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डॉक्टर की सलाह: बीच में दवा छोड़ने से गंभीर हो सकती है टीबी, अब चलाए जाएंगे विशेष अभियान

Wed, 23 Mar 2022 12:02 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Wed, 23 Mar 2022 12:02 PM IST
सार

सीएमओ ने बताया कि ढाई लाख से पांच लाख की आबादी पर एक टीबी यूनिट है और पचास हजार से एक लाख की आबादी पर एक डायग्नोस्टिक सेंटर बनाया गया है। टीबी की समस्त जांच और दवाएं राजकीय चिकित्सालयों में मुफ्त होती हैं।

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TB can become serious by leaving medicine
टीबी के मरीज - फोटो : Social Media

विस्तार

 क्षय रोग (टीबी) के मरीज एक महीने की दवा खाने के बाद स्वस्थ महसूस करने लगते हैं और ऐसे में कई मरीज दवा बीच में छोड़ देते हैं। ऐसा करने से वह ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के मरीज बन जाते हैं। उनमें से कुछ मरीज एक्सडीआर श्रेणी में शामिल हो जाते हैं, जिनका इलाज मुश्किल हो जाता है।

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सीएमओ डॉ. आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि ऐसे मरीज चिकित्सक की सलाह पर दवा छोड़ें। विश्व के 27 फीसदी टीबी के मरीज भारत में हैं और देश के 20 फीसदी टीबी के मरीज उत्तर प्रदेश में हैं। शासन के निर्देश पर 24 मार्च से टीबी जागरुकता अभियान चलाया जाएगा। दो अप्रैल से शुरू हो रहे विशेष संचारी रोग नियंत्रण अभियान और 15 अप्रैल से प्रस्तावित दस्तक पखवाड़े में भी टीबी के मरीज खोजे जाएंगे।
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विश्व टीबी दिवस से दो बड़े अभियान भी शुरू होंगे। एक अभियान के तहत टीबी से ग्रसित बच्चों व किशोरों और 18 वर्ष से अधिक उम्र की महिला रोगियों को भी गोद दिलवाने पर जोर होगा। वहीं दूसरे अभियान के तहत आयुष्मान भारत हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर से जुड़े क्षेत्रों में टीबी के मरीजों की खोज, कैंप के आयोजन और जन जागरुकता जैसे प्रयास होंगे।
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सीएमओ ने बताया कि टीबी अनादिकाल से चला आ रहा रोग है, लेकिन जब इसकी दवा नहीं थी तब यह एक महामारी थी। रिफैंम्पिसिन दवा की खोज के बाद इस पर प्रभावी नियंत्रण आसान हो गया। इस समय टीबी की आधुनिकतम दवाएं निशुल्क उपलब्ध हैं, जिनके जरिए टीबी पर नियंत्रण पाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि शुगर, एचआईवी, क्रानिक किडनी डिजीज, प्रेग्नेंसी, कैंसर, पोषण की कमी से रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है। इन बीमारियों से पीड़ित मरीजों को टीबी का खतरा ज्यादा रहता है।  
 

ढाई लाख की आबादी पर एक टीबी यूनिट
सीएमओ ने बताया कि ढाई लाख से पांच लाख की आबादी पर एक टीबी यूनिट है और पचास हजार से एक लाख की आबादी पर एक डायग्नोस्टिक सेंटर बनाया गया है। टीबी की समस्त जांच और दवाएं राजकीय चिकित्सालयों में मुफ्त होती हैं। अगर कोई प्राइवेट चिकित्सक भी अपने मरीजों की सरकारी अस्पताल में निशुल्क जांच करवाना चाहता है तो करा सकता है।

नाखून और बाल को छोड़कर शरीर के किसी अंग में भी हो सकती है टीबी
सीएमओ ने बताया कि दो सप्ताह से अधिक की खांसी से टीबी हो सकती है, मगर प्रत्येक खांसी टीबी नहीं होती है। अगर यह दिक्कत है तो टीबी की जांच अवश्य कराएं। शरीर में टीबी मुख्यतया फेफड़ों को ही प्रभावित करती है, लेकिन शरीर के अन्य अंगों में भी टीबी होती है। नाखून और बाल को छोड़ कर शरीर के किसी भी अंग में टीबी हो सकती है।

ऐसी टीबी एक्सट्रा पल्मोनरी टीबी कहलाती है और इसकी पहचान विशेषज्ञ ही करते हैं। गैर फेफड़े वाले टीबी के मरीज तो संक्रमण नहीं फैलाते, लेकिन फेफड़े में टीबी का मरीज अगर उपचार नहीं कराता है तो साल भर में 10 से 15 लोगों को मरीज बना सकता है। हर तीन मिनट में टीबी के दो मरीजों की मृत्यु हो जाती है। भारत में प्रत्येक एक लाख की आबादी पर 192 टीबी के मरीज वर्ष 2020 में पाए गए।

 

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