फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Gorakhpur News ›   Sale of Pichkari started from Rs 2, now reaches Rs 1000

Gorakhpur News: दो रुपये से शुरू हुई थी पिचकारी की बिक्री, अब हजार रुपये तक पहुंची

Sun, 24 Mar 2024 10:30 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर Updated Sun, 24 Mar 2024 10:30 AM IST
विज्ञापन
Sale of Pichkari started from Rs 2, now reaches Rs 1000
पीतल की पिचकारी। - फोटो : स्रोत सोशल मीडिया
होली के बदलाव की कहानी पिचकारी के बिना अधूरी है। साठ के दशक में बांस से बनी पिचकारी से होली का रंग बरसता था। बाद में उसकी जगह पीतल और फिर स्टील की पिचकारी आ गई। त्योहार पर बाजार का रंग गाढ़ा हुआ तो प्लास्टिक की अलग-अलग डिजाइन में पिचकारियां बिकने लगीं।
विज्ञापन


इस साल तो इससे भी दो कदम आगे बढ़कर रंग-गुलाल भरे पटाखे आ गए। शहर में चार पीढि़यों से पिचकारी की दुकान चलाने वाले बाबूराम कहते हैं कि लोग कैसे और किससे रंग खेलेंगे, अब यह भी बाजार तय करने लगा है।
विज्ञापन


बेलीपार क्षेत्र के भस्मा गांव के रहने वाले इतिहासकार डॉ. कृष्ण कुमार पांडेय बताते हैं कि पहले कम से कम 15 दिन पहले ही होली का माहौल बन जाता था। बाजार दूर-दूर और साप्ताहिक हुआ करते थे। ऐसे में लोग त्योहार को यादगार बनाने के लिए नए-नए उपाय करते थे।
विज्ञापन
विज्ञापन


ग्रामीण क्षेत्र में लोग बांस की पिचकारी बनाते थे, जिसके लिए बांस की गांठ, लकड़ी और कपड़े का प्रयोग होता था।
आजादी के एक दशक बाद पीतल की पिचकारी का दौर आया। हालांकि, तब यह केवल आर्थिक रूप से संपन्न लोगों के ही पास होती थी। पीतल की पिचकारी भी अलग-अलग प्रकार की बनने लगी।

शहर के पांडेय हाता में बाबूलाल की पिचकारी की थोक दुकान है। चार पीढि़यों से चल रही इस दुकान को बाबूराम चार दशक से संचालित कर रहे हैं। होली और पिचकारी की चर्चा छिड़ते ही बाबूलाल यादों पर जोर डालते हुए कहते हैं कि हमने जब दुकान पर बैठना शुरू किया तो उस वक्त पिचकारी की कीमत दो रुपये हुआ करती थी। तब नया-नया प्लास्टिक का चलन शुरू हुआ था।

स्प्रिंग वाली इस पिचकारी की बिक्री खूब होती थी। इसी दौर में स्टील की फव्वारे वाली पिचकारी आई, जो बाद में पीतल की पिचकारी का विकल्प बन गई। हालांकि, प्लास्टिक के चलन ने इसमें भी परिवर्तन किया और बाद में स्टील जैसी पिचकारी प्लास्टिक की मिलने लगी।

साहबगंज में पिचकारी बेचने वाले सुल्तान बताते हैं कि हर साल तकनीक बदल जा रही है। पहले लोग एक बार पिचकारी खरीदते थे और कई वर्ष तक उससे होली खेलते थे। लेकिन अब कंपनियां हर साल नए डिजाइन को लांच करती हैं। बच्चे भी होली के बाद पिचकारी फेंक देते हैं।

ट्रक पर भर लेते थे रंग भरा ड्रम
आर्यनगर के रहने वाले सेवानिवृत रेलकर्मी वंशीधर श्रीवास्तव बताते हैं कि पुराने जमाने में आर्यनगर, घंटाघर और धर्मशाला बाजार में लोग रंग खरीदने आते थे। जो लोग खरीदारी करने आते थे वे रंगों में नहाकर ही वापस आते थे।


इसकी वजह यह थी कि युवाओं की टोली छतों से रंग फेंक दिया करती थी। बच्चे और युवा छतों पर टब या बाल्टी में रंग भरकर रखते थे। सड़क से गुजर रहे अनजान लोगों पर भी ऊपर से रंगा बरस जाते थे। उस वक्त सिंधी समाज के लोगों के ही ज्यादा ईंट भट्ठे थे। वे ट्रकों पर ड्रम में रंग भरकर निकलते थे और जो भी रास्ते में मिलता था उसे रंग डालते जाते थे। हर कोई होली के उल्लास में मगन होता था।
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed