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Gorakhpur News: नशे का धंधाः लखनऊ से पीपीगंज भेजी गईं एक लाख टेबलेट, जांच शुरू
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गोरखपुर। नशे के धंधे की कड़ियां खुल रही हैं। ड्रग विभाग की जांच में पर्दाफाश हुआ है कि लखनऊ की एक फर्म बायोहब लाइफ साइंसेज प्राइवेट लिमिटेड से पीपीगंज स्थित मां वैष्णो फार्मा को नशीली दवा प्रॉक्सीवान स्पास की एक लाख टेबलेट भेजी गईं। प्रारंभिक जांच में 240 बॉक्स रिसीव होने की पुष्टि हुई है। यह दवा नारकोटिक्स श्रेणी में दर्ज है। पीपीगंज की फर्म का लाइसेंस अस्थायी तौर पर निलंबित कर दिया गया है। तीन दिन में जवाब भी मांगा गया है। आशंका है कि दवाओं का गलत नाम से बिल बनाकर यह धंधा चलाया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि लखनऊ की बायोहब लाइफ साइंसेज प्राइवेट लिमिटेड की तरफ से जिस दवा की सप्लाई हुई, उस नाम से थोक व्यापारी के कंप्यूटर में कोई एंट्री ही नहीं मिली। जबकि ड्रग विभाग को सप्लायर के नाम की सूची लखनऊ के कमिश्नर कार्यालय से मिली थी। कंप्यूटर में दर्ज नामों को देखकर ड्रग विभाग की टीम हैरान रह गई। इसके बाद कुछ मिलते-जुलते नामों को सर्च करना शुरू किया। इसमें स्पोक-जी कैप्सूल का नाम दिखा। इस दवा की बड़े पैमाने पर बिक्री हुई थी। जबकि उस दवा की खरीद का कोई रिकॉर्ड नहीं था।
इस दवा के विषय में पूछे जाने पर थोक व्यापारी आनाकानी करने लगे। जब कंप्यूटर में लखनऊ से मिले बैच नंबर को डाला गया तो पता लगा कि यह दवा कोडवर्ड के साथ बेची गई थी। इसके बाद ड्रग विभाग की टीम ने मां वैष्णो फार्मा के लाइसेंस को अस्थायी तौर पर निलंबित कर दिया है। वहां से दवाओं की खरीद व बिक्री पर रोक लगा दी है। इतना ही नहीं, उन्हें ड्रग इंस्पेक्टर और सहायक आयुक्त औषधि की तरफ से अलग-अलग नोटिस भी भेजे गए हैं। इस नोटिस का जवाब उन्हें तीन दिन के अंदर देना है। अगर तीन दिन में जवाब नहीं मिला या यह संतोषजनक नहीं रहा तो उनके खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज कराई जा सकती है।
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इस संबंध में सहायक आयुक्त औषधि पूरन चंद ने बताया कि मामला बेहद गंभीर है। सरकार नशीली दवाओं की धंधेबाजी रोकने को लेकर सख्त है। इस धंधे में लगे लोगों को बख्शा नहीं जाएगा।
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बताया जा रहा है कि लखनऊ की बायोहब लाइफ साइंसेज प्राइवेट लिमिटेड की तरफ से जिस दवा की सप्लाई हुई, उस नाम से थोक व्यापारी के कंप्यूटर में कोई एंट्री ही नहीं मिली। जबकि ड्रग विभाग को सप्लायर के नाम की सूची लखनऊ के कमिश्नर कार्यालय से मिली थी। कंप्यूटर में दर्ज नामों को देखकर ड्रग विभाग की टीम हैरान रह गई। इसके बाद कुछ मिलते-जुलते नामों को सर्च करना शुरू किया। इसमें स्पोक-जी कैप्सूल का नाम दिखा। इस दवा की बड़े पैमाने पर बिक्री हुई थी। जबकि उस दवा की खरीद का कोई रिकॉर्ड नहीं था।
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इस दवा के विषय में पूछे जाने पर थोक व्यापारी आनाकानी करने लगे। जब कंप्यूटर में लखनऊ से मिले बैच नंबर को डाला गया तो पता लगा कि यह दवा कोडवर्ड के साथ बेची गई थी। इसके बाद ड्रग विभाग की टीम ने मां वैष्णो फार्मा के लाइसेंस को अस्थायी तौर पर निलंबित कर दिया है। वहां से दवाओं की खरीद व बिक्री पर रोक लगा दी है। इतना ही नहीं, उन्हें ड्रग इंस्पेक्टर और सहायक आयुक्त औषधि की तरफ से अलग-अलग नोटिस भी भेजे गए हैं। इस नोटिस का जवाब उन्हें तीन दिन के अंदर देना है। अगर तीन दिन में जवाब नहीं मिला या यह संतोषजनक नहीं रहा तो उनके खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज कराई जा सकती है।
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इस संबंध में सहायक आयुक्त औषधि पूरन चंद ने बताया कि मामला बेहद गंभीर है। सरकार नशीली दवाओं की धंधेबाजी रोकने को लेकर सख्त है। इस धंधे में लगे लोगों को बख्शा नहीं जाएगा।