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Gorakhpur News: सुरों की महफिल... कथक पर थिरकता संपन्न हुआ गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल

Mon, 23 Dec 2024 01:21 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 23 Dec 2024 01:21 AM IST
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Gorakhpur news: A gathering of tunes... Gorakhpur Literary Festival concluded with dance on Kathak.
गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल के दूसरे दिन अलग-अलग सत्रों में साहित्य, संगीत, मीडिया और अभिनय के विभिन्न पहलुओं पर विमर्श हुआ। साहित्य की गंभीरता पर साहित्यकारों ने अपने अनुभव साझा किए तो अभिनय की बारीकियों पर बाॅलीवुड अभिनेता मकरंद देशपांडे ने चर्चा की। शाम को सुरों की महफिल सजी तो कथक पर कलाकारों के थिरकते पांव ने सबका ध्यान आकर्षित किया।
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जीवन में हास्य खत्म होने के बाद भी जो हंसता है वही असली विजेता: मकरंद देशपांडे

गोरखपुर। बाॅलीवुड अभिनेता मकरंद देशपांडे ने कहा कि कला वहीं है जहां सवाल है, अगर सवाल है तो जवाब भी वहीं है। यदि आपने जीवन को जीना सीख लिया तो समझो कि कला सीख ली। जीवन में हास्य खत्म होने के बाद भी जो हंसता है वही असली विजेता है। आपके अनुभव आपके जीवन और आपकी कला, इन दोनों को प्रभावित करते हैं।
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अभिनेता मकरंद पांडे रविवार को गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल के चौथे सत्र गुफ्तगू में अभिनय और कला से जुड़े अनुभव साझा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमें भविष्य की पीड़ा, वर्तमान से प्रश्न और भविष्य की चिंता से मुक्त होकर जीवन जीना चाहिए। मुझे आज भी नहीं पता मेरा कॅरियर क्या है। इतना पता है कि जब रात को सोता हूं तो दिन भर क्या किया इसका बोझ नहीं होता है। सुबह उठना हो तो क्या करना है यह भी बोझिल मन से नहीं करता। उन्होंने कहा कि बचपन में क्रिकेटर था, स्कूल में एक बार एक्टिंग की थी। कॉलेज में बतौर क्रिकेटर दाखिल हुआ। क्लब के लिए ऑस्ट्रेलिया भी गया था। मैंने सोचा था कि मुझे कुछ ऐसा करना ही नहीं है जहां से रिटायर होना है इसलिए ग्राउंड पर जाना छोड़ दिया। कहा कि जीवन जीने में आपको कुछ नहीं करना है बस जीवन के साथ रहना है। जीवंतता रखनी है। कला और संस्कृति न रहे तो तमाम पुल टूट सकते हैं।
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उन्होंने कहा कि उपनिषद, भागवत रामायण ऐसे ग्रंथ पढ़ने के बाद एक बात समझ में आई की ड्रामा कहां है। ड्रामा मात्र उस में नहीं है जहां दिख रहा है, यह हर घटना में, हर अनुभव में है। मैं रोल चुनता नहीं हूं बल्कि रोल के लिए तैयार होता रहता हूं। उसके बाद लोग मुझे कास्ट कर लेते हैं। गोरखनाथ मंदिर में दर्शन करते समय मुझे योगी आदित्यनाथ के बारे में लगा कि यह अद्भुत बात है कि एक व्यक्तित्व संत के रूप में भगवान के कार्य के लिए भी उपयोगी है और मुख्यमंत्री के रूप में इंसान के लिए भी। सत्र संचालक डॉ. प्रियंका श्रीवास्तव और सूत्रधार शुभेंद्र सत्यदेव रहे।
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युवा रचनाकारों के गीतों से सत्र का आगाज
लिटरेरी फेस्टिवल के दूसरे दिन का शुभारंभ नवोत्पल के ''''नए पत्ते, नई खुशबू'''' नामक सत्र से हुआ। सत्र में महीप श्रीवास्तव, नेहा मिश्रा, अनुराग यादव और नित्या त्रिपाठी जैसे युवा रचनाकारों ने अपनी-अपनी प्रस्तुति दी। इस सत्र के संचालन का दायित्व गोरखपुर की युवा कवियित्री आकृति विज्ञा अर्पण व शायर सलीम के हाथों में रहा। संचालन के मध्य युवा कलमकारों के विषय में मनहर भूमिका प्रस्तुत करते हुए आकृति ने एक अच्छी कवियित्री होने के साथ-साथ कुशल संचालिका होने का भी खूब परिचय दिया। पहले सत्र में कवियित्री नेहा मिश्रा ने ''''भइल जियरा के जंजाल का मनाई नया साल'''' जैसे गीतों की प्रस्तुति दी। वहीं इसके बाद युवा कवियित्री नित्या त्रिपाठी कवि महीप एवं कवि अनुराग यादव ने अपनी–अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से श्रोताओं की वाहवाही बटोरी।
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साहित्य समाज के किसी भी क्षेत्र से अछूता नहीं रह सकता है : अर्पण कुमार
दूसरे सत्र में साहित्यकार प्रियंका ओम, यतीश कुमार, विनीता अस्थाना और अर्पण कुमार ने सृजन के संशय दूर को दूर करने का कार्य किया। कहानियां चारों ओर, हर व्यक्ति में हैं। सृजन में संशय होना चाहिए जो आत्म परिष्कार का कारक बनता है। लेखक अनुभव और कल्पना के मध्य समन्वय बनाते हुए रचना करता है। किताबें वास्तव में रचनाकार के अन्तःकरण का प्रतिबिंब होती हैं। लेखक–प्रकाशक–पाठक इन तीनों स्तरों पर संशय का समाधान कर के कोई रचना बेस्टसेलर बनती है। इस अवसर पर उपस्थित पाठकों ने भी अपनी जिज्ञासा का समाधान उपस्थित रचनाकारों से किया। सत्र के मध्य में अर्पण कुमार ने कहा कि साहित्य समाज के किसी भी क्षेत्र से अछूता नहीं रह सकता है।

मीडिया को मल्टीडाइमेंशनल होना चाहिए: रेहान फजल
तीसरा सत्र ''''भरोसा कैसे बनता है'''' पूरी तरह से मीडिया पर आधारित रहा। इसमें पत्रकार रेहान फजल व टीवी पत्रकार राजीव रंजन ने पत्रकारिता की बारीकियों पर चर्चा की। रेहान फजल ने कहा कि इमरजेंसी के जमाने की बात है, जब स्टेट कंट्रोल मीडिया था तब बीबीसी एक मात्र साधन था जिस पर सच बताया और सुनाया जाता था। उन्होंने कहा कि मीडिया को मल्टीडाइमेंशनल होना चाहिए ना कि वन डाइमेंशनल। मीडिया को ईमानदार होने के साथ निष्पक्ष भी होने के साथ खबरों की स्क्रूटनी बहुत जरूरी है। वहीं राजीव रंजन ने कहा कि भरोसा सदैव निश्छलता से बनता है। जब हम भरोसा कायम करते हैं तो दूसरा पक्ष निश्छल होता है और मीडिया को उसकी निश्छलता का ध्यान रखना होता है। मीडिया भी समाज का अंग है जिसमें निश्चित तौर पर गिरावट आई है।
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आत्मसंतुष्टि से बढ़कर कुछ नहीं: अमित मौर्या
''''गोरखपुर के चमकते सितारे'''' सत्र में शहर की उभरती युवा प्रतिभाएं-साउंड इंजीनियर आयुष रंजन, रक्षाकर्मी अवधेश सिंह, खिलाड़ी शगुन व पंचायत में बम बहादुर का किरदार निभाने वाले अमित मौर्या लोगों से रूबरू हुए। अमित महाराजगंज जिले के परतावल से हैं। अमित ने कहा कि मुझे रंगकर्म से सीखने को बहुत कुछ मिला। मेरे भीतर रंगकर्म ने संघर्ष के दौर में जुनून पैदा किया। आदर्श, बलवंत जैसे मित्रों ने मुझे रंगाश्रम से जोड़ा। लोगों की तारीफों पर जाने के बजाय अपनी फीलिंग पर विश्वास करिए। आत्मसंतुष्टि से बढ़कर कुछ नहीं। वहीं अवधेश सिंह (इंस्पेक्टर बीएसएफ) ने कहा कि राप्ती का पानी पिया है तो एटीट्यूड खून में है। पिताजी भी आर्मी में थे 65 और 71 की जंग लड़ चुके हैं। बीएसएफ में पहली पोस्टिंग पाकिस्तान बॉर्डर पर की गई। जुनून और पागलपन से ही आप करिश्माई काम कर सकते हैं। आखिर में शगुन (उभरती टेनिस खिलाड़ी) ने कहा कि उन्हें टेनिस खेलने की प्रेरणा परिवार से मिली। लगातार अभ्यास ही आपके खेल को बेहतर बनाता है। लड़कियों को खेल में बढ़ावा मिलना चाहिए।

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आखिरी सत्र में सजी सुरों की महफिल
आखिरी सत्र में सुरों की अठखेलियों और कथक की थाप पर थिरकते जीएलएफ ने अपनी पूर्णता को प्राप्त किया। उत्सव, बाबू महादेव प्रसाद रईस की स्मृति में पं. हरीश तिवारी के सुगम संगीत और दीपमाला के कथक नृत्य अपने शीर्ष तक पहुंचा। इसके पूर्व शाम को छठे सत्र में पीके लाहिड़ी की स्मृति में सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इसमें शहर के कुछ विशेष व प्रतिष्ठित लोगों को सम्मानित किया गया। जीएलएफ के सफल समापन पर समिति के संरक्षक डॉ. शिव सरन दास, अध्यक्ष अनुपम सहाय व सचिव महेश वालानी समेत आदि पदाधिकारियों ने आगंतुकों का आभार ज्ञापित किया।
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