़-पौधों का महत्व बता दिया हो, लेकिन हरियाणा में एक व्यक्ति ऐसा है, जिसने अपना पूरा जीवन पृथ्वी को बचाने और लोगों को पेड़ों से मिलने वाली ऑक्सीजन की अहमियत और अन्य फायदे बताने में समर्पित कर दिया।
हम बात कर रहे हैं भिवानी के रहने वाले एक ऐसे ही व्यक्ति सत्यवान की। जो 20 साल में अभी तक करीब एक लाख त्रिवेणी और गली-गली में ऑक्सीजन सिलिंडरों जैस काम करने वाले नीम, बरगद और पीपल के करीब 40 लाख पौधे लगा चुका है। यही कारण है कि इस सफर की शुरुआत में भले ही वह सत्यवान लेकर चला हो, लेकिन लोगों ने पर्यावरण बचाने के इस जुनून को देखते हुए त्रिवेणी बाबा का नाम दे दिया। बुधवार को अंबाला छावनी के एक घर में आए त्रिवेणी बाबा ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि अगर सभी लोग अपने घरों और आसपास पौधे लगा लें तो उन्हें जीवनभर सिलिंडरों में मिलने वाली ऑक्सीजन की जरूरत नहीं पड़ेगी। कोरोना से जंग में यह पौधे ब्रह्मास्त्र का काम करेंगे। उन्होंने बताया कि गांव सरल के श्मशान घाट से वर्ष 1995 में उनका सफर शुरू हुआ था तभी से (नीम, पीपल बरगद) लगाने का सिलसिला अनवरत जारी है। -संवाद
सैकड़ों लोगों में जगा चुके पौधे लगाने की अलख
त्रिवेणी बाबा अभी तक सैकड़ों लोगों में पर्यावरण की अलख जगा चुके हैं। वह किसी भी शख्स से मिलते हैं तो उनका पहला ही संदेश पौधे लगाकर पर्यावरण के साथ खुद को बचाने और त्रिवेणी लगाने का रहता है। उनका कहना था कि उनकी नजर में जीवन का सबसे अमूल्य तोहफा पेड़-पौधे हैं जो हमें कुदरती मिलते हैं, लेकिन लोग इस भागदौड़ भरी जिंदगी में पौधे लगाना भूलते जा रहे हैं तो पृथ्वी के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ में अब तक लगाई त्रिवेणियों में से सभी कामयाब हैं। अंबाला, पानीपत करनाल, जींद, में 95 प्रतिशत तथा भिवानी जिला में करीब 85 प्रतिशत त्रिवेणियां कामयाब हैं। नीम, बरगद और पीपल के पौधे को धार्मिक जुड़ाव भी बताया कि पीपल विष्णु, बरगद ब्रह्मा, नीम महेश का स्वरूप हैं।
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आखिरी सांस तक पर्यावरण बचाने में समर्पित रहेगा जीवन
इतिहास से एमए गांव लोहारू के बीसलवास निवासी सत्यवान उर्फ त्रिवेणी बाबा ने वर्ष 1995 में एक खेत से हरे पेड़ कटते देख न केवल पेड़ काटने वालों को रोका बल्कि अपना जीवन पर्यावरण बचाने के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया। उसी राह पर चलते हुए अब वे सत्यवान नहीं त्रिवेणी बाबा के नाम से पहचान पा चुके हैं। स्कूलों, कालेजों, शहरों और गांवों में पर्यावरण के प्रति चेतना जगाना उनकी दिनचर्या बन चुका है। उन्होंने कहा कि अपने शरीर की आखिरी सांस तक उनका जीवन पर्यावरण को बचाने में समर्पित रहेगा और जागरूक करते रहेंगे।
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हम बात कर रहे हैं भिवानी के रहने वाले एक ऐसे ही व्यक्ति सत्यवान की। जो 20 साल में अभी तक करीब एक लाख त्रिवेणी और गली-गली में ऑक्सीजन सिलिंडरों जैस काम करने वाले नीम, बरगद और पीपल के करीब 40 लाख पौधे लगा चुका है। यही कारण है कि इस सफर की शुरुआत में भले ही वह सत्यवान लेकर चला हो, लेकिन लोगों ने पर्यावरण बचाने के इस जुनून को देखते हुए त्रिवेणी बाबा का नाम दे दिया। बुधवार को अंबाला छावनी के एक घर में आए त्रिवेणी बाबा ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि अगर सभी लोग अपने घरों और आसपास पौधे लगा लें तो उन्हें जीवनभर सिलिंडरों में मिलने वाली ऑक्सीजन की जरूरत नहीं पड़ेगी। कोरोना से जंग में यह पौधे ब्रह्मास्त्र का काम करेंगे। उन्होंने बताया कि गांव सरल के श्मशान घाट से वर्ष 1995 में उनका सफर शुरू हुआ था तभी से (नीम, पीपल बरगद) लगाने का सिलसिला अनवरत जारी है। -संवाद
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सैकड़ों लोगों में जगा चुके पौधे लगाने की अलख
त्रिवेणी बाबा अभी तक सैकड़ों लोगों में पर्यावरण की अलख जगा चुके हैं। वह किसी भी शख्स से मिलते हैं तो उनका पहला ही संदेश पौधे लगाकर पर्यावरण के साथ खुद को बचाने और त्रिवेणी लगाने का रहता है। उनका कहना था कि उनकी नजर में जीवन का सबसे अमूल्य तोहफा पेड़-पौधे हैं जो हमें कुदरती मिलते हैं, लेकिन लोग इस भागदौड़ भरी जिंदगी में पौधे लगाना भूलते जा रहे हैं तो पृथ्वी के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ में अब तक लगाई त्रिवेणियों में से सभी कामयाब हैं। अंबाला, पानीपत करनाल, जींद, में 95 प्रतिशत तथा भिवानी जिला में करीब 85 प्रतिशत त्रिवेणियां कामयाब हैं। नीम, बरगद और पीपल के पौधे को धार्मिक जुड़ाव भी बताया कि पीपल विष्णु, बरगद ब्रह्मा, नीम महेश का स्वरूप हैं।
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आखिरी सांस तक पर्यावरण बचाने में समर्पित रहेगा जीवन
इतिहास से एमए गांव लोहारू के बीसलवास निवासी सत्यवान उर्फ त्रिवेणी बाबा ने वर्ष 1995 में एक खेत से हरे पेड़ कटते देख न केवल पेड़ काटने वालों को रोका बल्कि अपना जीवन पर्यावरण बचाने के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया। उसी राह पर चलते हुए अब वे सत्यवान नहीं त्रिवेणी बाबा के नाम से पहचान पा चुके हैं। स्कूलों, कालेजों, शहरों और गांवों में पर्यावरण के प्रति चेतना जगाना उनकी दिनचर्या बन चुका है। उन्होंने कहा कि अपने शरीर की आखिरी सांस तक उनका जीवन पर्यावरण को बचाने में समर्पित रहेगा और जागरूक करते रहेंगे।