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Gorakhpur News: मूड डिसऑर्डर और डिप्रेशन से प्रभावित हो रही कार्यक्षमता
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- बच्चों में 12 से 14 साल की उम्र में दिखने लगते हैं अवसाद के लक्षण
गोरखपुर। डिजिटल दुनिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। अवसाद यानी डिप्रेशन अब दिव्यांगता और कार्यक्षमता प्रभावित होने के प्रमुख कारणों में शामिल है। बच्चों और किशोरों में मानसिक समस्याओं के शुरुआती संकेतों को पहचानना और समय पर मदद उपलब्ध कराना जरूरी है।
मोहद्दीपुर में एक होटल में एसोसिएशन ऑफ क्लीनिकल साइकियाट्री सोसाइटी के दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन यूपीआईपीएस-2026 में सफदरजंग अस्पताल, दिल्ली के डॉ. निशांत गोयल ने कहा कि मनोदशा में बदलाव, चिड़चिड़ापन और पढ़ाई में मन नहीं लगना बच्चों में मानसिक परेशानी के संकेत हो सकते हैं। मनोदशा में असामान्य गिरावट अवसाद, जबकि अत्यधिक बढ़ी हुई मनोदशा और उससे जुड़े लक्षण मेनिया की स्थिति में दिखाई दे सकते हैं। जब ये बदलाव व्यक्ति के रोजमर्रा के कामकाज को प्रभावित करने लगते हैं तो मूड डिसऑर्डर जैसी समस्याएं सामने आती हैं।
उन्होंने बताया कि करीब एक दशक पहले हुए नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे में लगभग 10 प्रतिशत लोगों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं सामने आई थीं। डॉ. गोयल ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के हवाले से डिप्रेशन को दिव्यांगता का प्रमुख कारण बताया। उन्होंने कहा कि कोई भी समस्या जब व्यक्ति को सामान्य काम करने से रोकने लगे, तो उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
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कोविड के बाद बढ़ी बच्चों की मानसिक समस्याएं
एनआईएमएचएएनएस, बंगलूरू के पूर्व निदेशक एवं बाल मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. शेखर शेषाद्रि ने कहा कि कोविड के बाद बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सोशल मीडिया और एआई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि अभिभावकों और शिक्षकों को आदेश, उपदेश और अपेक्षाओं के बजाय संवाद के जरिये बच्चों से जुड़ना चाहिए। डिजिटल प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम बच्चों में लत को बढ़ावा दे सकते हैं।
बुजुर्ग भी डिजिटल लत की चपेट में
केजीएमयू के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. एससी तिवारी ने कहा कि डिजिटल एडिक्शन केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। बुजुर्ग भी शुरुआत में समय बिताने के लिए मोबाइल देखते हैं लेकिन धीरे-धीरे इसके आदी हो सकते हैं। अत्यधिक इस्तेमाल सोचने की क्षमता और मानसिक सक्रियता पर नकारात्मक असर डाल सकता है। हालांकि डिमेंशिया जैसे रोगों से इसका संबंध समझने के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है।
कम उम्र में फोन देने से बचें
प्रयागराज के वरिष्ठ मनोरोग चिकित्सक डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव ने कहा कि किसी भी व्यवहार की लत लग सकती है। कम उम्र में मोबाइल देने से बच्चों के सामाजिक और भाषा विकास पर असर पड़ सकता है। उन्होंने शुरुआती दो वर्षों में बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने और अभिभावकों को उनके साथ पर्याप्त समय बिताने की सलाह दी।
ऐसे करें बचाव
- बच्चों को मोबाइल से बाहर की दुनिया से जोड़ें, उनके साथ समय बिताएं और खुलकर संवाद करें।
- बच्चों को डांटने या जज करने के बजाय उनकी बात सुनें, उनकी विशेषताओं को पहचानें और मुश्किल समय में उनके साथ खड़े रहें।
- बच्चों को इंतजार करना, धैर्य रखना और वास्तविक रिश्तों का महत्व समझाना भी जरूरी है।
- बच्चे अपने आसपास के माहौल को देखकर सीखते हैं, इसलिए अभिभावकों का व्यवहार भी उनके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सिंथेटिक नशे की गिरफ्त में युवा, मानसिक सेहत पर गंभीर असर
गोरखपुर। बदलते दौर में नशे का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक नशीले पदार्थों के साथ सिंथेटिक और नए मनो-सक्रिय पदार्थ युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन रहे हैं। केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आदर्श त्रिपाठी ने कहा कि इन पदार्थों का सीधा असर मस्तिष्क पर पड़ता है। इससे व्यक्ति की सोच, व्यवहार और आंतरिक अनुभव प्रभावित हो सकते हैं। कई बार शुरुआती लक्षण सामान्य व्यवहार से अलग नजर नहीं आते, जिससे नशे की पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया और साथियों के समूहों के जरिये युवाओं में नशे के प्रति आकर्षण बढ़ सकता है। कुछ समूह नशे के सेवन को सामान्य व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे युवा इसके जोखिमों को नजरअंदाज करने लगते हैं। नए मनो-सक्रिय पदार्थों का लंबे समय तक इस्तेमाल मानसिक स्वास्थ्य और सामान्य जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, ओपीडी में आने वाले युवाओं में लगभग 20 से 25 प्रतिशत में नशे की लत देखने को मिली है। उन्होंने कहा कि व्यवहार में अचानक बदलाव, अकेले रहने की प्रवृत्ति, पैसों की लगातार मांग और रोजमर्रा की गतिविधियों में गिरावट नशे के संभावित संकेत हो सकते हैं। उन्होंने अभिभावकों को सलाह दी कि बच्चों और युवाओं को डराने या धमकाने के बजाय उनसे संवाद करें। नशे की आशंका होने पर समय रहते मनोचिकित्सक की मदद लेनी चाहिए। शुरुआती अवस्था में उपचार शुरू होने से स्थिति को संभालने में मदद मिल सकती है।
दिमागी तनाव से जूझ रहा हर चौथा किशोर
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि दिमागी तनाव और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से हर चौथा किशोर जूझ रहा है। मोबाइल और सोशल मीडिया पर बढ़ती निर्भरता, परिवार से घटता संवाद और नशे के बदलते स्वरूप ने बच्चों की मानसिक सेहत को चुनौती दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, व्यवहार में बदलाव, चिड़चिड़ापन और पढ़ाई में मन न लगने जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर संवाद, सहयोग और उपचार जरूरी है।
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गोरखपुर। डिजिटल दुनिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। अवसाद यानी डिप्रेशन अब दिव्यांगता और कार्यक्षमता प्रभावित होने के प्रमुख कारणों में शामिल है। बच्चों और किशोरों में मानसिक समस्याओं के शुरुआती संकेतों को पहचानना और समय पर मदद उपलब्ध कराना जरूरी है।
मोहद्दीपुर में एक होटल में एसोसिएशन ऑफ क्लीनिकल साइकियाट्री सोसाइटी के दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन यूपीआईपीएस-2026 में सफदरजंग अस्पताल, दिल्ली के डॉ. निशांत गोयल ने कहा कि मनोदशा में बदलाव, चिड़चिड़ापन और पढ़ाई में मन नहीं लगना बच्चों में मानसिक परेशानी के संकेत हो सकते हैं। मनोदशा में असामान्य गिरावट अवसाद, जबकि अत्यधिक बढ़ी हुई मनोदशा और उससे जुड़े लक्षण मेनिया की स्थिति में दिखाई दे सकते हैं। जब ये बदलाव व्यक्ति के रोजमर्रा के कामकाज को प्रभावित करने लगते हैं तो मूड डिसऑर्डर जैसी समस्याएं सामने आती हैं।
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उन्होंने बताया कि करीब एक दशक पहले हुए नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे में लगभग 10 प्रतिशत लोगों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं सामने आई थीं। डॉ. गोयल ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के हवाले से डिप्रेशन को दिव्यांगता का प्रमुख कारण बताया। उन्होंने कहा कि कोई भी समस्या जब व्यक्ति को सामान्य काम करने से रोकने लगे, तो उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
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कोविड के बाद बढ़ी बच्चों की मानसिक समस्याएं
एनआईएमएचएएनएस, बंगलूरू के पूर्व निदेशक एवं बाल मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. शेखर शेषाद्रि ने कहा कि कोविड के बाद बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सोशल मीडिया और एआई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि अभिभावकों और शिक्षकों को आदेश, उपदेश और अपेक्षाओं के बजाय संवाद के जरिये बच्चों से जुड़ना चाहिए। डिजिटल प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम बच्चों में लत को बढ़ावा दे सकते हैं।
बुजुर्ग भी डिजिटल लत की चपेट में
केजीएमयू के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. एससी तिवारी ने कहा कि डिजिटल एडिक्शन केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। बुजुर्ग भी शुरुआत में समय बिताने के लिए मोबाइल देखते हैं लेकिन धीरे-धीरे इसके आदी हो सकते हैं। अत्यधिक इस्तेमाल सोचने की क्षमता और मानसिक सक्रियता पर नकारात्मक असर डाल सकता है। हालांकि डिमेंशिया जैसे रोगों से इसका संबंध समझने के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है।
कम उम्र में फोन देने से बचें
प्रयागराज के वरिष्ठ मनोरोग चिकित्सक डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव ने कहा कि किसी भी व्यवहार की लत लग सकती है। कम उम्र में मोबाइल देने से बच्चों के सामाजिक और भाषा विकास पर असर पड़ सकता है। उन्होंने शुरुआती दो वर्षों में बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने और अभिभावकों को उनके साथ पर्याप्त समय बिताने की सलाह दी।
ऐसे करें बचाव
- बच्चों को मोबाइल से बाहर की दुनिया से जोड़ें, उनके साथ समय बिताएं और खुलकर संवाद करें।
- बच्चों को डांटने या जज करने के बजाय उनकी बात सुनें, उनकी विशेषताओं को पहचानें और मुश्किल समय में उनके साथ खड़े रहें।
- बच्चों को इंतजार करना, धैर्य रखना और वास्तविक रिश्तों का महत्व समझाना भी जरूरी है।
- बच्चे अपने आसपास के माहौल को देखकर सीखते हैं, इसलिए अभिभावकों का व्यवहार भी उनके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सिंथेटिक नशे की गिरफ्त में युवा, मानसिक सेहत पर गंभीर असर
गोरखपुर। बदलते दौर में नशे का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक नशीले पदार्थों के साथ सिंथेटिक और नए मनो-सक्रिय पदार्थ युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन रहे हैं। केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आदर्श त्रिपाठी ने कहा कि इन पदार्थों का सीधा असर मस्तिष्क पर पड़ता है। इससे व्यक्ति की सोच, व्यवहार और आंतरिक अनुभव प्रभावित हो सकते हैं। कई बार शुरुआती लक्षण सामान्य व्यवहार से अलग नजर नहीं आते, जिससे नशे की पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया और साथियों के समूहों के जरिये युवाओं में नशे के प्रति आकर्षण बढ़ सकता है। कुछ समूह नशे के सेवन को सामान्य व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे युवा इसके जोखिमों को नजरअंदाज करने लगते हैं। नए मनो-सक्रिय पदार्थों का लंबे समय तक इस्तेमाल मानसिक स्वास्थ्य और सामान्य जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, ओपीडी में आने वाले युवाओं में लगभग 20 से 25 प्रतिशत में नशे की लत देखने को मिली है। उन्होंने कहा कि व्यवहार में अचानक बदलाव, अकेले रहने की प्रवृत्ति, पैसों की लगातार मांग और रोजमर्रा की गतिविधियों में गिरावट नशे के संभावित संकेत हो सकते हैं। उन्होंने अभिभावकों को सलाह दी कि बच्चों और युवाओं को डराने या धमकाने के बजाय उनसे संवाद करें। नशे की आशंका होने पर समय रहते मनोचिकित्सक की मदद लेनी चाहिए। शुरुआती अवस्था में उपचार शुरू होने से स्थिति को संभालने में मदद मिल सकती है।
दिमागी तनाव से जूझ रहा हर चौथा किशोर
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि दिमागी तनाव और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से हर चौथा किशोर जूझ रहा है। मोबाइल और सोशल मीडिया पर बढ़ती निर्भरता, परिवार से घटता संवाद और नशे के बदलते स्वरूप ने बच्चों की मानसिक सेहत को चुनौती दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, व्यवहार में बदलाव, चिड़चिड़ापन और पढ़ाई में मन न लगने जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर संवाद, सहयोग और उपचार जरूरी है।