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Gorakhpur News: कोड में एंबुलेंस माफिया भेजते थे संदेश... फिर उसी अस्पताल ले जाते थे मरीज
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मरीज के बदले रुपये के लिए बोला जाता था आईपी, मतलब मरीज लेकर आ रहे भुगतान करें
कई और डॉक्टर, कर्मचारी निशाने पर, पुलिस कर रही मामले की जांच, जुटा रही साक्ष्य
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। मरीज-एंबुलेंस माफिया आपस में कोड में बात करते थे। बीआरडी से मरीज को लेने के बाद एंबुलेंस माफिया नर्सिंग होम को कोड में आईपी बताते थे, इसका मतलब होता था कि मरीज एंबुलेंस से लेकर आ रहे हैं और भुगतान, बेड तैयार रखे। इसके बाद मरीज को नर्सिंग होम में पहुंचाने के बाद एंबुलेंस माफिया का काम खत्म हो जाता है, फिर मरीज माफिया दोहन करने में जुट जाते थे। उधर, पुलिस की जांच के घेरे में कई और डॉक्टर व कर्मचारी आ गए हैं, जिनकी भूमिका की जांच पुलिस ने शुरू कर दी है। इनके खिलाफ पुलिस साक्ष्य भी जुटा रही है।
जानकारी के मुताबिक, आरोपियों से पूछताछ में पुलिस के हाथ कई साक्ष्य लगे हैं। पुलिस एक-एक कड़ी जुटा रही है, ताकि पूरे गिरोह का पर्दाफाश किया जा सके। अब तक की जांच में पता चला है कि मेडिकल कॉलेज में सफाईकर्मी से लेकर कर्मचारी तक इनके नेटवर्क का हिस्सा हैं। सबको उनके काम के हिसाब से रुपये दिए जाते थे। मरीज को बरगलाने के लिए बाहर लाने के दौरान गार्ड और सफाईकर्मी न बोले, इसके लिए इन दोनों को ढाई-ढाई सौ रुपये दिए जाते थे। फिलहाल, पुलिस सीधे तौर पर गिरोह में शामिल लोगों को गिरफ्तार कर जेल भिजवा चुकी है, जिसमें डॉक्टर, दो नर्सिंग होम संचालक, एंबुलेंस माफिया भी शामिल हैं। अब पुलिस जांच को आगे बढ़ा रही है, जल्द इस पूरे प्रकरण में कुछ नए खुलासे की संभावना है।
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चाय बेचते-बेचते बन गया चार एंबुलेंस का मालिक
इस पूरे प्रकरण में जेल भेजा गया एंबुलेंस माफिया दीपू चार एंबुलेंस का मालिक है, वह भी बिना ऋण लिए ही। आज से एक दशक पहले वह चाय की दुकान लगाया करता था। मेडिकल कॉलेज गेट पर एक ठेले पर चाय बेचते-बेचते, उसने मरीज के खरीद-फरोख्त का काम सीख लिया और फिर वह भी इस गिरोह का शातिर बन गया। एक-एक कर वर्तमान में उसने चार एंबुलेंस निकलवा लिए। बताया जा रहा है कि शहर में एक बड़ी इमारत भी उसने खड़ी कर ली है।
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खुद को डॉक्टर बताता था नितिन, एक रात में वसूली के बाद छोड़ देता था
ईशु अस्पताल की संचालक वैसे तो रियांव गांव के प्रधान नितिन की पत्नी है, लेकिन पूरा काम अपने भाई अमन के साथ नितिन यादव ही देखा करता था। बताया जा रहा है कि वह 10वीं पास है और खुद को डाॅक्टर बताता था। मरीज के आने पर आला लगाकर ऐसे इलाज करता था, जैसे वास्तव में एमबीबीएस की पढ़ाई उसने की थी। इसके साथ ही वह मरीज को एक रात से ज्यादा नहीं रोकता था। उसकी कोशिश यही होती थी कि दर्द, बुखार या फिर सांस फूलने के मरीज को ही लाया जाए। ताकि रात में आमतौर पर इस्तेमाल वाले दवा, इंजेक्शन को देकर फौरी राहत दे दी जाए और वसूली के बाद सुबह होते ही उसे डिस्चार्ज कर दिया जाए। इस वजह से वह फंस नहीं रहा था, लेकिन बिहार के श्रीरामप्रसाद जैसे गंभीर मरीज के आने और मौत के बाद पूरा मामला खुल गया। हालांकि, पुलिस की राडार पर वह तीन दिन पहले से ही था और मौत के बाद पुलिस को जांच का मौका मिला तो पूरा मामला खुलकर सामने आ गया।
कोट
पुलिस गिरोह में शामिल आठ लोगों को जेल भिजवा चुकी है। दर्ज केस की गहनता से विवेचना की जा रही है, जो भी गिरोह में शामिल होगा, सब पर जांच व साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. गौरव ग्रोवर, एसएसपी
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कई और डॉक्टर, कर्मचारी निशाने पर, पुलिस कर रही मामले की जांच, जुटा रही साक्ष्य
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। मरीज-एंबुलेंस माफिया आपस में कोड में बात करते थे। बीआरडी से मरीज को लेने के बाद एंबुलेंस माफिया नर्सिंग होम को कोड में आईपी बताते थे, इसका मतलब होता था कि मरीज एंबुलेंस से लेकर आ रहे हैं और भुगतान, बेड तैयार रखे। इसके बाद मरीज को नर्सिंग होम में पहुंचाने के बाद एंबुलेंस माफिया का काम खत्म हो जाता है, फिर मरीज माफिया दोहन करने में जुट जाते थे। उधर, पुलिस की जांच के घेरे में कई और डॉक्टर व कर्मचारी आ गए हैं, जिनकी भूमिका की जांच पुलिस ने शुरू कर दी है। इनके खिलाफ पुलिस साक्ष्य भी जुटा रही है।
जानकारी के मुताबिक, आरोपियों से पूछताछ में पुलिस के हाथ कई साक्ष्य लगे हैं। पुलिस एक-एक कड़ी जुटा रही है, ताकि पूरे गिरोह का पर्दाफाश किया जा सके। अब तक की जांच में पता चला है कि मेडिकल कॉलेज में सफाईकर्मी से लेकर कर्मचारी तक इनके नेटवर्क का हिस्सा हैं। सबको उनके काम के हिसाब से रुपये दिए जाते थे। मरीज को बरगलाने के लिए बाहर लाने के दौरान गार्ड और सफाईकर्मी न बोले, इसके लिए इन दोनों को ढाई-ढाई सौ रुपये दिए जाते थे। फिलहाल, पुलिस सीधे तौर पर गिरोह में शामिल लोगों को गिरफ्तार कर जेल भिजवा चुकी है, जिसमें डॉक्टर, दो नर्सिंग होम संचालक, एंबुलेंस माफिया भी शामिल हैं। अब पुलिस जांच को आगे बढ़ा रही है, जल्द इस पूरे प्रकरण में कुछ नए खुलासे की संभावना है।
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चाय बेचते-बेचते बन गया चार एंबुलेंस का मालिक
इस पूरे प्रकरण में जेल भेजा गया एंबुलेंस माफिया दीपू चार एंबुलेंस का मालिक है, वह भी बिना ऋण लिए ही। आज से एक दशक पहले वह चाय की दुकान लगाया करता था। मेडिकल कॉलेज गेट पर एक ठेले पर चाय बेचते-बेचते, उसने मरीज के खरीद-फरोख्त का काम सीख लिया और फिर वह भी इस गिरोह का शातिर बन गया। एक-एक कर वर्तमान में उसने चार एंबुलेंस निकलवा लिए। बताया जा रहा है कि शहर में एक बड़ी इमारत भी उसने खड़ी कर ली है।
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खुद को डॉक्टर बताता था नितिन, एक रात में वसूली के बाद छोड़ देता था
ईशु अस्पताल की संचालक वैसे तो रियांव गांव के प्रधान नितिन की पत्नी है, लेकिन पूरा काम अपने भाई अमन के साथ नितिन यादव ही देखा करता था। बताया जा रहा है कि वह 10वीं पास है और खुद को डाॅक्टर बताता था। मरीज के आने पर आला लगाकर ऐसे इलाज करता था, जैसे वास्तव में एमबीबीएस की पढ़ाई उसने की थी। इसके साथ ही वह मरीज को एक रात से ज्यादा नहीं रोकता था। उसकी कोशिश यही होती थी कि दर्द, बुखार या फिर सांस फूलने के मरीज को ही लाया जाए। ताकि रात में आमतौर पर इस्तेमाल वाले दवा, इंजेक्शन को देकर फौरी राहत दे दी जाए और वसूली के बाद सुबह होते ही उसे डिस्चार्ज कर दिया जाए। इस वजह से वह फंस नहीं रहा था, लेकिन बिहार के श्रीरामप्रसाद जैसे गंभीर मरीज के आने और मौत के बाद पूरा मामला खुल गया। हालांकि, पुलिस की राडार पर वह तीन दिन पहले से ही था और मौत के बाद पुलिस को जांच का मौका मिला तो पूरा मामला खुलकर सामने आ गया।
कोट
पुलिस गिरोह में शामिल आठ लोगों को जेल भिजवा चुकी है। दर्ज केस की गहनता से विवेचना की जा रही है, जो भी गिरोह में शामिल होगा, सब पर जांच व साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. गौरव ग्रोवर, एसएसपी