गोरखपुर में प्रदूषण से बिगड़ रही सेहत: नौ लाख वाहन उगल रहे जहरीला धुआं..सावधानी नहीं बरती तो हो जाएंगे बीमार
प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र सभी वाहनों के लिए अनिवार्य है। नई गाड़ी के लिए प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र की वैधता एक वर्ष की होती है। इसके बाद हर छह माह पर प्रदूषण जांच केंद्र पर वाहनों की जांच कराकर प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र लेना होता है। लेकिन यह जांच बहुत ही कम लोग कराते हैं।
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विस्तार
गोरखपुर शहर में निकले हैं तो सांसें जरा संभलकर लें। सावधानी नहीं बरती तो बीमार भी हो सकते हैं। वजह यह है कि छोटे-बड़े तकरीबन नौ लाख वाहन बिना प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र के शहर की सड़कों पर फर्राटा भर रहे हैं। इनका जहरीला धुआं किसी को भी बीमार बना सकता है। शहर में हालत इतनी गंभीर है कि मुख्य बाजार गोलघर तक में वायु प्रदूषण का स्तर लगातार खतरे के आसपास बना रह रहा है। ऐसे में बेहद सावधान रहने की जरूरत है।
वाहनों के धुएं से शरीर को बेहद नुकसान पहुंचाने वाले हानिकारक तत्व कार्बन मोनो ऑक्साइड, कार्बन, सल्फर डाई ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड निकलते हैं। आरटीओ के आंकड़े गवाह हैं कि नौ लाख वाहन जिले में बिना प्रदूषण की जांच के ही दौड़ रहे हैं। इनमें ऐसे वाहन भी हैं, जिनके चलने की समय सीमा भी बीत चुकी है। वहीं रोडवेज की 170 में 90 बसें भी बिना प्रदूषण की जांच के ही चलती हैं।
अब जाहिर है कि इन वाहनों का जहरीला धुआं हृदय, अस्थमा और सांस के रोगियों के लिए बहुत ही नुकसानदायक है। डॉक्टर भी इस समय भीड़भाड़ वाले इलाके में जाने से बचने और बढि़या गुणवत्ता का मास्क पहनने की सलाह दे रहे हैं।
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गोरखपुर शहर के हृदयस्थली माने जाने वाले गोलघर के अलावा औद्योगिक क्षेत्र गीडा की हवा स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से काफी खतरनाक हो चुकी है। रिहायशी इलाकों की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी) के आसपास की हवा भी सेहत के लिए अच्छी नहीं है।
शहर की हवा लगातार प्रदूषित होती जा रही है। बीते 24 अक्तूबर को एक्यूआई (एयर क्वालिटी इंडेक्स ) जहां 125 पर रहा, वहीं सोमवार की शाम चार बजे तक इसे 194 पर दर्ज किया गया। जबकि, 200 एक्यूआई पर इसे खराब माना जाता है। यानी अब वायु प्रदूषण अब खराब स्तर तक पहुंच गया है। गोलघर में पीएम-10 यानी पार्टीकुलेट मैटर (हवा में धूल का कण ) की मात्रा 200 के आसपास दर्ज की जा रही है। सोमवार को एक्यूआई 190 तक पहुंच गया।
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इस स्थिति को स्वास्थ्य के लिहाज से काफी खराब माना जाता है। हवा में इतना प्रदूषण होने से आंखों में जलन के अलावा सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। बच्चों की सेहत पर भी गंभीर असर पड़ता है।
हर छह माह पर प्रदूषण की जांच जरूरी पर कराता कोई नहीं
प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र सभी वाहनों के लिए अनिवार्य है। नई गाड़ी के लिए प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र की वैधता एक वर्ष की होती है। इसके बाद हर छह माह पर प्रदूषण जांच केंद्र पर वाहनों की जांच कराकर प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र लेना होता है। लेकिन यह जांच बहुत ही कम लोग कराते हैं। जिले में 12,33,540 वाहन पंजीकृत हैं। इनमें सिर्फ 3,14,226 वाहनों के प्रदूषण प्रमाण पत्र जारी हुए हैं। 9,19,313 वाहन अभी भी बिना प्रदूषण प्रमाण पत्र के सड़कों पर फर्राटा भरते हुए प्रदूषण फैलाने का काम कर रहे हैं।
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हद है! बिना वाहन भी बन जाता है प्रदूषण प्रमाण पत्र
जिले में 22 प्रदूषण जांच केंद्र हैं, जहां वाहनों के प्रदूषण की जांच होती है। इसमें ज्यादातर प्रदूषण जांच केंद्र शहर के सिविल लाइंस क्षेत्र और गीडा में स्थित हैं। यहां कुछ प्रदूषण जांच केंद्र ऐसे भी हैं, जो थोड़े पैसे अधिक लेकर बिना गाड़ी की जांच किए गलत तरीके से प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं।
सिर्फ तीन स्थानों पर ही लगा है मापन यंत्र
हवा के प्रदूषण के बारे में शहर के लोगों को सही जानकारी नहीं मिल पा रही है। इसकी वजह यह है कि आवासीय से लेकर औद्योगिक क्षेत्र तक में सिर्फ तीन स्थानों पर ही प्रदूषण नियंत्रण विभाग, हवा की गुणवत्ता मापने का यंत्र लगा पाया है।
सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी प्रशासन अरुण कुमार ने कहा कि बिना प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र के वाहन चलाना मोटर व्हीकल एक्ट का उल्लंघन है। जांच के दौरान जिस वाहन का प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र नहीं होता है, उनके विरुद्ध कार्रवाई की जाती है।
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अस्थमा के रोगियों को सबसे ज्यादा परेशानी
डीजल या पेट्रोल वाहनों में अधजला ईंधन कार्बन मोनो ऑक्साइड के रूप में बाहर निकलता है, जिससे फेफड़े की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। इसके प्रभाव से अस्थमा के रोगियों को अटैक आने का खतरा रहता है। इसीलिए जब प्रदूषण अधिक हो तो भीड़भाड़ वाले इलाके में जाने से बचें, अथवा बढि़या गुणवत्ता का मास्क पहनकर जाएं।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के चेष्ट रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अश्विनी मिश्रा बताते हैं-धुएं का सबसे बुरा असर अस्थमा के मरीजों पर पड़ता है। हवा में फैले विभिन्न रासायनिक अवयव अस्थमा के मरीजों की मुश्किलें बढ़ा देते हैं। कार्बन मोनो ऑक्साइड की वजह से अस्थमा का अटैक आ जाता है, जिससे रोगी की हालत गंभीर हो जाती है।
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दूसरी गंभीर बीमारी सीओपीडी, यानी क्रॉनिक ऑबस्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज, फेफड़ों की एक क्रॉनिक बीमारी है, जो मुख्य रूप से फेफड़ों में हवा के प्रवाह को रोकती है। इस स्थिति में फेफड़ों में सूजन आ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को सांस लेने में दिक्कत आती है। व्यक्ति के फेफड़े की कार्यक्षमता घट जाती है। वाहनों के धुएं से एलर्जी भी होती है, जिससे व्यक्ति को लगातार छींक आने की दिक्क्त होती है।
बच्चों को श्वसन नली में होती है दिक्कत
वायुमंडल के प्रदूषण का असर बच्चों पर भी पड़ता है। लाल बत्ती पर स्कूल वाहन रुका है और वहां वाहनों से अत्यधिक धुआं निकल रहा है तो इससे बच्चों को उपरी श्वसन तंत्र में दिक्क्त हो सकती है। प्रभावित बच्चों के श्वास नली से आवाज आने लगती है और उन्हें सांस लेने में भी दिक्कत होती है। इसलिए बच्चों को वायु प्रदूषण से बचाना सबसे जरूरी है।
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बचाव के लिए ये करें उपाय
- भीड़ वाली जगह पर जाने से बचें।
- अगर जाना जरूरी है तो शाम की बजाय दिन में जाएं।
- भीड़ वाली जगह पर जा रहे हैं तो अच्छी गुणवत्ता का मास्क पहनें।
- अगर अस्थमा, सीओपीडी जैसी बीमारी से पीड़ित हैं तो दवा का सेवन बंद न करें।
क्या है मानक
विशेषज्ञों के मुताबिक, हवा के प्रदूषण में पर्टिकुलेट मैटर (कण प्रदूषण) मापने के दो मानक हैं। एक तो इसे 24 घंटे के आधार पर मापा जाता है। दूसरा इसका वार्षिक औसत निकाला जाता है। पीएम 2.5 का स्तर सामान्य 60 माइक्रो ग्राम प्रति घनमीटर होना चाहिए। पीएम 10 का स्तर सामान्य 100 माइक्रो ग्राम होना चाहिए। इसका वार्षिक औसत 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तय है। 24 घंटे में सल्फर डाईआक्साइड 80 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर का मानक निर्धारित है। जबकि वार्षिक मानक 50 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तय किया गया है। इसके अलावा नाइट्रोजन डाई आक्साइड का 24 घंटे में 80 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर जबकि वार्षिक 40 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इससे अधिक होने पर सेहत के लिए हानिकारक होता है।
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| तारीख | एक्यूआई |
| 30 अक्तूबर | 194 |
| 29 अक्तूबर | 199 |
| 28 अक्तूबर | 152 |
| 27 अक्तूबर | 146 |
| 26 अक्तूबर | 144 |
| 25 अक्तूबर | 129 |
| 24 अक्तूबर | 125 |
क्या है पीएम 2.5 और पीएम 10
विशेषज्ञों के अनुसार, पीएम को पर्टिकुलेट मैटर (कण प्रदूषण) कहा जाता है। यह वातावरण में मौजूद ठोस कणों और तरल बूंदों का मिश्रण होता है। पीएम 2.5 वायुमंडलीय कण पदार्थ को बताता है। इस श्रेणी में कण इतने छोटे होते हैं कि उनको इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की सहायता से ही जाना जा सकता है। जबकि पीएम 10 वो कण हैं, जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर होता है। इसमें धूल, गरदा और धातु के सूक्ष्म कण शामिल होते हैं।
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| एयर क्वालिटी | इंडेक्स मानक |
| 0-50 | अच्छा |
| 51-100 | संतोषजनक |
| 101-200 | थोड़ा खराब |
| 201-300 | खराब |
| 301-400 | अत्यंत खराब |
| 401-500 | गंभीर |
| तारीख | पीएम-10 | एक्यूआई |
| एक सितंबर | 248.25 | 199 |
| सात सितंबर | 244.83 | 197 |
| 14 सितंबर | 256.94 | 207 |
| 21 सितंबर | 246.88 | 198 |
| 28 सितंबर | 242.09 | 195 |
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गीडा में स्थिति चिंताजनक
| तारीख | पीएम-10 | एक्यूआई |
| एक सितंबर | 272.06 | 222 |
| सात सितंबर | 271.74 | 222 |
| 14 सितंबर | 269.09 | 219 |
| 21 सितंबर | 283.26 | 233 |
| 28 सितंबर | 263.71 | 214 |