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पीले रतुए ने गेहूं को लिया चपेट में, किसान चिंतित
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अंबाला सिटी। जिले में गेहूं की फसल को पीले रतुआ ने अपनी चपेट में ले लिया है। गांव जलबेड़ा के किसान राज कुमार, ओमकार, कौला के किसान मंगू राम व मौहडी के किसान रणजीत सिंह आदि ने बताया कि यह कभी बारिश तो कभी धूप के कारण हो रहा है। यदि मौसम मेें ठंडक रहती तो शायद उनकी गेंहू में पीला रतुआ न आता। पीले रतुए के प्रभाव के कारण किसानों की चिंता बढ़ी हुई है। वहीं कृषि विभाग में भी बीमारी आने से हड़कंप मचा हुआ है।
उक्त किसानों ने बताया कि पीला रतुआ आने से गेहूं की फसल पर स्प्रे करना भी जरूरी है। यदि वह स्प्रे नहीं करते तो यह बीमारी उनकी फसल को खराब कर देगी, जिसके कारण उनके लिए अब अतिरिक्त खर्च बढ़ गया है। पीले रतुए की रोकथाम के लिए दवाई व स्प्रे करवाने के कारण हजारों रुपये खर्च होंगे। किसानों ने बताया कि मौसम की मार के कारण उन्हें इस बीमारी का सामना करना पड़ रहा है। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक अभी मौसम में नमी रहेगी, जिससे बीमारी बढ़ने की संभावना रहती है। कृषि विभाग के अधिकारी किसानों को बीमारी के बचाव को लेकर विभिन्न तरीके बताकर कई प्रकार की दवाईयों का स्प्रे करवाने की सलाह दे रहे हैं।
इस वजह से फैलती है बीमारी
वातावरण में लो टेंपरेचर व एकदम से उच्च नमी होने से पीला रतुआ फैलने की अधिक संभावना बनी रहती है। धुंध अधिक होने व सुबह, शाम अधिक ठंड होने से वातावरण में नमी बनी रहती है जिस कारण उक्त बीमारी किसानों के लिए आफत बन गई है। इस प्रकार का वातावरण गेहूं की फसल के लिए हानिकारक होता है। बारिश के बाद यदि एकदम से धूप निकलती है तो ऐसे में गेंहू की फसल के उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है।
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ऐसे करें बीमारी की पहचान
सफेद रूमाल को गेहूं के पौधों पर घुमाएं। यदि रूमाल का रंग पीला होना शुरू हो जाए तो यह पीले रतुआ के लक्षण है। रतुआ आनेे के बाद गेहूं के पौधों की पत्तियों में पीले रंग का बारीक पाउडर एकत्र होना शुरू हो जाता है। ऐसे में किसान पीला रतुआ से बचाव के लिए देसी तरीका भी अपना सकते हैं। इसमें एक किलोग्राम तंबाकू की पत्तियों का पाउडर व 20 किलोग्राम लकड़ी का छिड़काव भी कर सकते हैं। लेकिन किसानों को इस प्रयोग मेें विशेष ध्यान देना होगा क्योंकि यह बीज बुआई से पहले ही करना होगा।
नमी वाले मौसम में ही पीले रतुआ का प्रभाव ज्यादा होता है। इसलिए किसानों को सलाह है कि करोपीकेनाजोल दवाई का स्प्रे करें।
- रोशन लाल, कृषि विकास अधिकारी
उक्त किसानों ने बताया कि पीला रतुआ आने से गेहूं की फसल पर स्प्रे करना भी जरूरी है। यदि वह स्प्रे नहीं करते तो यह बीमारी उनकी फसल को खराब कर देगी, जिसके कारण उनके लिए अब अतिरिक्त खर्च बढ़ गया है। पीले रतुए की रोकथाम के लिए दवाई व स्प्रे करवाने के कारण हजारों रुपये खर्च होंगे। किसानों ने बताया कि मौसम की मार के कारण उन्हें इस बीमारी का सामना करना पड़ रहा है। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक अभी मौसम में नमी रहेगी, जिससे बीमारी बढ़ने की संभावना रहती है। कृषि विभाग के अधिकारी किसानों को बीमारी के बचाव को लेकर विभिन्न तरीके बताकर कई प्रकार की दवाईयों का स्प्रे करवाने की सलाह दे रहे हैं।
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इस वजह से फैलती है बीमारी
वातावरण में लो टेंपरेचर व एकदम से उच्च नमी होने से पीला रतुआ फैलने की अधिक संभावना बनी रहती है। धुंध अधिक होने व सुबह, शाम अधिक ठंड होने से वातावरण में नमी बनी रहती है जिस कारण उक्त बीमारी किसानों के लिए आफत बन गई है। इस प्रकार का वातावरण गेहूं की फसल के लिए हानिकारक होता है। बारिश के बाद यदि एकदम से धूप निकलती है तो ऐसे में गेंहू की फसल के उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है।
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ऐसे करें बीमारी की पहचान
सफेद रूमाल को गेहूं के पौधों पर घुमाएं। यदि रूमाल का रंग पीला होना शुरू हो जाए तो यह पीले रतुआ के लक्षण है। रतुआ आनेे के बाद गेहूं के पौधों की पत्तियों में पीले रंग का बारीक पाउडर एकत्र होना शुरू हो जाता है। ऐसे में किसान पीला रतुआ से बचाव के लिए देसी तरीका भी अपना सकते हैं। इसमें एक किलोग्राम तंबाकू की पत्तियों का पाउडर व 20 किलोग्राम लकड़ी का छिड़काव भी कर सकते हैं। लेकिन किसानों को इस प्रयोग मेें विशेष ध्यान देना होगा क्योंकि यह बीज बुआई से पहले ही करना होगा।
नमी वाले मौसम में ही पीले रतुआ का प्रभाव ज्यादा होता है। इसलिए किसानों को सलाह है कि करोपीकेनाजोल दवाई का स्प्रे करें।
- रोशन लाल, कृषि विकास अधिकारी