'आत्मनिर्भर भारत' की नजीर बनी ये बेटी, इसकी कहानी जानकर आप भी करेंगे गर्व
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यदि आत्मनिर्भर भारत की नजीर देखना चाहते हैं तो उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रोडवेज डिपो में चले आइए, यहां आपको नारी सशक्तिकरण का सटीक उदाहरण देखने के लिए मिलेगा। हम बात कर रहे हैं डिपो के परिचालकों में शामिल 23 वर्षीय कुमारी परवीन खातून सिद्दीकी की। जिन्हें मुसाफिर से लेकर आम लोग बड़ी हैरत भरी नजरों से देखते हैं।
जब ये बस में लोगों का टिकट काटती हैं, उस समय लोग इनसे कई सवाल भी करते हैं, जिनका ये बेहतर जवाब भी देती हैं। बस्ती की इस बेटी का सफर यहीं नहीं खत्म होता है, ये काम के साथ-साथ पढ़ाई भी कर रही हैं। इस बार स्नातक में इनका अंतिम वर्ष है।
बता दें कि बनकटी ब्लाक के देवरी की रहने वाली परवीन खातून के पिता मोहम्मद तौहीद सिद्दीकी कृषि करते हैं, परवीन दो बहनें व दो भाई हैं। बड़े भाई पटना में रेलवे की तैयारी कर रहे हैं, वहीं अन्य भाई व बहन पढ़ाई कर रहे हैं।
परवीन खातून ने जनवरी 2019 में बस्ती डिपो में परिचालक के तौर पर नौकरी को ज्वाइन की। प्रवीन से जब पूछा गया कि क्या इस नौकरी के लिए परिवार के लोगों ने आपत्ति नहीं जताई, तब उन्होंने बताया कि अब यह पुराना वाला भारत नहीं रहा, यह नया भारत है। अब बेटों की तरह ही बेटियों को भी बराबरी का दर्जा दिया जाता है।
ऐसा रहा था नौकरी का पहला दिन
परवीन खातून कहती हैं कि उन्होंने इसके लिए ऑनलाइन आवेदन किया था, इंटरव्यू के बाद यह नौकरी मिल गई। बताती हैं कि अभी वह पढ़ाई कर रही हैं और वो अध्यापक बनकर नई पीढ़ियों में शिक्षा की अलख जगाना चाहती हैं।
परवीन खातून ने बताया कि उनकी ड्यूटी बस्ती से सिद्धार्थनगर जाने वाली बस में लगाया गया, जब वे बस में टिकट- टिकट करते हुए यात्रियों के पास गईं, तो सब बड़ी हैरत भरी नजरों से देख रहे थे। कुछ महिलाएं तो अपनी बेटियों को इशारा कर यह कह रहीं थीं कि देखो यह भी एक बेटी है।
परवीन खातून बताती हैं कि जो मानदेय मिलता है, उसे वह अपनी पढ़ाई पर खर्च तो करती हैं, इसके साथ ही घर में अम्मी अब्बू की भी मदद करती हैं। कहती हैं कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता है, पराश्रित का मतलब पराधीनता हैं, ऐसे में सभी को आत्मनिर्भर होना चाहिए। कहती हैं कि जब हम अपने पैरों पर खड़े होते हैं, उस समय हम अन्य लोगों के लिए उदाहरण बन जाते हैं।