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भारतीयता से दूर रखा गया आजादी की लड़ाई का इतिहास : प्रो. हिमांशु
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भारतीयता से दूर रखा गया आजादी की लड़ाई का इतिहास : प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी
गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में आचार्य प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी ने कहा, स्वतंत्रता प्राप्ति और इसके बाद के भारतीय इतिहास लेखन को भारतीयता से दूर रखा गया। इसलिए भारतीय इतिहास लेखन की दृष्टि ही ठीक नहीं रही।
शनिवार को महाराणा प्रताप पीजी कॉलेज, जंगल धूषण में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली और भारतीय इतिहास संकलन समिति के संयुक्त तत्वावधान में संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। राज्य सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही ने कहा कि भारतीय दार्शनिक परंपरा व ज्ञान ने विदेश में भी अपनी छाप छोड़ी है। महात्मा बुद्ध, श्रीकृष्ण, पतंजलि, गुरु गोरखनाथ व आचार्य रजनीश उस परंपरा से आते हैं जिससे भारतीयता को बल मिलता है।
अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि भारत के इतिहास को भारतीय परिप्रेक्ष्य में लिखने व देखने की जरूरत है। अध्यक्षता करते हुए हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानंद गुप्त ने कहा कि भारत को तोड़ने के लिए हमारे इतिहास और भाषा को तोड़ा गया क्योंकि यही वह दो माध्यम हैं, जो किसी भी देश को मजबूत या कमजोर कर सकते हैं। उद्घाटन सत्र के बाद संगोष्ठी के पहले और दूसरे तकनीकी सत्र में एक दर्जन से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
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इन तकनीकी सत्रों में जयप्रकाश विश्वविद्यालय के छपरा के आचार्य प्रो. राजेश नायक, गणेश राय पीजी कॉलेज डो भी जौनपुर के सहायक आचार्य डॉ. प्रवीण त्रिपाठी, गोरखपुर विश्वविद्यालय के सह आचार्य डॉ. मनोज तिवारी, प्रो. कमलेश गौतम आदि ने भी विचार रखे। तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. दिनेश सिंह ने की। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. सुबोध मिश्र ने किया। आभार ज्ञापन कॉलेज प्राचार्य डॉ. प्रदीप कुमार राव ने किया। इस दौरान डॉ. अजय सिंह, डॉ. शचींद्र मोहन, डॉ. सुधाकर लाल श्रीवास्तव, डॉ. कन्हैया सिंह, डॉ. सर्वेश्वर शुक्ला, डॉ. रितेश्वर तिवारी, जय गोपाल मद्धेशिया, अजय यादव, अस्मित शर्मा, पवन सिंह आदि ने शोधपत्र प्रस्तुत किया।
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गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में आचार्य प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी ने कहा, स्वतंत्रता प्राप्ति और इसके बाद के भारतीय इतिहास लेखन को भारतीयता से दूर रखा गया। इसलिए भारतीय इतिहास लेखन की दृष्टि ही ठीक नहीं रही।
शनिवार को महाराणा प्रताप पीजी कॉलेज, जंगल धूषण में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली और भारतीय इतिहास संकलन समिति के संयुक्त तत्वावधान में संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। राज्य सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही ने कहा कि भारतीय दार्शनिक परंपरा व ज्ञान ने विदेश में भी अपनी छाप छोड़ी है। महात्मा बुद्ध, श्रीकृष्ण, पतंजलि, गुरु गोरखनाथ व आचार्य रजनीश उस परंपरा से आते हैं जिससे भारतीयता को बल मिलता है।
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अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि भारत के इतिहास को भारतीय परिप्रेक्ष्य में लिखने व देखने की जरूरत है। अध्यक्षता करते हुए हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानंद गुप्त ने कहा कि भारत को तोड़ने के लिए हमारे इतिहास और भाषा को तोड़ा गया क्योंकि यही वह दो माध्यम हैं, जो किसी भी देश को मजबूत या कमजोर कर सकते हैं। उद्घाटन सत्र के बाद संगोष्ठी के पहले और दूसरे तकनीकी सत्र में एक दर्जन से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
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इन तकनीकी सत्रों में जयप्रकाश विश्वविद्यालय के छपरा के आचार्य प्रो. राजेश नायक, गणेश राय पीजी कॉलेज डो भी जौनपुर के सहायक आचार्य डॉ. प्रवीण त्रिपाठी, गोरखपुर विश्वविद्यालय के सह आचार्य डॉ. मनोज तिवारी, प्रो. कमलेश गौतम आदि ने भी विचार रखे। तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. दिनेश सिंह ने की। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. सुबोध मिश्र ने किया। आभार ज्ञापन कॉलेज प्राचार्य डॉ. प्रदीप कुमार राव ने किया। इस दौरान डॉ. अजय सिंह, डॉ. शचींद्र मोहन, डॉ. सुधाकर लाल श्रीवास्तव, डॉ. कन्हैया सिंह, डॉ. सर्वेश्वर शुक्ला, डॉ. रितेश्वर तिवारी, जय गोपाल मद्धेशिया, अजय यादव, अस्मित शर्मा, पवन सिंह आदि ने शोधपत्र प्रस्तुत किया।