Vijay Diwas 2023: बंकर में फंसे थे आठ जवान, रॉकेट लांचर से उन्हें बचाने में शहीद हुए थे लेफ्टिनेंट गौतम
शहीद गौतम को पहली तैनाती जम्मू कश्मीर में मिली। चार अगस्त 1998 को जंग के दौरान साथियों को बचाने में घायल हुए और पांच अगस्त को उन्हें शहादत हासिल हुई। उनकी बहादुरी को देखते हुए वर्ष 2000 में उनके अदम्य शौर्य और साहस को देखते हुए राष्ट्रपति ने उन्हें सेना मेडल से नवाजा था।
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अमर शहीद गौतम गुरुंग की सांसें जहां देश के काम आईं वहीं अब उनकी यादें भी कइयों की जिंदगी संवार रही है। 4 अगस्त 1998 को बंकर में फंसे आठ साथियों को बचाने के दौरान रॉकेट लांचर से घायल गौतम घायल हो गए। वह 5 अगस्त 1998 को शहीद हो गए।
इसके बाद देश सेवा के जज्बे को रिटायर्ड ब्रिगेडियर पिता ने आगे बढ़ाया और शहादत पर मिली आर्थिक सहायता और पेंशन की रकम को कईयों की जिंदगी संवारने का जरिया बना डाला।
भारत नेपाल मैत्री समाज के अध्यक्ष अनिल कुमार गुप्ता ने बताया कि शहीद के ब्रिगेडियर पिता ने देहरादून में बेटे के नाम पर शहीद गौतम गुरुंग ट्रस्ट की स्थापना की है। उनके नाम पर वहां बॉक्सिंग क्लब भी चल रहा। यहां से प्रशिक्षित कई युवा सरकारी नौकरी में हैं।
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बहन मीनाक्षी की अधूरी ख्वाहिश
उन्होंने बताया कि गौतम की चार पीढ़ियों ने लगातार देश की सेवा की है। गौतम जीआरडी के पूर्व कमांडेंट पीएस गुरुंग और पुष्पलता के एकलौते बेटे थे। देहरादून में 23 अगस्त 1973 को जन्मे गौतम एमबीए के बाद सेना में भर्ती हुए। पिता की बटालियन 3/4 गोरखा रायफल्स से 1997 में कमीशन लिया।
पहली तैनाती जम्मू कश्मीर में मिली। 4 अगस्त 1998 को जंग के दौरान साथियों को बचाने में घायल हुए और 5 अगस्त को उन्हें शहादत हासिल हुई। उनकी बहादुरी को देखते हुए वर्ष 2000 में उनके अदम्य शौर्य और साहस को देखते हुए राष्ट्रपति ने उन्हें सेना मेडल से नवाजा।
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गौतम गुरुंग की छोटी बहन मीनाक्षी रक्षाबंधन आने पर तड़प उठती हैं। उन्होंने जिस शाम भाई को भेजने के लिए राखी खरीदी थी, उसी शाम भाई के शहीद होने की खबर आई। वो राखी आज भी मीनाक्षी ने संभाल कर रखी है।