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आंगनबाड़ी केंद्रों की हालत: जिन पर बच्चों के पोषण की जिम्मेदारी, उन्हें ही 'पोषाहार' की पड़ रही जरूरत
Thu, 07 Oct 2021 01:46 PM IST
vivek shukla
उदयभान त्रिपाठी, गोरखपुर।
उदयभान त्रिपाठी, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Thu, 07 Oct 2021 01:46 PM IST
सार
गोरखपुर जिले में 4237 आंगनबाड़ी केंद्र हैं, जिसमें 641 के पास ही अपना भवन है। ऐसे में शहर के 627 केंद्र 750 रुपये मासिक किराए पर चल रहे हैं। वहीं, ग्रामीण क्षेत्र के 2902 केंद्र गांव के प्राइमरी स्कूल में चल रहे हैं।
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आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रेखा व अर्चना।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
छह साल से कम उम्र के बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने के साथ ही सेहतमंद बनाने के जिन आंगनबाड़ी केन्द्रों पर बच्चों के पोषण की जिम्मेदारी है, उन्हें ही ‘पोषाहार’ की जरूरत है। सभी आंगनबाड़ी केंद्र संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। गोरखपुर जैसे महानगर में आंगनबाड़ी केंद्र 750 रुपये मासिक किराए पर संचालित हो रहे हैं। वहीं, ग्रामीण क्षेत्र के 2902 केंद्र गांव के प्राइमरी स्कूल में चल रहे हैं। विभाग की तरफ से बनाए गए 641 भवनों में भी संसाधनों की कमी है। केंद्र में आने वाले बच्चों को बैठने के लिए टाटपट्टी भी छह साल पहले मिली थी। पेयजल और शौचालय की सुविधा दूर की कौड़ी है।
बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की तरफ से 90 के दशक में आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों एवं उनकी माताओं को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण क्षेत्र में एक हजार की आबादी पर एक आंगनबाड़ी केंद्र खोला गया था। समय के साथ इन केंद्रों की संख्या और जिम्मेदारियों में इजाफा होता चला गया।
अब कुछ जगह शहरी क्षेत्र में भी आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन किया जा रहा है। नई शिक्षा नीति में तीन से छह साल तक के बच्चों के लिए जब प्री स्कूल खोलने की बात हुई तो सरकार ने इन आंगनबाड़ी केंद्रों को प्री प्राइमरी के तौर पर विकसित करने की बात कही है।
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अब इन कर्मियों को एंड्रायड फोन देने की तैयारी है, लेकिन केंद्रों पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। किसी भी केंद्र पर पिछले पांच साल में बच्चों के बैठने के लिए टाटपट्टी या दरी तक नहीं मिली है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए भी फर्नीचर का इंतजाम नहीं है। अधिकतर केंद्रों पर पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाओं का भी अभाव है।
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बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की तरफ से 90 के दशक में आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों एवं उनकी माताओं को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण क्षेत्र में एक हजार की आबादी पर एक आंगनबाड़ी केंद्र खोला गया था। समय के साथ इन केंद्रों की संख्या और जिम्मेदारियों में इजाफा होता चला गया।
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अब कुछ जगह शहरी क्षेत्र में भी आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन किया जा रहा है। नई शिक्षा नीति में तीन से छह साल तक के बच्चों के लिए जब प्री स्कूल खोलने की बात हुई तो सरकार ने इन आंगनबाड़ी केंद्रों को प्री प्राइमरी के तौर पर विकसित करने की बात कही है।
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अब इन कर्मियों को एंड्रायड फोन देने की तैयारी है, लेकिन केंद्रों पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। किसी भी केंद्र पर पिछले पांच साल में बच्चों के बैठने के लिए टाटपट्टी या दरी तक नहीं मिली है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए भी फर्नीचर का इंतजाम नहीं है। अधिकतर केंद्रों पर पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाओं का भी अभाव है।
शहर में 627 केंद्र, कहीं बोर्ड तक नहीं
शहर में कुल 692 आंगनबाड़ी केंद्र हैं, जिसमें से 65 केंद्र संचालित नहीं किए जा रहे हैं। इन 65 मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों पर अभी कार्यकर्ता व सहायिका की तैनाती होनी बाकी है। जो 627 केंद्र संचालित हैं, उनमें से कहीं पर भी बोर्ड नहीं लगा है। वार्ड नंबर 41 रामदत्तपुर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अर्चना श्रीवास्तव और रेखा शर्मा ने बताया कि केंद्र का किराया 750 रुपये मासिक है। इतने कम किराए पर केंद्र संचालन में दिक्कत आती है। रिश्तेदार के मकान में केंद्र का संचालन किया जा रहा है। किराया भी साल-छह महीने में एक बार मिलता है, फिर भी लाभार्थियों को सभी सुविधाएं दी जाती हैं।
2902 केंद्रों के पास अपना भवन नहीं
जिले में कुल संचालित 4237 आंगनबाड़ी केंद्रों में से 692 केंद्र शहरी और 3545 केंद्र ग्रामीण इलाके में संचालित हैं। ग्रामीण इलाके में 674 केंद्रों के लिए भवन निर्माण की मंजूरी मिली है। इसमें से भी 643 केंद्र पूर्ण हैं, जबकि 31 अपूर्ण हैं। जो 643 केंद्र पूर्ण हैं वहां भी केवल भवन ही है। फर्नीचर समेत अन्य संसाधनों का अभाव है।
दूसरे काम में ही निकल जाता है पूरा वक्त
बड़हलगंज ब्लॉक में कुल 160 आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इनमें से 136 केंद्र प्राथमिक स्कूल व पंचायत भवन में हैं। केवल 16 के पास अपना भवन है, जबकि आठ निर्माणाधीन हैं। सेमरा बुजुर्ग गांव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता विभा शाही और सहायिका दुर्गावती, नवलपुर की कार्यकर्ता अर्चना और सहायिका रेखा ने बताया कि केंद्र तो हर दिन खुलता है, लेकिन बच्चों को केवल सोमवार और बृहस्पतिवार को ही बुलाना है। लाभार्थियों में सूखा अनाज व अन्य सामग्री का वितरण, बच्चों का वजन करना, गर्भवती व धात्री महिलाओं के अलावा किशोरियों को जागरूक करना आदि विभागीय कार्य के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में चलने वाले राष्ट्रीय महत्व के सभी कार्यक्रम में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की सहभागिता जरूरी है। इसके चलते कई बार विभागीय उत्तरदायित्व का निर्वहन कठिन हो जाता है।
जिला कार्यक्रम अधिकारी हेमंत सिंह ने बताया कि शहरी क्षेत्र में आंगनबाड़ी केंद्र अभी 750 रुपये मासिक किराए पर संचालित हो रहे हैं। किराया बढ़ाने के लिए स्वीकृति मिल गई है, लेकिन इसके लिए अभी प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। बच्चों के बैठने के लिए टाटपट्टी पिछले कई साल से नहीं मिली है। कार्यकर्ता अपने पास से इंतजाम कर रही हैं। शासन की तरफ से मिलने वाली सभी सुविधाएं लाभार्थियों तक पहुंचाई जा रही हैं।
2902 केंद्रों के पास अपना भवन नहीं
जिले में कुल संचालित 4237 आंगनबाड़ी केंद्रों में से 692 केंद्र शहरी और 3545 केंद्र ग्रामीण इलाके में संचालित हैं। ग्रामीण इलाके में 674 केंद्रों के लिए भवन निर्माण की मंजूरी मिली है। इसमें से भी 643 केंद्र पूर्ण हैं, जबकि 31 अपूर्ण हैं। जो 643 केंद्र पूर्ण हैं वहां भी केवल भवन ही है। फर्नीचर समेत अन्य संसाधनों का अभाव है।
दूसरे काम में ही निकल जाता है पूरा वक्त
बड़हलगंज ब्लॉक में कुल 160 आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इनमें से 136 केंद्र प्राथमिक स्कूल व पंचायत भवन में हैं। केवल 16 के पास अपना भवन है, जबकि आठ निर्माणाधीन हैं। सेमरा बुजुर्ग गांव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता विभा शाही और सहायिका दुर्गावती, नवलपुर की कार्यकर्ता अर्चना और सहायिका रेखा ने बताया कि केंद्र तो हर दिन खुलता है, लेकिन बच्चों को केवल सोमवार और बृहस्पतिवार को ही बुलाना है। लाभार्थियों में सूखा अनाज व अन्य सामग्री का वितरण, बच्चों का वजन करना, गर्भवती व धात्री महिलाओं के अलावा किशोरियों को जागरूक करना आदि विभागीय कार्य के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में चलने वाले राष्ट्रीय महत्व के सभी कार्यक्रम में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की सहभागिता जरूरी है। इसके चलते कई बार विभागीय उत्तरदायित्व का निर्वहन कठिन हो जाता है।
जिला कार्यक्रम अधिकारी हेमंत सिंह ने बताया कि शहरी क्षेत्र में आंगनबाड़ी केंद्र अभी 750 रुपये मासिक किराए पर संचालित हो रहे हैं। किराया बढ़ाने के लिए स्वीकृति मिल गई है, लेकिन इसके लिए अभी प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। बच्चों के बैठने के लिए टाटपट्टी पिछले कई साल से नहीं मिली है। कार्यकर्ता अपने पास से इंतजाम कर रही हैं। शासन की तरफ से मिलने वाली सभी सुविधाएं लाभार्थियों तक पहुंचाई जा रही हैं।