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Gorakhpur News: नालों का निर्माण बना सवाल, शहर में जलनिकासी पर उठे सवाल
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गोरखपुर। शहर में जलनिकासी व्यवस्था को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। सड़क से ऊंचे बनाए जा रहे नाले, उनके ऊपर लगाए गए भारी स्लैब और बिना वैज्ञानिक योजना के हो रहे निर्माण पर विशेषज्ञों और शहरवासियों ने चिंता जताई है। सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि नालों के निर्माण से कई जगह सड़क के किनारे घर और दुकानें निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जिससे बारिश का पानी वहां भरने की आशंका बढ़ गई है।
प्रो. शिवशरण दास ने फेसबुक पर लिखा
देखते जाइए... शहर का कोई कोना नहीं बचेगा, जहां पानी न लगे। पूरे शहर की सड़कों के दोनों किनारे बिना सोचे-समझे, बिना किसी योजना और लेवल के ऊंचे नाले बनाए जा रहे हैं। आखिर पानी जाए तो जाए कहां? सड़कों पर ही तो रहेगा और सड़कों पर ही बहेगा। ऊंचे नाले बनाने से सड़क के किनारे की दुकानें और घर सड़क से नीचे होते जा रहे हैं। ऐसे में दुकानों और घरों में पानी तो भरेगा ही। यह वैज्ञानिक सच्चाई है कि पानी कभी नीचे से ऊपर नहीं बहता। ऊपर से नीचे की ओर ही बहता है। इस साधारण से ज्ञान को न तो अफसर समझ रहे हैं और न ही ठेकेदार। नगर के विकास के लिए अच्छे वास्तुविद, आर्किटेक्ट, वैज्ञानिक और पुराने नगरवासियों से राय अवश्य लेनी चाहिए। तभी विकास की योजनाएं सफल हो सकेंगी...!
इस पर शहर के अन्य लोगों ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी
- गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. अशोक कुमार ने लिखा...
सरकार अपना वादा पूरा कर रही है- घर-घर पानी
शैवाल शंकर श्रीवास्तव ने लिखा...
सड़क के ऊपर एक फुट की सड़क बना दी जा रही है। उसके बगल में चौड़े नाले बनाए तो जा रहे हैं, लेकिन वह भी सड़क के ऊपर ही रह रहे हैं। अद्भुत इंजीनियरिंग का नमूना पेश हो रहा है।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रो. गौर हरि बेहरा ने लिखा...
इन इंजीनियरों और वास्तुकारों को इससे कम कुछ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए। इन दिनों विश्वविद्यालय परिसर में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। मुझे आश्चर्य होता है कि मुख्य परिसर के चारों ओर नालियां बनाने का सुझाव किस वास्तुकार ने दिया, जबकि परिसर के अंदर कभी जलभराव की समस्या थी ही नहीं। अब ये नालियां कचरे से भरी हुई हैं और इनमें मच्छरों का प्रजनन हो रहा है।
एसपी त्रिपाठी ने लिखा....
शहर के विकास में जलनिकासी की कोई वैज्ञानिक योजना नहीं है। गोरखपुर की रेलवे कॉलोनी का निर्माण सौ साल से भी पहले हुआ था, लेकिन आज भी वहां जलभराव की समस्या नहीं होती है।
ध्रुव दास मोदी ने लिखा...
सर, फंड खूब है। इस फंड को खर्च करना ही है। अभी बनाओ और खर्च करो। जब शिकायत आएगी, तब फिर मिल-बैठकर नए तरीके से सोचेंगे। इसके बाद सड़क और नाली बनेगी और फिर फंड रिलीज होगा। यह अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है जो चलती ही रहेगी। सड़क के दोनों किनारों पर नालों के ऊपर जो स्लैब लगाए गए हैं, वे जरूरत से कहीं ज्यादा मोटे हैं। न तो ऐसे मोटे स्लैब आसानी से हटाए जा सकते हैं और न ही इन्हें हटाकर नालों की तल्लीझाड़ सफाई संभव है। यह नगर निगम के इंजीनियरों की सोच का नतीजा है। ऐसे में शहर तो डूबना ही है।
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प्रो. शिवशरण दास ने फेसबुक पर लिखा
देखते जाइए... शहर का कोई कोना नहीं बचेगा, जहां पानी न लगे। पूरे शहर की सड़कों के दोनों किनारे बिना सोचे-समझे, बिना किसी योजना और लेवल के ऊंचे नाले बनाए जा रहे हैं। आखिर पानी जाए तो जाए कहां? सड़कों पर ही तो रहेगा और सड़कों पर ही बहेगा। ऊंचे नाले बनाने से सड़क के किनारे की दुकानें और घर सड़क से नीचे होते जा रहे हैं। ऐसे में दुकानों और घरों में पानी तो भरेगा ही। यह वैज्ञानिक सच्चाई है कि पानी कभी नीचे से ऊपर नहीं बहता। ऊपर से नीचे की ओर ही बहता है। इस साधारण से ज्ञान को न तो अफसर समझ रहे हैं और न ही ठेकेदार। नगर के विकास के लिए अच्छे वास्तुविद, आर्किटेक्ट, वैज्ञानिक और पुराने नगरवासियों से राय अवश्य लेनी चाहिए। तभी विकास की योजनाएं सफल हो सकेंगी...!
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इस पर शहर के अन्य लोगों ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी
- गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. अशोक कुमार ने लिखा...
सरकार अपना वादा पूरा कर रही है- घर-घर पानी
शैवाल शंकर श्रीवास्तव ने लिखा...
सड़क के ऊपर एक फुट की सड़क बना दी जा रही है। उसके बगल में चौड़े नाले बनाए तो जा रहे हैं, लेकिन वह भी सड़क के ऊपर ही रह रहे हैं। अद्भुत इंजीनियरिंग का नमूना पेश हो रहा है।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रो. गौर हरि बेहरा ने लिखा...
इन इंजीनियरों और वास्तुकारों को इससे कम कुछ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए। इन दिनों विश्वविद्यालय परिसर में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। मुझे आश्चर्य होता है कि मुख्य परिसर के चारों ओर नालियां बनाने का सुझाव किस वास्तुकार ने दिया, जबकि परिसर के अंदर कभी जलभराव की समस्या थी ही नहीं। अब ये नालियां कचरे से भरी हुई हैं और इनमें मच्छरों का प्रजनन हो रहा है।
एसपी त्रिपाठी ने लिखा....
शहर के विकास में जलनिकासी की कोई वैज्ञानिक योजना नहीं है। गोरखपुर की रेलवे कॉलोनी का निर्माण सौ साल से भी पहले हुआ था, लेकिन आज भी वहां जलभराव की समस्या नहीं होती है।
ध्रुव दास मोदी ने लिखा...
सर, फंड खूब है। इस फंड को खर्च करना ही है। अभी बनाओ और खर्च करो। जब शिकायत आएगी, तब फिर मिल-बैठकर नए तरीके से सोचेंगे। इसके बाद सड़क और नाली बनेगी और फिर फंड रिलीज होगा। यह अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है जो चलती ही रहेगी। सड़क के दोनों किनारों पर नालों के ऊपर जो स्लैब लगाए गए हैं, वे जरूरत से कहीं ज्यादा मोटे हैं। न तो ऐसे मोटे स्लैब आसानी से हटाए जा सकते हैं और न ही इन्हें हटाकर नालों की तल्लीझाड़ सफाई संभव है। यह नगर निगम के इंजीनियरों की सोच का नतीजा है। ऐसे में शहर तो डूबना ही है।