गोरखपुर जिला अस्पताल: स्टाफ के पेच कसते ही दलाल उड़न छू, नेटवर्क तोड़ने की कोशिश जारी
खबर है कि एसआईसी ने स्टॉफ से साफ कह दिया है कि बात बदनामी पर आई तो वह जेल भिजवाने में पीछे नहीं हटेंगे। एक डॉक्टर से तो यहां तक कहा गया-आप तो सब जानते हैं, आपके करीबी भी हैं, उन्हें भी समझा दीजिए...।
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गोरखपुर जिला अस्पताल में मरीज माफिया पर नकेल कसने के लिए जिम्मेदारों ने कोशिश शुरू कर दी है। खबर है कि मरीज माफिया का मामला तूल पकड़ने के बाद बंद कमरे में जिम्मेदारों ने अपने स्टाफ के ही पेच कसे हैं। इसका असर भी देखने को मिल रहा है। अस्पताल से दलाल गायब हो गए हैं। उसका नतीजा यह रहा कि अस्पताल के पास की पैथोलॉजी में पहले औसतन जहां 50 से 56 मरीज पहुंचते थे, अब यह संख्या घटकर मंगलवार को महज 10 से 12 ही रह गई।
खबर है कि एसआईसी ने स्टॉफ से साफ कह दिया है कि बात बदनामी पर आई तो वह जेल भिजवाने में पीछे नहीं हटेंगे। एक डॉक्टर से तो यहां तक कहा गया-आप तो सब जानते हैं, आपके करीबी भी हैं, उन्हें भी समझा दीजिए...। हालांकि, सख्त हिदायत दी गई कि बंद कमरे में हुई बातचीत बाहर लीक नहीं होनी चाहिए। सबको मिलकर अस्पताल और खुद की छवि को सुधारना ही होगा।
जानकारी के मुताबिक, मरीज माफिया की गहरी पैठ होने की वजह से मरीजों को मुफ्त इलाज और दवा के लिए भी रुपये देने पड़ते हैं। यह सब इतने सलीके से होता है कि ठगे जाने वाला मरीज भी खुद को खुशनसीब समझता है कि इस भीड़ में उसका सस्ते में उपचार हो गया और दोबारा नहीं आना पड़ा। शायद यही वजह है कि वह कभी भी शिकायत के लिए आगे नहीं आता। लेकिन अब जब मरीज माफिया के गिरोह की शिकायत पुलिस तक पहुंची और एक-एक कर कलई खुलने लगी तो पूरा खेल भी उजागर हो गया।
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सूत्र बताते हैं कि जिला अस्पताल के सामने की दुकानों में लस्सी की एक दुकान पर ही कमीशन का रजिस्टर बनाया गया था। वहां पर शाम में आसपास के दुकानदार भी हिसाब देते थे कि कितना किस डॉक्टर के पर्चे पर दवा बिकी है और फिर उसका हिसाब-किताब होता है। वहीं एक दुकान ऐसी भी है जहां शाम ढलते डॉक्टर भी पहुंच जाते थे, वहां अब कोई नजर नहीं आ रहा है। यह वहीं दुकान है, जहां से लोकल दवाओं की जरूरत होने पर खरीदारी भी की जाती है।
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दरअसल, मरीज माफिया को लेकर डीएम कृष्णा करुणेश ने सीएमओ और एसआईसी से बातचीत कर नाराजगी जाहिर की है। इसके बाद से ही सभी को लगने लगा है कि अब यह खेल आसान नहीं है। लेकिन अभी यह देखना होगा कि यह सख्ती कितने दिनों तक बनी रहती है।
स्पेशल वार्ड की आड़ में आते हैं प्राइवेट पैथोलॉजी कर्मी
जिला अस्पताल में स्पेशल व प्राइवेट वार्ड भी है। यहां पर भर्ती होने पर मरीज को न्यूनतम शुल्क देने का नियम है। दूसरे यहां की दवाओं की खरीद और जांच भी बाहर से होती है। इसी की आड़ में प्राइवेट पैथोलॉजी वालों का दखल अस्पताल में होता है। यहां पर तो वे नियम-कानून से काम करते हैं, लेकिन फिर सेटिंग की मदद से उस वार्ड तक पहुंच जाते हैं, जहां दवा और जांच निशुल्क है, लेकिन अब इस पर सख्ती कर दी गई है।