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संघर्ष के बाद भी महिलाओं ने भरी ऊंची उड़ान
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अंबाला कैंट। बरसों के संघर्ष के बाद हालात बदल रहे हैं। मगर, आधी दुनिया के सामने संघर्ष अभी बाकी है। महिलाओं को बराबरी का हक देने की कोशिश हो रही है। इसके बावजूद चुनौतियां दूर नहीं हुई हैं। हालांकि महिला अपने जोश और जज्बे से बड़ी से बड़ी चुनौती का भी सामना कर सकती है। जिले में ऐसी ही कई महिलाएं हैं जिन्होंने अपने बलबूते पर बेहतर मुकाम हासिल किया है और समाज को आइना दिखाते हुए महिला सशक्तिकरण की ओर अपने कदम बढ़ाए हैं। कामयाब महिलाओं की कहानियां अमूमन हर किसी को आकर्षित करती हैं। ऐसी ही कुछ कहानियां हम प्रस्तुत कर रहे हैं।
गांव की लड़की ने कबड्डी सीखी, भारत को गोल्ड दिलाया, आज महिलाओं को दिलाती हैं न्याय
अंबाला महिला थाना प्रभारी सुनीता ढाका ऐसी सख्शियत हैं जिनकी कामयाबी की कहानी लोगों के मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ने की ताकत रखती है। रोहतक के सुंडाना गांव में जन्मी सुनीता के पिता बिजेंद्र ढाका किसान हैं। बचपन में गांव में पढ़ाई की। उनकी खेल में रुचि को देखते हुए बड़ी बहन लेक्चरार सुमन ने सुनीता को खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसमें इनके पिता ने भी साथ दिया। इसके बाद वर्ष 2000 में वह गांव से 250 किमी दूर कबड्डी एकेडमी में सीखने लगी। इसके बाद वह स्कूल, जिला, प्रदेश फिर नेशनल लेवल पर खेलने गईं। वह वर्ष 2007 में एशियन चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय टीम की सदस्य रहीं। इसके बाद स्पोर्ट्स कोटे से वर्ष 2008 में वह पुलिस में भर्ती हो गईं। पानीपत में कई सालों तक रहने के बाद वह अंबाला में 6 नवंबर 2017 में महिला थाना प्रभारी बनीं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2011 में उनकी शादी गन्नौर के समसपुर के शक्ति धनखड़ के साथ हुई। उनका एक बेटा देव है। मायके के साथ ससुराल में भी उनको बेटी की तरह प्यार मिलता है। यही नहीं वह महिलाओं को समय-समय पर जागरूक भी करती हैं। उन्होंने महिलाओं को संदेश दिया कि उनके लिए दुर्गा शक्ति एप लांच किया गया है, जिसमें वह अपनी बात रख सकती हैं। हालांकि उनका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को न्याय दिलाने का है।
बेटे को अपना लिवर देकर बचाई जान, नौकरी छोड़ महिलाओं के उत्थान में लगीं
अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव व सोशल मीडिया इंचार्ज चित्रा सरवारा की जिंदादिली की कहानी पढ़कर आप भी इन्हें सलाम करेंगे। इन्होंने अपने ही बेटे को लिवर देकर उसकी जान बचाई। हालांकि उन्होंने काफी मानसिक और शारीरिक दर्द झेला, पर बेटे के लिए वह अपने इरादे से डगमगाई नहीं। चित्रा सरवारा ने बताया कि 23 मार्च 2016 को बेटे को जन्म दिया। परिवार खुश था, लेकिन कुछ दिनों बाद ही बेटे युद्धवीर की सेहत बिगड़ने लगी। बहुत जगह चेकअप कराया, परंतु कुछ भी पता नहीं चल सका। जांच कराई तो पता चला युद्धवीर को बिलरी एटरेजिया नाम की बीमारी है, जिसमें लिवर खत्म हो जाता है। इसके बाद चित्रा ने लीवर ट्रांसप्लांट का फैसला किया। उन्होंने बताया कि वह नेशनल लेवल पर वालीबाल टीम की सदस्य रह चुकी हैं। स्पोर्ट्स स्कूल राई में पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अहमदाबाद में एनआईडी (राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान) से कोर्स किया और दस सालों तक नौकरी की। महिलाओं को जागरूक करने के लिए उन्होंने नौकरी को त्याग दिया। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2013 में चुनाव लड़ा और पार्षद बनीं।
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निजी स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, पर बेटी को एमबीबीएस कराने की ठानी
यह कहानी एक गरीब परिवार की महिला की है, जिसने अपने दम पर बेटी को पढ़ा रही है और उसे डाक्टर बनाने का सपना संजोया है। अंबाला शहर में अमननगर निवासी ऊषा बरार डीपीएस में चतुर्थ श्रेणी का काम करती हैं। उनके पति की वर्ष 2012 में मौत हो गई थी। इसके बाद उनके जिम्मे ही परिवार का बोझ आ गया। उनके ससुर सेना से रिटायर हैं। उनके पेंशन से घर का खर्च तो ऊषा की सेलरी से बच्चों की पढ़ाई हो रही है। बेटी हिमानी भी मां के सपने को पूरा करना चाहती है। वह अभी 12वीं में पढ़ रही है। इसके बाद वह एमबीबीएस करके डाक्टर बनना चाहती है। उसने बताया कि मां के कठिन समय को नजदीक से देखा है। उनके संघर्ष को देखते हुए इस वर्ष चुनमुन क्लब की तरफ से सम्मानित भी किया गया है।
आर्थिक स्थिति मजबूत न होने पर भी दस साल से महिलाओं को कर रहीं प्रोत्साहित
अंबाला कैंट निवासी मोनिका शर्मा ने अपने दम पर पुरुषों को भी पीछे छोड़ने का काम किया है। उन्होंने क्लब के माध्यम से महिलाओं को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। उनकी दो बेटियां हुई तो अक्सर उनके रिश्तेदार व अन्य दोस्त कहते थे कि घर में बेटा होना चाहिए जोकि आगे चलकर बड़ा अफसर बने। मगर वह इन बातों पर यकीन नहीं रखते थे और आज उनकी दोनों बेटियां निजी कंपनियों में अधिकारी हैं। एक एचआर मैनेजर है तो दूसरी साफ्टवेयर इंजीनियर। आर्थिक स्थिति ज्यादा मजबूत न होने के बावजूद वह हर माह एक हजार रुपये महिलाओं के उत्थान के लिए निकालती हैं। इस काम को करते हुए दस साल पूरे हो गए हैं। आए दिन संघर्ष कर रही महिलाओं का चयन करती हैं और उन्हें सम्मान देकर जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। इस काम में उनके पति रिटायर्ड रेलवे अफसर अशोक शर्मा मदद करते हैं।
गांव की लड़की ने कबड्डी सीखी, भारत को गोल्ड दिलाया, आज महिलाओं को दिलाती हैं न्याय
अंबाला महिला थाना प्रभारी सुनीता ढाका ऐसी सख्शियत हैं जिनकी कामयाबी की कहानी लोगों के मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ने की ताकत रखती है। रोहतक के सुंडाना गांव में जन्मी सुनीता के पिता बिजेंद्र ढाका किसान हैं। बचपन में गांव में पढ़ाई की। उनकी खेल में रुचि को देखते हुए बड़ी बहन लेक्चरार सुमन ने सुनीता को खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसमें इनके पिता ने भी साथ दिया। इसके बाद वर्ष 2000 में वह गांव से 250 किमी दूर कबड्डी एकेडमी में सीखने लगी। इसके बाद वह स्कूल, जिला, प्रदेश फिर नेशनल लेवल पर खेलने गईं। वह वर्ष 2007 में एशियन चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय टीम की सदस्य रहीं। इसके बाद स्पोर्ट्स कोटे से वर्ष 2008 में वह पुलिस में भर्ती हो गईं। पानीपत में कई सालों तक रहने के बाद वह अंबाला में 6 नवंबर 2017 में महिला थाना प्रभारी बनीं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2011 में उनकी शादी गन्नौर के समसपुर के शक्ति धनखड़ के साथ हुई। उनका एक बेटा देव है। मायके के साथ ससुराल में भी उनको बेटी की तरह प्यार मिलता है। यही नहीं वह महिलाओं को समय-समय पर जागरूक भी करती हैं। उन्होंने महिलाओं को संदेश दिया कि उनके लिए दुर्गा शक्ति एप लांच किया गया है, जिसमें वह अपनी बात रख सकती हैं। हालांकि उनका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को न्याय दिलाने का है।
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बेटे को अपना लिवर देकर बचाई जान, नौकरी छोड़ महिलाओं के उत्थान में लगीं
अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव व सोशल मीडिया इंचार्ज चित्रा सरवारा की जिंदादिली की कहानी पढ़कर आप भी इन्हें सलाम करेंगे। इन्होंने अपने ही बेटे को लिवर देकर उसकी जान बचाई। हालांकि उन्होंने काफी मानसिक और शारीरिक दर्द झेला, पर बेटे के लिए वह अपने इरादे से डगमगाई नहीं। चित्रा सरवारा ने बताया कि 23 मार्च 2016 को बेटे को जन्म दिया। परिवार खुश था, लेकिन कुछ दिनों बाद ही बेटे युद्धवीर की सेहत बिगड़ने लगी। बहुत जगह चेकअप कराया, परंतु कुछ भी पता नहीं चल सका। जांच कराई तो पता चला युद्धवीर को बिलरी एटरेजिया नाम की बीमारी है, जिसमें लिवर खत्म हो जाता है। इसके बाद चित्रा ने लीवर ट्रांसप्लांट का फैसला किया। उन्होंने बताया कि वह नेशनल लेवल पर वालीबाल टीम की सदस्य रह चुकी हैं। स्पोर्ट्स स्कूल राई में पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अहमदाबाद में एनआईडी (राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान) से कोर्स किया और दस सालों तक नौकरी की। महिलाओं को जागरूक करने के लिए उन्होंने नौकरी को त्याग दिया। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2013 में चुनाव लड़ा और पार्षद बनीं।
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निजी स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, पर बेटी को एमबीबीएस कराने की ठानी
यह कहानी एक गरीब परिवार की महिला की है, जिसने अपने दम पर बेटी को पढ़ा रही है और उसे डाक्टर बनाने का सपना संजोया है। अंबाला शहर में अमननगर निवासी ऊषा बरार डीपीएस में चतुर्थ श्रेणी का काम करती हैं। उनके पति की वर्ष 2012 में मौत हो गई थी। इसके बाद उनके जिम्मे ही परिवार का बोझ आ गया। उनके ससुर सेना से रिटायर हैं। उनके पेंशन से घर का खर्च तो ऊषा की सेलरी से बच्चों की पढ़ाई हो रही है। बेटी हिमानी भी मां के सपने को पूरा करना चाहती है। वह अभी 12वीं में पढ़ रही है। इसके बाद वह एमबीबीएस करके डाक्टर बनना चाहती है। उसने बताया कि मां के कठिन समय को नजदीक से देखा है। उनके संघर्ष को देखते हुए इस वर्ष चुनमुन क्लब की तरफ से सम्मानित भी किया गया है।
आर्थिक स्थिति मजबूत न होने पर भी दस साल से महिलाओं को कर रहीं प्रोत्साहित
अंबाला कैंट निवासी मोनिका शर्मा ने अपने दम पर पुरुषों को भी पीछे छोड़ने का काम किया है। उन्होंने क्लब के माध्यम से महिलाओं को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। उनकी दो बेटियां हुई तो अक्सर उनके रिश्तेदार व अन्य दोस्त कहते थे कि घर में बेटा होना चाहिए जोकि आगे चलकर बड़ा अफसर बने। मगर वह इन बातों पर यकीन नहीं रखते थे और आज उनकी दोनों बेटियां निजी कंपनियों में अधिकारी हैं। एक एचआर मैनेजर है तो दूसरी साफ्टवेयर इंजीनियर। आर्थिक स्थिति ज्यादा मजबूत न होने के बावजूद वह हर माह एक हजार रुपये महिलाओं के उत्थान के लिए निकालती हैं। इस काम को करते हुए दस साल पूरे हो गए हैं। आए दिन संघर्ष कर रही महिलाओं का चयन करती हैं और उन्हें सम्मान देकर जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। इस काम में उनके पति रिटायर्ड रेलवे अफसर अशोक शर्मा मदद करते हैं।