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पत्रकारिता दिवस पर विशेष: दारोगा की नौकरी छोड़ दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने गोरखपुर से निकाला था ये अखबार
Sat, 30 May 2020 03:05 PM IST
vivek shukla
राजन राय गोरखपुर।
राजन राय गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Sat, 30 May 2020 03:05 PM IST
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दशरथ प्रसाद द्विवेदी। (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला।
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देश की आजादी में पत्रकारिता का अहम रोल रहा है, जिसमें गोरखपुर ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। आजादी की लड़ाई में जन-जन तक स्वराज का संदेश पहुंचाने में सशक्त माध्यम बने थे गोरखपुर से 'स्वदेश' अखबार निकालने वाले दशरथ प्रसाद द्विवेदी, जिन्होंने दारोगा की नौकरी छोड़ दी थी।
वे ट्रेनिंग के लिए मुरादाबाद जा रहे थे। लखनऊ से उन्हें ट्रेन बदलनी थी। वहीं पर गणेश शंकर विद्यार्थी की सभा हो रही थी। विद्यार्थी जी के भाषण से वह इतना प्रभावित हुए कि दारोगा की ट्रेनिंग का विचार छोड़ दिया। उनके साथ कानपुर चले गए।
प्रताप पत्रिका में काम शुरू कर दिया। छह अप्रैल 1919 को उन्होंने स्वदेश का प्रकाशन शुरू किया। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. प्रत्युष दुबे ने 'स्वदेश की साहित्यिक चेतना', 'हिन्दी पत्रकारिता और स्वदेश' पर पीएचडी की है।
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उन्होंने स्वदेश में प्रकाशित साहित्यिक और सामाजिक सामग्री जैसे कविताओं, कहानियों, निबंध, एकांकी, साहित्यिक टिप्पणियों, आलोचनाओं और संपादकीय का संकलन किया। इसे उन्होंने 'स्वदेश का साहित्य एवं समाज' शीर्षक से दो वाल्यूम में प्रकाशित भी कराया।
दशरथ प्रसाद के अखबार में उस समय के सभी प्रमुख साहित्यकार जैसे अयोध्या प्रसाद उपाध्याय हरिऔध, मैथिली शरण गुप्त, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही, जयशंकर प्रसाद, निराला, प्रेमचंद आदि स्वदेश में प्रकाशित होते थे। अतिथि संपादकों की परंपरा स्वदेश ने ही शुरू की। उनके आवास और स्वदेश के दफ्तर रहे स्वदेश सदन में ये सामग्री संभाल कर रखी गई है। उनके मन राष्ट्रप्रेम में कूट-कूटकर भरा था तभी तो स्वदेश के पहले पन्ने पर लिखा होता था-
'जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।'
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वे ट्रेनिंग के लिए मुरादाबाद जा रहे थे। लखनऊ से उन्हें ट्रेन बदलनी थी। वहीं पर गणेश शंकर विद्यार्थी की सभा हो रही थी। विद्यार्थी जी के भाषण से वह इतना प्रभावित हुए कि दारोगा की ट्रेनिंग का विचार छोड़ दिया। उनके साथ कानपुर चले गए।
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प्रताप पत्रिका में काम शुरू कर दिया। छह अप्रैल 1919 को उन्होंने स्वदेश का प्रकाशन शुरू किया। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. प्रत्युष दुबे ने 'स्वदेश की साहित्यिक चेतना', 'हिन्दी पत्रकारिता और स्वदेश' पर पीएचडी की है।
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उन्होंने स्वदेश में प्रकाशित साहित्यिक और सामाजिक सामग्री जैसे कविताओं, कहानियों, निबंध, एकांकी, साहित्यिक टिप्पणियों, आलोचनाओं और संपादकीय का संकलन किया। इसे उन्होंने 'स्वदेश का साहित्य एवं समाज' शीर्षक से दो वाल्यूम में प्रकाशित भी कराया।
दशरथ प्रसाद के अखबार में उस समय के सभी प्रमुख साहित्यकार जैसे अयोध्या प्रसाद उपाध्याय हरिऔध, मैथिली शरण गुप्त, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही, जयशंकर प्रसाद, निराला, प्रेमचंद आदि स्वदेश में प्रकाशित होते थे। अतिथि संपादकों की परंपरा स्वदेश ने ही शुरू की। उनके आवास और स्वदेश के दफ्तर रहे स्वदेश सदन में ये सामग्री संभाल कर रखी गई है। उनके मन राष्ट्रप्रेम में कूट-कूटकर भरा था तभी तो स्वदेश के पहले पन्ने पर लिखा होता था-
'जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।'