'भारत छोड़ो आंदोलन' में सीताराम ने निभाई थी अहम भूमिका, आजादी की लड़ाई में सब कुछ कर दिया था दान
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आजादी की लड़ाई में बस्ती जिले के रणबांकुरों की गाथा आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है। इसी पन्नों में शामिल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित सीताराम शुक्ल भी एक किरदार हैं। जंग-ए-आजादी में इनकी भूमि काफी महत्वपूर्ण थी। उन्होंने इस लड़ाई में अपना सब कुछ दान कर दिया था। यही नहीं भारत छोड़ों आंदोलन में इन्हें दो वर्ष का कारावास भी हुआ, इसके साथ ही अन्य आंदोलनों में भी इन्हें जेल जाना पड़ा।
सीताराम शुक्ल का जन्म बस्ती-बांसी मुख्य मार्ग पर बस्ती से 13 किमी दूर भादी खुर्द गांव में 1897 में हुआ था। शुक्ल चौमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे वक्ता, गायक, वादक, घुड़सवार व आजाद भारत के कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र से लगातार दो बार विधायक भी रहे। इनके पिता का नाम रंगनाथ शुक्ल व माता का नाम सूर्यकली शुक्ल था। उनकी एक और पत्नी किशोरी शुक्ल वह भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थी।
बस्ती में कांग्रेस की नींव रखने वाले सीताराम शुक्ल गुलामी के कारण प्राइमरी शिक्षा भी पूरी नहीं कर सके, लेकिन स्वाध्याय से हिंदी, उर्दू, संस्कृत की जानकारी इनको हासिल थी। वर्ष 1919 में नासिक में कांग्रेस अधिवेशन में शुक्ल ने व्याख्यान दिया, जिसके बाद वे ब्रिटिश सरकार की निगाह में आ गए।
1922 के असहयोग आंदोलन में शुक्ल को एक वर्ष, 1930 में नमक सत्याग्रह में छह माह, 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में छह माह, 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में तीन माह व 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में दो वर्ष का कारावास हुआ।
नेहरू ने की थी गांधीनगर में विशाल जनसभा
उनकी पत्नी किशोरी शुक्ल को 1932 में चार माह व 1941 में एक माह का कारावास हुआ था। 19 सितंबर 1921 नेहरू की एक जनसभा जो कि गोरखपुर में होना निश्चित हुआ था, लेकिन इस बात की खबर अंग्रेजों को पता लग गई। जिसके बाद अंग्रेजों ने कार्यक्रम होने से पूर्व ही हाई अलर्ट जारी कर दिया। कार्यक्रम को निरस्त कर गिरफ्तारी का आदेश दे दिया। गिरफ्तारी से बचने के लिए पांच वर्ष की इंदिरा गांधी को गोद में लेकर पैदल ही छिपते-छिपाते नेहरू जी शुक्ल के घर पहुंचे।
20 सितंबर को शुक्ल के घर पर ही जिला कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ। जिसमें रघुपति सहाय, फिराक गोरखपुरी को अध्यक्ष, भगवती प्रसाद दुबे को उपाध्यक्ष, प्रसिद्ध आर्य समाजी देवव्रत को महामंत्री और सीताराम शुक्ल को सहयोगी बनाया गया। 21 सितंबर 1921 को नेहरू ने गांधीनगर में एक विशाल जनसभा की।
इस कार्यक्रम के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने विदेशी वस्तु की होली जलाई व अंग्रेज सरकार की नौकरी को छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। शुक्ल जी आजादी के ऐसे दीवाने थे जिन्होंने वर्ष 1922 से 1942 तक सारी संपत्ति बेचकर अपना सब कुछ दान कर दिया।