बदहाली: लॉकडाउन ने तोड़ी आधुनिक मदरसा टीचरों की कमर, कोई रिक्शा चलाने तो कोई सब्जी बेचने को मजबूर
ये कहावत तो आपने सुनी ही होगी- "पढ़ें फारसी बेचें तेल, यह देखो किस्मत का खेल"। कोरोना महामारी के इस संकट काल में गोरखपुर के आधुनिक मदरसा टीचरों का भी यही कुछ ऐसा ही हाल है। इन मदरसा टीचरों की रोजी रोटी पर इतना गहरा संकट मंडराने लगा है कि ये अपना और परिवार का पेट पालने के लिए रिक्शा चलाने और सब्जी बेचने तक को मजबूर हो गए हैं। अमर उजाला पेश कर रहा है जिले के आधुनिक मदरसा टीचरों की बदहाली पर विशेष रिपोर्ट-
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केस एक: खान साहब (पहचान जाहिर न करने को पूरा नाम नहीं) आधुनिक मदरसा टीचर हैं, लेकिन आजकल रेलवे स्टेशन से बख्शीपुर और बेनीगंज के बीच ई-रिक्शा चला रहे हैं। सामाजिक विज्ञान से एमए हैं, बीएड भी किया, 2010 में आधुनिक मदरसा शिक्षक की नौकरी लगी। वेतन नहीं मिलने के कारण जीवनयापन के लिए रिक्शा चला रहे हैं।
केस दो: शाही जी मदरसा आधुनिक टीचर हैं। लॉकडाउन लगने के बाद से सब्जी का ठेला लगाकर परिवार का गुजारा चला रहे हैं। लॉकडाउन से पहले ट्यूशन पढ़ाकर कुछ कमाई कर लेते थे। लॉकडाउन में बाहर निकलना भी बंद हो गया। प्रशासन ने सब्जी को आवश्यक वस्तु में रखा तो ठेला किराए पर लेकर सब्जी बेचने लगे, जो अब भी जारी है।
खान साहब और शाही जी जैसी ही हालत जिले के कमोबेश साढ़े चार सौ मदरसा आधुनिक टीचरों की है। अप्रैल 2017 के बाद से केंद्र सरकार की ओर से मानदेय नहीं जारी होने के कारण यह टीचर आर्थिक तंगी का शिकार हो गए हैं। परिवार चलाने के लिए यह ऐसे काम करने को मजबूर हैं, जो आधुनिक समाज में शिक्षकों की गरिमा के अनुरूप नहीं माना जा सकता। राज्य सरकार की ओर से दो तीन माह में राज्यांश जारी किया जाता है, लेकिन वह भी जरूरतों के हिसाब से नाकाफी है।
मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षक एकता समिति के जिलाध्यक्ष मो. इरफान खान पुरानी कहावत, पढ़ें फारसी बेचें तेल, यह देखो किस्मत के खेल, सुनाते हुए कहते हैं कि मदरसा आधुनिक शिक्षकों का हाल ऐसा ही है। कोई सब्जी बेच कर गुजारा कर रहा है तो कोई किराना दुकान पर सेल्समैन के तौर पर तीन हजार रुपये महीने पर काम करने को मजबूर है।
वेतन पाने के लिए लखनऊ से लेकर दिल्ली तक संघर्ष किया गया, लेकिन आज तक कोई हल नहीं निकला। मदरसा टीचर आसिफ महमूद कहते हैं कि महंगाई के इस दौर में मदरसा आधुनिक शिक्षकों का वेतन दस हजार (स्नातक) और पंद्रह हजार (परास्नातक) है। यह रकम एक परिवार चलाने के लिए काफी कम है। इसमें भी यदि आपको चालीस माह से मात्र पच्चीस फीसदी वेतन मिले तो गुजारा नामुमकिन ही है।
जो पच्चीस फीसदी यानी दो हजार और तीन हजार रुपये राज्यांश है वह भी तीन चार माह में एक बार मिलता है। मदरसा आधुनिक शिक्षक मो. आजम अंसारी कहते हैं कि मदरसा शिक्षकों की कमर कोरोना और लॉकाउन ने तोड़ दी। महामारी से पहले टीचर होम ट्यूशन कर या लिखा पढ़ी का काम कर परिवार चला रहे थे। लॉकडाउन में ट्यूशन बंद हुईं, दुकानें और संस्थान बंद होने के कारण लिखापढ़ी का काम भी खत्म हो गया।
महीनों से मानदेय नहीं मिलने के कारण पहले से ही आर्थिक तंगी से गुजर रहे टीचरों के पास परिवार चलाने के लिए ई रिक्शा, सब्जी बेचने जैसे काम करना मजबूरी हो गई। जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी आशुतोष पांडे ने बताया कि मदरसा आधुनिक शिक्षकों के मानदेय का केंद्रांश काफी समय से रुका हुआ है। केंद्रांश की धनराशि जारी होने पर शिक्षकों के खाते में ट्रांसफर कर दी जाएगी।