गोरखपुर: फाइलेरिया के मरीजों को किडनी का खतरा सबसे अधिक, जानिए डॉक्टर क्या दे रहे हैं सलाह
यूरोलॉजिस्ट डॉ. अरुण द्विवेदी ने बताया कि शुगर और हाई बीपी क्रोनिक किडनी रोग के 60 फीसदी से अधिक मामलों के लिए जिम्मेदार है। मोटे व्यक्ति, उच्च रक्तचाप वाले, 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में गुर्दे की बीमारी का खतरा अधिक होता है।
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फाइलेरिया को लोग सामान्य बीमारी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि, यह सामान्य बीमारी नहीं है। यह किडनी पर गहरा असर डालती है। इस बीमारी की वजह से किडनी और यूरिन ब्लेडर में संक्रमण हो जाता है। इस संक्रमण की वजह से किडनी खराब हो जाती है। साइंस की भाषा में इसे काइल्यूरिया कहा जाता है। पूर्वांचल में फाइलेरिया मरीजों की संख्या सबसे अधिक है।
यह जानकारी लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अपुल गोयल ने दी। वह यूरोलॉजिस्ट एसोसिएशन ऑफ उत्तर प्रदेश की जिला इकाई के यूएकॉन में बतौर वक्ता संबोधित कर रहे थे। बताया कि पूर्वांचल और बिहार में फाइलेरिया के मरीजों की संख्या सबसे अधिक है। यही वजह है कि केजीएमयू में बड़ी संख्या में फाइलेरिया के मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। इस बीमारी से ब्लेडर कैंसर का भी खतरा अधिक होता है। क्योंकि, इस बीमारी में यूरिन ट्रैक में खून की नसें फट जाती हैं। इसका इलाज केवल सर्जरी है।
केजीएमयू के यूरोलॉजी विभाग के डॉ. मनोज यादव ने बताया कि काइल्यूरिया बीमारी के लक्षण अलग होते हैं। इस बीमारी में पेशाब के रंग में बदलाव होने लगता है। पेशाब का रंग दुधिया हो जाता है। पेशाब के साथ दूध के रंग का मवाद निकलने लगता है। ब्लेडर और किडनी के आसपास की धमनियों (लिम्फेटिक) में संक्रमण के कारण मवाद बनने से होता है।
शुगर और बीपी के मरीजों को खतरा सबसे अधिक
यूरोलॉजिस्ट डॉ. अरुण द्विवेदी ने बताया कि शुगर और हाई बीपी क्रोनिक किडनी रोग के 60 फीसदी से अधिक मामलों के लिए जिम्मेदार है। मोटे व्यक्ति, उच्च रक्तचाप वाले, 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में गुर्दे की बीमारी का खतरा अधिक होता है। शुगर, बीपी की वजह से शरीर कमजोर हो जाती है। ये बीमारियां सबसे पहले किडनी को प्रभावित करती हैं। ऐसे मरीजों को समय-समय पर किडनी की जांच कराते रहना चाहिए।
लैप्रोस्कोपिक सर्जरी से मरीजों को मिली राहत
यूरोलॉजिस्ट डॉ. अभिनव जायसवाल ने बताया कि लेप्रोस्कॉपी सर्जरी यूरोलॉजिस्ट के लिए काफी मददगार हो गया है। इस तकनीक से आसानी से मरीजों की सर्जरी हो जा रही है। इससे मरीज का समय और रुपये दोनों बच रहे हैं। आधुनिक सर्जरी में लैप्रोस्कोपी तकनीक का इस्तेमाल बढ़ गया है। मेजर सर्जरी भी अब दूरबीन पद्धति से की जा रही है। इस सर्जरी के बाद मरीजों को ठीक होने और काम पर लौटने में कम समय लगता है।
लैप्रोस्कोपी सर्जरी बेहद सूक्ष्म होती है
यूरोलॉजिस्ट डॉ. अरविंद तिवारी ने बताया कि लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में मुख्य रूप से एक टेलीस्कोप को वीडियो कैमरा के साथ जोड़ा जाता है। इस टेलीस्कोप को छोटे चीरे के द्वारा पेट में डाला जाता है। संपूर्ण पेट की सूक्ष्मता से जांच की जाती है। सर्जन तथा उसकी टीम पेट के अंदर के संपूर्ण चित्र टीवी मॉनिटर पर देखकर ऑपरेशन करते हैं। इससे खतरा न के बराबर है। साथ ही मरीजों का समय भी बचता है।