नई दिल्ली-दरभंगा स्पेलश ट्रेन में आग: यात्रियों की आपबीती, जलती बोगी से कूदकर बचाई जान; जले अरमान
आग बुझने के बाद ट्रेन को कानपुर तक लाया गया। वहां से जली बोगियों की जगह दूसरी बोगियां लगाईं गईं। एसी थर्ड कोच में बैठी छपरा की रहने वाली सुषमा उसी स्लीपर कोच में सवार थी, जिसमें सबसे पहले आग लगी। सुषमा ने बताया कि आग लगते ही वह अपने दोनों बच्चों के साथ किसी तरह से ट्रेन से कूदकर बाहर निकलीं।
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बुधवार शाम इटावा के पास नई दिल्ली-दरभंगा स्पेशल ट्रेन के स्लीपर कोच में आग लगी थी। आग बुझने के बाद ट्रेन को कानपुर तक लाया गया। वहां से जली बोगियों की जगह दूसरी बोगियां लगाईं गईं। एसी थर्ड कोच में बैठी छपरा की रहने वाली सुषमा उसी स्लीपर कोच में सवार थी, जिसमें सबसे पहले आग लगी।
सुषमा ने बताया कि आग लगते ही वह अपने दोनों बच्चों के साथ किसी तरह से ट्रेन से कूदकर बाहर निकलीं। पल भर में बोगी से लपटें निकलने लगीं। उनका बैग अंदर ही छूट गया। बैग में छठ पूजा के लिए खरीदे गए कपड़े, ट्रेन का टिकट, पांच हजार रुपये व अन्य सामान थे। सुषमा को एसी कोच के यात्रियों ने अपने साथ बैठाया और रास्ते में बच्चों को खाने-पीने का सामान दिया।
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स्लीपर कोच में सवार कुशीनगर के रामकोला निवासी राजेंद्र साहनी बताते हैं कि चलती ट्रेन में ही धुआं निकलने पर आग लगने का एहसास हो गया था। गनीमत थी कि ट्रेन की स्पीड कम थी और चेन पुलिंग करने पर कुछ ही देर में ट्रेन रुक गई।
गति धीमा होते ही जिसे जहां से मौका मिला, कूदकर बाहर निकल गया। ट्रेन से कूदने के कारण कुछ लोग घायल हुए तो वहीं बोगी में पीछे फंसे रह गए कुछ लोग झुलस भी गए, लेकिन खुद की जान खतरे में थी, तो बाकियों को कौन देखने वाला था।
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रेल कर्मचारियों व सुरक्षा कर्मियों ने की मदद
हादसे की सूचना पर मौके पर पहुंचे अफसरों ने घायलों व झुलसे लोगों को इलाज के लिए भिजवाने के साथ ही इस बात की घोषणा कर दी कि सभी यात्रियों को दूसरी ट्रेन से सुरक्षित घर भेजा जाएगा, इसलिए किसी को घबराने की जरूरत नहीं है। करीब ढाई घंटे बाद इस ट्रेन की जली बोगियाें को अलग कर बाकी ट्रेन को रवाना किया गया। इससे पहले सुरक्षा कर्मियों ने सभी को ट्रेन में चढ़ने के लिए कहा। जिसे जहां जगह मिली, वहीं घुस गया। कानपुर पहुंचने पर जली बोगियों की जगह तीन दूसरी बोगियां लगाई गईं। इसके बाद स्लीपर क्लास के यात्रियों को उसमें शिफ्ट किया गया।
एसी वाले यात्रियों ने दिखाया बड़ा दिल
इस हादसे के चलते करीब 250 यात्री प्रभावित हुए। इसमें से तमाम ऐसे थे, जिनके सामान व रुपये आदि भी जल गए। इसमें से 20 से अधिक ऐसी महिलाएं थीं, जिनके साथ छोटे बच्चे भी थे। इन महिलाओं को सुरक्षा कर्मियों व अन्य यात्रियों की मदद से एसी कोच में जगह दिलाई गई थी। एसी कोच में सवार यात्रियों ने मानवता दिखाते हुए इन यात्रियों के साथ न केवल हमदर्दी दिखाई, बल्कि उनकी आगे की यात्रा का भी इंतजाम कराया।
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ट्रेन रुकते ही कूदकर बाहर निकल गए। लपटों से बचकर जब खुद को सुरक्षित पाया, तब याद आया कि बैग तो अंदर ही छूट गया। उसी बैग में कपड़े, हाईस्कूल से लेकर एमए तक की मार्कशीट और अन्य जरूरी सामान थे।
- अरविंद, गोरखपुर।
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समझ लीजिए कि मौत के मुंह से बचकर निकल आए। आग बुझने के बाद जब दुबारा ट्रेन में चढ़ने को कहा गया तो पूरा शरीर कांप रहा था। कानपुर स्टेशन तक आने के बाद भी कई यात्री इतने सहमे थे, कि वहीं उतर गए। लग रहा था कि कब छपरा स्टेशन दिख जाए। - संतोष सिंह, छपरा
हमारे कोच में ही सबसे पहले आग लगी थी। हम चार-पांच लोग गेट के पास ही थे, ट्रेन धीमी होते ही कूद गए। ऐसा डर था कि जूता पहनना तक भूल गए। नंगे पैर इधर-उधर भागते रहे। दोबारा जब ट्रेन में चढ़ने की बात हुई, तब याद आया कि जूते-कपड़े, रुपये सब तो ट्रेन में ही जल गए।-लक्ष्मी, भागलपुर।