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Gorakhpur News: संविधान को देंगे सर्वोच्च सम्मान तो और मजबूत होगा लोकतंत्र
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गोरखपुर। मुख्यमंत्री एवं गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सभी भारतीयों को अपने लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों पर चलकर तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था पर गौरव की अनुभूति करनी चाहिए। हमारा लोकतंत्र तभी तक सुरक्षित है, जब तक हमारा संविधान सुरक्षित है। संविधान को जाति, मत, मजहब और क्षेत्र से ऊपर उठकर सुरक्षित-संरक्षित रखने का दायित्व सभी लोगों को उठाना होगा। हम संविधान को सर्वोच्च सम्मान देते हुए आगे बढ़ेंगे तो हमारा लोकतंत्र और मजबूत-पुष्ट होगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रविवार को गोरखनाथ मंदिर में महंत दिग्विजयनाथ एवं महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित ‘लोकतंत्र की जननी है भारत’ विषयक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को लेकर वैदिक कालखंड से रामायणकालीन और महाभारतकालीन तक कई उद्धरण देखने को मिलते हैं। भारत के लोकतंत्र में प्राचीन समय से लेकर आज तक जनता की आवाज और जनता के हित को ही सर्वोपरि रखा गया है।
उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता में हमेशा ही यह कह गया है कि प्रजा का सुख ही राजा का दायित्व है। रामायण काल में भगवान श्रीराम ने भी अक्षरशः जनता की आवाज को महत्व दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने भी खुद को कभी राजा नहीं समझा। द्वारिका में जब अंर्तद्वंद शरू हुआ तब इस परिषद के सदस्य आपस में लड़कर मर-मिट गए। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने परिषद के सदस्यों की दुर्गति पर कहा था कि राज्य के नियम प्रत्येक नागरिक पर समान रूप से लागू होते हैं।
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सीएम योगी में दिखती है रामराज की भावना : हरिवंश नारायण
गोरखपुर। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने कहा कि लोकतंत्र के संस्कार पांच हजार वर्ष पुराने भारतीय मूल्यों से गढ़े गए हैं। सही मायने में भारतीय मूल्यों और संस्कारों से ही लोकतंत्र चल रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को रामराज की संकल्पना साकार करने वाला बताते हुए कहा कि रामराज की भावना सीएम योगी में दिखती है। समान रूप से सबको न्याय, सुरक्षा के पुरातन भारतीय मूल्य इनकी कार्यपद्धति में नजर आते हैं।
उपसभापति ने ‘लोकतंत्र की जननी है भारत’ विषयक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि कहा कि भारत को लोकतंत्र की जननी इसलिए कहा जाता है कि यहां प्राचीनकाल से गांव स्तर तक लोकतंत्र सम्मत आत्मशासन की व्यवस्था थी। जनजातीय क्षेत्रों में भी लोकतांत्रिक मूल्यों वाली स्थानीय परिषदें थीं। भारत के भक्ति आंदोलन ने भी लोकतंत्र की अलख जगाकर इसे संपुष्ट किया। कहा कि खुलकर अपनी बात रखना ही लोकतंत्र का यथार्थ है और यह मूल्य भारत की हजारों वर्षों की परंपरा में निहित रहे। भारतीय लोकतंत्र में जनता को हर प्रकार की आजादी के साथ खामी को भी ठीक करने की गुंजाइश है। उन्होंने कहा कि अतीत के महापुरुषों को याद करना भविष्य के लिए प्रेरणा देता है। महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ का जीवन भारतीय मूल्यों के प्रति समर्पित रहा।
भारत में रही है त्याग और नैतिकता की परंपरा
राज्यसभा के उपसभापति ने कहा कि भारत में वेद, पुराण, उपनिषद की और ऋषियों की परंपरा के मूल्य थे। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में धर्म मार्गदर्शक की भूमिका में था इसलिए हमारे यहां आततायी शासकों का वर्णन नहीं मिलता। राजा, देवता और जनता सभी धर्म से बंधे थे। भारत में त्याग और नैतिकता की परंपरा रही है। इसीलिए राजा सर्वशक्तिमान होकर भी स्वेच्छाचारी नहीं था। चक्रवर्ती सम्राट को भी धर्मदंड से चेतावनी दी जाती थी।
अब्राहम लिंकन के 2700 पूर्व प्रजातंत्र का उल्लेख
उपसभापति ने कहा कि अब्राहम लिंकन द्वारा लोकतंत्र की परिभाषा देने से 2700 वर्ष पूर्व कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है। अशोक के धौली शिलालेख में लिखा है- सारी प्रजा मेरी संतान है। यह सब लोकतंत्र के मूल्य ही तो हैं। अथर्ववेद में भी लोकतांत्रिक प्रणाली का उल्लेख मिलता है। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश इतिहासकार थॉमसन ने कहा था कि लंदन के हाउस ऑफ कॉमंस के नियम भारत की पुरानी सभाओं से लिए गए लगते हैं। जार्ज बर्नाड शॉ ने भी आश्चर्य जताते हुए कहा था कि ग्रीक और रोम की सभ्यता मिट गई, लेकिन भारत की सभ्यता, संस्कृति कैसे बची रही, यह रहस्यमय है। वास्तव में इसका सीक्रेट यह है कि भारत की सभ्यता और संस्कृति वेदों, पुराणों की है, ऋषियों की है। भारत की सभ्यता, संस्कृति पुराने मूल्यों से बची रही।
भारत में लोकतांत्रिक शासन की परंपरा अति प्राचीन : प्रो. सदानंद
सम्मेलन में विषय प्रवर्तन करते हुए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानंद गुप्त ने कहा कि भारत में लोकतांत्रिक शासन की परंपरा अति प्राचीन है। भारत में लोकतंत्र का सिद्धांत वेदों से निकला है। विश्व में सबसे पहले कहीं लोकतंत्र के भाव का प्रादुर्भाव हुआ तो वह भारत ही है। सम्मेलन को सवाई, आगरा के ब्रह्मचारी दास लाल और सुग्रीव किलाधीश अयोध्या के स्वामी विश्वेष प्रपन्नाचार्य ने भी संबोधित किया।
इस अवसर पर गोरखनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ, अयोध्या से आए महंत सुरेश दास, कटक से आए महंत शिवनाथ, काशी से आए महामंडलेश्वर संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा, मिथिलेशनाथ, राममिलन दास, कर्नाटक से आए भयंकरनाथ, अहमदाबाद से आए कमलनाथ, रविंद्रदास आदि भी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रविवार को गोरखनाथ मंदिर में महंत दिग्विजयनाथ एवं महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित ‘लोकतंत्र की जननी है भारत’ विषयक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को लेकर वैदिक कालखंड से रामायणकालीन और महाभारतकालीन तक कई उद्धरण देखने को मिलते हैं। भारत के लोकतंत्र में प्राचीन समय से लेकर आज तक जनता की आवाज और जनता के हित को ही सर्वोपरि रखा गया है।
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उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता में हमेशा ही यह कह गया है कि प्रजा का सुख ही राजा का दायित्व है। रामायण काल में भगवान श्रीराम ने भी अक्षरशः जनता की आवाज को महत्व दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने भी खुद को कभी राजा नहीं समझा। द्वारिका में जब अंर्तद्वंद शरू हुआ तब इस परिषद के सदस्य आपस में लड़कर मर-मिट गए। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने परिषद के सदस्यों की दुर्गति पर कहा था कि राज्य के नियम प्रत्येक नागरिक पर समान रूप से लागू होते हैं।
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सीएम योगी में दिखती है रामराज की भावना : हरिवंश नारायण
गोरखपुर। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने कहा कि लोकतंत्र के संस्कार पांच हजार वर्ष पुराने भारतीय मूल्यों से गढ़े गए हैं। सही मायने में भारतीय मूल्यों और संस्कारों से ही लोकतंत्र चल रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को रामराज की संकल्पना साकार करने वाला बताते हुए कहा कि रामराज की भावना सीएम योगी में दिखती है। समान रूप से सबको न्याय, सुरक्षा के पुरातन भारतीय मूल्य इनकी कार्यपद्धति में नजर आते हैं।
उपसभापति ने ‘लोकतंत्र की जननी है भारत’ विषयक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि कहा कि भारत को लोकतंत्र की जननी इसलिए कहा जाता है कि यहां प्राचीनकाल से गांव स्तर तक लोकतंत्र सम्मत आत्मशासन की व्यवस्था थी। जनजातीय क्षेत्रों में भी लोकतांत्रिक मूल्यों वाली स्थानीय परिषदें थीं। भारत के भक्ति आंदोलन ने भी लोकतंत्र की अलख जगाकर इसे संपुष्ट किया। कहा कि खुलकर अपनी बात रखना ही लोकतंत्र का यथार्थ है और यह मूल्य भारत की हजारों वर्षों की परंपरा में निहित रहे। भारतीय लोकतंत्र में जनता को हर प्रकार की आजादी के साथ खामी को भी ठीक करने की गुंजाइश है। उन्होंने कहा कि अतीत के महापुरुषों को याद करना भविष्य के लिए प्रेरणा देता है। महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ का जीवन भारतीय मूल्यों के प्रति समर्पित रहा।
भारत में रही है त्याग और नैतिकता की परंपरा
राज्यसभा के उपसभापति ने कहा कि भारत में वेद, पुराण, उपनिषद की और ऋषियों की परंपरा के मूल्य थे। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में धर्म मार्गदर्शक की भूमिका में था इसलिए हमारे यहां आततायी शासकों का वर्णन नहीं मिलता। राजा, देवता और जनता सभी धर्म से बंधे थे। भारत में त्याग और नैतिकता की परंपरा रही है। इसीलिए राजा सर्वशक्तिमान होकर भी स्वेच्छाचारी नहीं था। चक्रवर्ती सम्राट को भी धर्मदंड से चेतावनी दी जाती थी।
अब्राहम लिंकन के 2700 पूर्व प्रजातंत्र का उल्लेख
उपसभापति ने कहा कि अब्राहम लिंकन द्वारा लोकतंत्र की परिभाषा देने से 2700 वर्ष पूर्व कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है। अशोक के धौली शिलालेख में लिखा है- सारी प्रजा मेरी संतान है। यह सब लोकतंत्र के मूल्य ही तो हैं। अथर्ववेद में भी लोकतांत्रिक प्रणाली का उल्लेख मिलता है। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश इतिहासकार थॉमसन ने कहा था कि लंदन के हाउस ऑफ कॉमंस के नियम भारत की पुरानी सभाओं से लिए गए लगते हैं। जार्ज बर्नाड शॉ ने भी आश्चर्य जताते हुए कहा था कि ग्रीक और रोम की सभ्यता मिट गई, लेकिन भारत की सभ्यता, संस्कृति कैसे बची रही, यह रहस्यमय है। वास्तव में इसका सीक्रेट यह है कि भारत की सभ्यता और संस्कृति वेदों, पुराणों की है, ऋषियों की है। भारत की सभ्यता, संस्कृति पुराने मूल्यों से बची रही।
भारत में लोकतांत्रिक शासन की परंपरा अति प्राचीन : प्रो. सदानंद
सम्मेलन में विषय प्रवर्तन करते हुए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानंद गुप्त ने कहा कि भारत में लोकतांत्रिक शासन की परंपरा अति प्राचीन है। भारत में लोकतंत्र का सिद्धांत वेदों से निकला है। विश्व में सबसे पहले कहीं लोकतंत्र के भाव का प्रादुर्भाव हुआ तो वह भारत ही है। सम्मेलन को सवाई, आगरा के ब्रह्मचारी दास लाल और सुग्रीव किलाधीश अयोध्या के स्वामी विश्वेष प्रपन्नाचार्य ने भी संबोधित किया।
इस अवसर पर गोरखनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ, अयोध्या से आए महंत सुरेश दास, कटक से आए महंत शिवनाथ, काशी से आए महामंडलेश्वर संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा, मिथिलेशनाथ, राममिलन दास, कर्नाटक से आए भयंकरनाथ, अहमदाबाद से आए कमलनाथ, रविंद्रदास आदि भी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।