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Gorakhpur News: गोरखपुर के कई धंधेबाज हिमाचल, दिल्ली, हरियाणा में बनवाते हैं दवाएं
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भालोटिया मार्केट से आसपास के जिलों में खपती हैं दवाएं
60 प्रतिशत तक मिलता है मार्जिन, दुकानदार 20 से 30 प्रतिशत तक दे देते हैं छूट
ऑनलाइन बाजार में तेजी के बाद से बढ़ी कालाबाजारी, दुकानदारी छोड़ धंधेबाजी में उतरे कई
गोरखपुर। दिल्ली में पकड़ा गया नकली दवाओं का जाल पूर्वांचल में गहराई तक फैला है। चर्चा है कि गोरखपुर के कई धंधेबाज दिल्ली के अलावा हिमाचल और हरियाणा की कुछ थर्ड पार्टी मैनुफैक्चरिंग कंपनियों से दवाएं बनवाते हैं। किसी न किसी ब्रांड के नाम की इन नकली दवाओं को भालोटिया मार्केट के जरिये आसपास के जिलों के ग्रामीण क्षेत्र में पहुंचा देते हैं। थोक विक्रेताओं को इस पर 60 प्रतिशत तक कमीशन मिलता है। फुटकर विक्रेता भी 30 प्रतिशत तक मार्जिन लेकर इसे बेच देते हैं।
भालोटिया मार्केट में लगभग हर बड़ी कंपनी की दवाएं बिकती हैं। गोरखपुर-बस्ती मंडल के अलावा बिहार के जिले गोपालगंज और पश्चिमी चंपारण में भी यहां से दवाएं जाती हैं। इस दवा बाजार से जुड़े पुराने विक्रेताओं का कहना है कि पहले केवल नशीली दवाओं में ही हेरफेर का खेल होता था, लेकिन साल 2020 आते-आते दवा बाजार में भी ऑनलाइन कारोबार ने गहरी पैठ बना ली। छोटे दुकानदार हों या मरीज, अधिकांश लोग ऑनलाइन ऑर्डर करने लगे। इसका असर बाजार पर पड़ा। अब जिनकी दुकानदारी प्रभावित हुई, उसमें से कुछ ने कारोबार ही बदल लिया तो वहीं कुछ शातिरों ने इसमें अपना धंधा खोज लिया।
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एमआर और दवा विक्रेताओं के गठजोड़ से शुरू हुआ खेल
बाजार के सूत्र बताते हैं कुछ दवा विक्रेता कंपनियों से जुड़े प्रतिनिधियाें ने नौकरी छोड़ी और वे दिल्ली से सीधे भालोटिया में माल सप्लाई करने लगे। वे कंपनी के मैनुफैक्चरिंग सेंटर से ही दवा खरीदते और अपने कमीशन के आधार पर दवा गोरखपुर पहुंचा देते थे। कोविड संकट के दौरान यह कारोबार भी प्रभावित हो गया। इसके बाद इन लोगों ने थर्ड पार्टी मैनुफैक्चरर को पकड़ा और नया खेल शुरू हो गया।
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फार्मूला पर बनाते हैं दवाएं
कई बड़ी कंपनियां अब अपने ब्रांड की दवाएं थर्ड पार्टी मैनुफैक्चरर्स से बनवाती हैं। इस दवा को कंपनी अपने सेल्स एवं मार्केटिंग टीम के जरिये बाजार तक पहुंचाती है। निर्माता कंपनी को केवल साल्ट की जानकारी देनी होती है। धंधेबाज इसी व्यवस्था का फायदा उठाते हैं। वे दवा वहां से अपने लिए भी बनवा लेते हैं। ऐसा करने पर धंधेबाजों को कोई अतिरिक्त खर्च नहीं देना होता। बल्कि उस ब्रांड के नाम पर सारी दवाएं बिक जाती हैं।
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केवल मिस ब्रांड का दर्ज होता है केस
एक दवा विक्रेता ने बताया कि इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका औषधि प्रशासन विभाग की है। जैसे ही इस तरह की दवा पकड़ी जाती है तो दवा का सैंपल जांच के लिए भेजा जाता है। रिपोर्ट में साल्ट मानक से कम मिलते हैं, जिसे अधोमानक मानते हुए कार्रवाई होती है। दूसरी निर्माता कंपनी की तरफ से आपत्ति आई तो इसे मिस ब्रांड की श्रेणी में मानते हुए केस दर्ज कराया जाता है। दोनों ही प्रकरण में कोई बड़ी सजा नहीं होने की वजह से धंधेबाज आराम से धंधा करते रहते हैं।
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कोट
कुछ दिन पहले ही गोरखपुर में दवाओं की नियमित जांच नहीं करने के आरोप में ड्रग इंस्पेक्टर व संबंधित कर्मचारी को शासन स्तर से निलंबित किया गया है। नशीली और नकली दवाओं की जांच के लिए प्रदेश स्तर पर टास्क फोर्स भी गठित की गई है। दिल्ली से नकली दवा आने की शिकायत मिली तो छापा मारा जाएगा।
- पूरनचंद, सहायक आयुक्त औषधि
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60 प्रतिशत तक मिलता है मार्जिन, दुकानदार 20 से 30 प्रतिशत तक दे देते हैं छूट
ऑनलाइन बाजार में तेजी के बाद से बढ़ी कालाबाजारी, दुकानदारी छोड़ धंधेबाजी में उतरे कई
गोरखपुर। दिल्ली में पकड़ा गया नकली दवाओं का जाल पूर्वांचल में गहराई तक फैला है। चर्चा है कि गोरखपुर के कई धंधेबाज दिल्ली के अलावा हिमाचल और हरियाणा की कुछ थर्ड पार्टी मैनुफैक्चरिंग कंपनियों से दवाएं बनवाते हैं। किसी न किसी ब्रांड के नाम की इन नकली दवाओं को भालोटिया मार्केट के जरिये आसपास के जिलों के ग्रामीण क्षेत्र में पहुंचा देते हैं। थोक विक्रेताओं को इस पर 60 प्रतिशत तक कमीशन मिलता है। फुटकर विक्रेता भी 30 प्रतिशत तक मार्जिन लेकर इसे बेच देते हैं।
भालोटिया मार्केट में लगभग हर बड़ी कंपनी की दवाएं बिकती हैं। गोरखपुर-बस्ती मंडल के अलावा बिहार के जिले गोपालगंज और पश्चिमी चंपारण में भी यहां से दवाएं जाती हैं। इस दवा बाजार से जुड़े पुराने विक्रेताओं का कहना है कि पहले केवल नशीली दवाओं में ही हेरफेर का खेल होता था, लेकिन साल 2020 आते-आते दवा बाजार में भी ऑनलाइन कारोबार ने गहरी पैठ बना ली। छोटे दुकानदार हों या मरीज, अधिकांश लोग ऑनलाइन ऑर्डर करने लगे। इसका असर बाजार पर पड़ा। अब जिनकी दुकानदारी प्रभावित हुई, उसमें से कुछ ने कारोबार ही बदल लिया तो वहीं कुछ शातिरों ने इसमें अपना धंधा खोज लिया।
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एमआर और दवा विक्रेताओं के गठजोड़ से शुरू हुआ खेल
बाजार के सूत्र बताते हैं कुछ दवा विक्रेता कंपनियों से जुड़े प्रतिनिधियाें ने नौकरी छोड़ी और वे दिल्ली से सीधे भालोटिया में माल सप्लाई करने लगे। वे कंपनी के मैनुफैक्चरिंग सेंटर से ही दवा खरीदते और अपने कमीशन के आधार पर दवा गोरखपुर पहुंचा देते थे। कोविड संकट के दौरान यह कारोबार भी प्रभावित हो गया। इसके बाद इन लोगों ने थर्ड पार्टी मैनुफैक्चरर को पकड़ा और नया खेल शुरू हो गया।
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फार्मूला पर बनाते हैं दवाएं
कई बड़ी कंपनियां अब अपने ब्रांड की दवाएं थर्ड पार्टी मैनुफैक्चरर्स से बनवाती हैं। इस दवा को कंपनी अपने सेल्स एवं मार्केटिंग टीम के जरिये बाजार तक पहुंचाती है। निर्माता कंपनी को केवल साल्ट की जानकारी देनी होती है। धंधेबाज इसी व्यवस्था का फायदा उठाते हैं। वे दवा वहां से अपने लिए भी बनवा लेते हैं। ऐसा करने पर धंधेबाजों को कोई अतिरिक्त खर्च नहीं देना होता। बल्कि उस ब्रांड के नाम पर सारी दवाएं बिक जाती हैं।
केवल मिस ब्रांड का दर्ज होता है केस
एक दवा विक्रेता ने बताया कि इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका औषधि प्रशासन विभाग की है। जैसे ही इस तरह की दवा पकड़ी जाती है तो दवा का सैंपल जांच के लिए भेजा जाता है। रिपोर्ट में साल्ट मानक से कम मिलते हैं, जिसे अधोमानक मानते हुए कार्रवाई होती है। दूसरी निर्माता कंपनी की तरफ से आपत्ति आई तो इसे मिस ब्रांड की श्रेणी में मानते हुए केस दर्ज कराया जाता है। दोनों ही प्रकरण में कोई बड़ी सजा नहीं होने की वजह से धंधेबाज आराम से धंधा करते रहते हैं।
कोट
कुछ दिन पहले ही गोरखपुर में दवाओं की नियमित जांच नहीं करने के आरोप में ड्रग इंस्पेक्टर व संबंधित कर्मचारी को शासन स्तर से निलंबित किया गया है। नशीली और नकली दवाओं की जांच के लिए प्रदेश स्तर पर टास्क फोर्स भी गठित की गई है। दिल्ली से नकली दवा आने की शिकायत मिली तो छापा मारा जाएगा।
- पूरनचंद, सहायक आयुक्त औषधि