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Exclusive: जीडीए उपाध्यक्ष बोले- जनता को डरने की जरूरत नहीं, हम घर बसाने आए, उजाड़ने नहीं

Sat, 21 Aug 2021 01:31 PM IST
vivek shukla अरुण चंद, गोरखपुर।
अरुण चंद, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 21 Aug 2021 01:31 PM IST
सार

जीडीए उपाध्यक्ष बोले- विनियमित क्षेत्र में बन चुके किसी घर को ध्वस्त नहीं कराएगा जीडीए, लैंड यूज बदलकर धोएंगे माथे से अवैध का दाग। प्राधिकरण क्षेत्र में 1700 एकड़ जमीन विनियमितीकरण की, लैंड यूज की अनदेखी कर निर्माण करा चुके कई हजार परिवारों को बड़ी राहत।

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Special interview with GDA Vice President Prem Ranjan Singh on change in Gorakhpur
जीडीए उपाध्यक्ष प्रेम रंजन सिंह। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

चंद रोज पहले तक जिन छोटी-छोटी समस्याओं के लिए फरियादियों को गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) के महीनों चक्कर लगाने पड़ते थे, वहीं अब चंद घंटों में निस्तारित हो जा रहे हैं। बाबू से लेकर अभियंता तक के आचरण व कामकाज में जबरदस्त बदलाव है। सब प्रेम से बात करने के साथ ही लंबित मामले फटाफट निपटाने में जुटे हैं। जीडीए के मातहतों की कार्यप्रणाली में यह बदलाव उपाध्यक्ष प्रेम रंजन सिंह के कार्यभार संभालने के साथ ही आया है। 20 दिनों में 21 वर्षों से लटके मानचित्र व नामांतरण के तमाम मामले निपटा दिए गए। कई मामलों का निपटारा तो चंद घंटे में ही हो गया है। अपनी कार्यप्रणाली से ज्यादातर शहरवासियों का दिल जीतने वाले जीडीए उपाध्यक्ष से अमर उजाला संवाददाता अरुण चन्द ने विस्तार से बात की। उपाध्यक्ष ने  प्राथमिकताएं गिनाई। साफ कहा है कि जीडीए की परिधि में मकान, दुकान या फिर ऑफिस बनाने वाले किसी शहरवासी को डरने की जरूरत नहीं है। हम घर बसाने आए हैं, उजाड़ने नहीं। अगर प्राधिकरण का कोई कर्मचारी या अभियंता घर गिराने की बात करता है तो सीधे मुझसे संपर्क करें। पेश है बातचीत के अंश-
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प्रश्न: पिछले कई साल से अवैध निर्माण के मामले में जीडीए प्रदेश में पहले, दूसरे पायदान पर रहता है ?
जवाब: देखिए, एक बात समझनी होगी। अवैध और अनाधिकृत निर्माण में अंतर है। जीडीए क्षेत्र में जिन ज्यादातर निर्माण को अवैध कहा जाता है, दरअसल वह अनाधिकृत निर्माण हैं। इसमें आम जनता का कोई दोष नहीं है। 1700 एकड़ जमीन, विनियमितीकरण की है। 2001 और 2021 की  महायोजना में जिम्मेदारों ने दूर तक नहीं सोचा। शहर का विस्तार हो रहा था। लोगों को रहने के लिए घर चाहिए थे। आखिर वे निर्माण कहां कराते ? जाहिर सी बात है कृषि, पार्क आदि की खाली पड़ी जमीनों पर लोगों ने निर्माण करा लिए। अमर उजाला के माध्यम से मैं शहर की विनियमितिकरण की जमीन पर निर्माण करा चुके सभी लोगों को यह साफ कर देना चाहता हूं कि प्राधिकरण किसी का भी मकान नहीं ध्वस्त नहीं कराएगा। नई महायोजना 2031 में लैंड यूज बदलकर आवासीय करने पर हमारा ज्यादा जोर है। इससे 30 से अधिक अवैध कॉलोनियों में रहने वाले हजारों परिवारों को राहत मिलेगी। शहर से सटे इलाकों में कृषि की जमीन का भू-प्रयोग बदलकर आवासीय किया जाएगा। इससे जमीन के विकल्प बढ़ेंगे और दाम भी सस्ते हो सकेंगे।
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प्रश्न: मानचित्र को लेकर निर्माण शुरू होने के बजाए पूरा होने पर जेई नोटिस देते हैं, मुख्यमंत्री भी इस कार्यप्रणाली पर सवाल उठा चुके हैं ?
जवाब:
बिल्कुल सही कह रहे हैं। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। कई जेई ऐसा करते हैं ।  मकान का निर्माण छत तक पहुंचने तक संबंधित की लाखों-करोड़ों की पूंजी फंस गई रहती है। ये इसी का फायदा उठाते हैं और निर्माण कराने वाले को नियम-कायदे की धौंस देकर परेशान करते हैं। प्राधिकरण के सभी जेई को चेता चुका हूं कि वे अपने-अपने क्षेत्र में निर्माण की नींव पड़ते ही मानचित्र की जांच करें। यदि नींव पड़ने की बजाए किसी को भी छत डालने के समय नोटिस दी जाएगी तो संबंधित जेई की जवाबदेही तय करते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। किसी भी दशा में आम आदमी का शोषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 
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प्रश्न: जीडीए की खुद की कॉलोनियों में बहुत समस्याएं हैं ?

जवाब: प्राधिकरण की सभी कॉलोनियों, व्यावसायिक कांप्लेक्स के लोग इस संबंध में मुझसे मिल सकते हैं। संबंधित कॉलोनी के आवंटियों और क्षेत्र के अभियंताओं के साथ बैठक कर बिंदुवार एक-एक समस्या पर चर्चा होगी और उसे दूर कराया जाएगा। इसकी शुरूआत भी हो चुकी है। 19 अगस्त को बुद्ध विहार पार्ट ए व्यावसायिक कांप्लेक्स के आवंटियों के साथ बैठक कर उनकी समस्याएं दूर करने के लिए योजना तैयार की गई है। हर सोमवार को मुझसे कोई भी मिल सकता है।

प्रश्न: शहर के लोगों के लिए प्राधिकरण की भविष्य की क्या-क्या योजनाएं हैं?
जवाब:
प्राधिकरण का काम सुनियोजित विकास के साथ ही शहर को सुंदर बनाने का भी है। रामगढ़ताल क्षेत्र स्थित चंपा देवी पार्क के पास लेक व्यू की ही तरह 101 फ्लैट की बहुमंजिला आवासीय योजना लांच करने की तैयारी है। खोराबार में भी टाउनशिप योजना लाई जा रही है। शहर के एंट्री प्वाइंट उसकी संपन्नता के बड़े परिचायक होते हैं। जीडीए इन सभी प्वाइंट मसलन एयरपोर्ट के पास नंदानगर रेल अंडरपास और आरकेबीके के पास स्थित पुल पर आर्नामेंटल और फसाड लाइट लगाएगा। इसी तरह यातायात तिराहे से लेकर गोरखनाथ मंदिर के थोड़ा आगे तक और महेसरा पुल पर भी ऐसी लाइटें लगेंगी। नौसड़ और राजघाट पुल पर भी लाइटें लगाई जाएंगी।

प्रश्न: शहर में पार्किंग एक बड़ी समस्या है, जीडीए भी इसके लिए कुछ प्रयास कर रहा है क्या?
जवाब:
दीवाली तक गोलघर मल्टीलेवल पार्किंग शुरू हो जाएगी। जल्द ही वहां पार्क की जाने वाली गाड़ियों का शुल्क भी निर्धारित कर दिया जाएगा। इसी तरह रामगढ़ताल परियोजना क्षेत्र स्थित नया सवेरा के पास स्थित पार्किंग स्थल को भी बड़ा किया जा रहा है। पार्किंग स्थल के पास बने महंत दिग्विजयनाथ पार्क के गेट से होते हुए पार्क का एक बड़ा कोना भी पार्किंग के इस्तेमाल में लाया जाएगा।

प्रश्न: रामगढ़ताल पर्यटन के सबसे बड़े केंद्र के तौर पर विकसित हो रहा है, क्या कुछ नया करने की तैयारी है ?
जवाब:
जी बिल्कुल, बहुत कुछ करने जा रहे हैं। पैडलेगंज स्थित गौतम बुद्ध द्वार से लेकर नया सवेरा तक सड़क के बीच डिवाइडर पर ऑर्नामेंटल लाइटें लगाई जा रही हैं। गौतम बुद्ध द्वार को फसाड और ऑर्नामेंटल लाइट से सजाया जा चुका है। रामगढ़ताल परियोजना क्षेत्र में छोटी-बड़ी करीब छह-सात वाटर बॉडी हैं। सभी का सुंदरीकरण कराया जाएगा। उनकी सफाई कराने के साथ ही किनारे-किनारे पाथ-वे बनाए जाएंगे। वहां भी बोटिंग आदि शुरू कराने के साथ ही ओपन जिम बनाया जाएगा। शुरूआत सबसे बड़ी वॉटर बॉडी से होने जा रही है। इसके लिए अवस्थापना मद से दो करोड़ रुपये भी जल्द ही मिल जाएंगे। नया सवेरा पर नियमित सफाई के साथ ही सुरक्षा के लिए  सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। फूड कोर्ट विकसित किया जाएगा। मैकडोनाल्ड जैसी बड़ी कंपनियों को आउटलेट खोलने के लिए बुलाया जा रहा है।

प्रश्न: गोलघर जीडीए टॉवर की ज्यादातर दुकानें, ऑफिस ब्लॉक एक दशक से अधिक समय से खाली हैं ?
जवाब:
इस संपत्ति के बारे में अभी ज्यादा जानकारी नहीं है। ऐसा है तो इसे अलोकप्रिय संपत्ति घोषित कर इसके दाम घटाए जाएंगे। इसपर भी खाली जगह आवंटित नहीं हुई तो इसे किराए पर देने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए शासन से अनुमति ली जाएगी।

प्रश्न: जीडीए की कार्यप्रणाली की फितरत में लोगों को चक्कर लगवाना शामिल है, इसको ठीक करने की कोई दवा है ?  
जवाब:
बहुत साफ है। शोषण के नीयत से तंत्र, फरियादियों को घुमाता है या फिर संबंधित अधिकारी-कर्मचारी काम ही नहीं करना चाहते। निस्तारण में जितनी देर होगी शोषण उतना ही बढ़ता जाता है और भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी। लोगों को अपने काम कराने होते है लिहाजा वे मजबूर हो जाते हैं। समस्या लेकर आने वालों के प्रार्थनापत्र पर चिड़िया बैठाकर उसे दूसरे के नाम खिसका देना मेरी कार्यप्रणाली नहीं है। जो भी मामले थोड़े समय से भी लंबित दिखाई पड़ते हैं, मैं उनसे जुड़े अधिकारियों, कर्मचारियों को बुला लेता हूं। 70 फीसदी मामलों में वे खुद कहते हैं कि ये काम तो होने लायक है। बाकी मामलों में निस्तारण नहीं हो पाने की वजहों को चिह्नित कर उसे दूर कराता हूं। कर्मचारियों-अभियंताओं से साफ कह चुका हूं कि मुझे, जिसे जितना कम बुलाना पड़े, उनके बेहतर काम करने का वहीं प्रमाण होगा।

प्रश्न: अभी भी तमाम लोगों में एक आम धारणा बनी हुई है कि बिना सुविधा शुल्क दिए जीडीए से मानचित्र नहीं स्वीकृत हो सकता ?
जवाब:
हां! आपकी बात सच है। लोग ऐसा सोचते हैं, मगर जल्द ही सभी की अवधारणा बदल जाएगी। दरअसल, प्राधिकरण में सर्वाधिक शिकायतें मानचित्र और नामांतरण को लेकर आती हैं। मेरा मानना है कि मामले लंबित ही नहीं रहेंगे तो कोई भी कर्मचारी या अभियंता जनता का शोषण ही नहीं कर पाएगा। यही वजह है कि मानचित्र और नामांतरण के लंबित मामलों की रोजाना मॉनीटरिंग करता हूं। इसके अलावा मेरे पास आने वाले लोगों के साथ ही रोजाना समाचारपत्रों के माध्यम से जनता से अपील करता रहता हूं कि लोग किसी भी समस्या को लेकर मुझसे सीधे मिल सकते हैं। समय तो सुबह 10 से 12 बजे तक का तय कर रखा है, मगर हर समय लोगों से मिलता रहता हूं। कभी किसी के लिए कोई रोक-टोक नहीं है। 

प्रश्न: तमाम बिल्डर ऐसे हैं, जिन्होंने कॉलोनियां बनाईं, लेकिन कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं लिया, अब समस्या जनता भुगत रही है ?

जवाब: ऐसा भी है क्या? पूरा मामला दिखवाते हैं। हर बिल्डर को कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेना चाहिए। इस तरह के कॉलोनीवासियों को सोसायटी का गठन करके कामकाज को आगे बढ़ाना चाहिए। हर स्तर पर जीडीए मददगार रहेगा। जनता की समस्या का समाधान करने के लिए ही हम बैठे हैं।  

प्रश्न: सुना है आपका बचपन और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गोरखपुर में ही हुई है?
जवाब:
जी हां! बिल्कुल सही सुना है। मैं, मूल रूप से रहने वाला तो बिहार के औरंगाबाद का हूं, मगर बचपन और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गोरखपुर में ही हुई है। मेरे पिता रेलवे के आरपीएसएफ में कार्यरत थे। मोहद्दीपुर स्थित बाल विकास निकेतन(जहां अब होटल रेडिसन ब्लू है) में प्राइमरी शिक्षा पूरी हुई। कक्षा 6वीं से 12वीं तक की पढ़ाई महात्मा गांधी इंटर कॉलेज से हुई। 2002 में इंटरमीडिएट करने के बाद प्रयागराज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर सिविल सेवा की तैयारी की और तीसरे प्रयास में आईएएस बना।

प्रश्न: शुरू से ही आईएएस बनने का लक्ष्य था या बाद में तय किया ?
जवाब:
मेरा सपना तो आटोमोबाइल सेक्टर में झंडा गाड़ने का था। जर्मनी में जाकर बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी में काम करना चाहता था। इसीलिए मैकेनिकल से इंजीनियरिंग की। चौथे सैमेस्टर में ही अशोक लेलैंड के चेन्नई यूनिट में कैंपस सलेक्शन हो गया। लगा मंजिल (जर्मनी) तक पहुंचने की राह आसान हो गई। मगर दो साल काम करने के बाद एहसास हुआ कि इस क्षेत्र में रहकर एक दायरे में बंध गया हूं। ऊब होने लगी। बड़े स्तर पर कुछ ऐसा करना चाहता था कि जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग लाभान्वित हो सकें। कुछ सीनियर और साथ के लोग सिविल सेवा की तैयारी कर रहे थे। दिल्ली जाकर उनसे मिला और फिर लक्ष्य बदल गया। 2011 में मनीपुर कैडर में आईपीएस मिला, मगर लक्ष्य आईएएस था, इसलिए छोड़ दिया। फिर तैयारी की मगर रैंक थोड़ी कम मिलने की वजह से अगले साल 2012 में फिर राजस्थान कैडर में आईपीएस मिला। हार नहीं मानी और 2013-14 में 62वीं रैंक के साथ यूपी कैडर में आईएएस बना। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के तौर पर पहली पोस्टिंग गाजियाबाद में मिली। इसके बाद उन्नाव और प्रयागराज में सीडीओ के पद पर तैनात रहा। करीब 10 महीने तक विशेष सचिव सिंचाई के पद पर रहा । इसके बाद अलीगढ़ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष पद पर तैनाती हुई। वहां नगर आयुक्त की भी जिम्मेदारी निभाई।
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