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विदेशों तक में हुनर का लोहा मनवा रहीं मेवात की महिलाएं
युनूस अलवी/अमर उजाला, गुड़गांव
Updated Fri, 07 Aug 2015 06:40 PM IST
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शिक्षा के क्षेत्र में मेवात की महिलाएं भले ही पिछड़ी हों पर कला के क्षेत्र में उनका कोई सानी नहीं है। मेवात की यह अनपढ़ महिलाएं कला के बलबूते पर अपने हुनर का लोहा विदेशों तक मनवा चुकी हैं।
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करीब बीस वर्ष पहले यूनिसेफ टीम के सदस्यों ने इन महिलाओं की कला की तारीफ कर उसमें चार चांद लगा दिए थे।
यदि सरकार मेवात की चंगेरी और बीजना कला पर ध्यान दे तो यह यहां एक कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हो सकता है। इससे मेवात की हजारों बेरोजगार महिलाओं को रोजगार से जोड़ा जा सकता है।
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मेवात की महिलाओं द्वारा गेंहू की बाली की सीकों से तैयार की गई चंगेरी और बीजना की करीब 20 वर्ष पहले डीआरडीए गुड़गांव द्वारा प्रदर्शनी भी लगाई जा चुकी है।
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प्रदर्शनी में पहुंचे देश, विदेश के लोग मेवात की इस कला की जमकर तारीफ कर चुके हैं। मेवात में मुस्लिम लड़कियों के परिजन उनको सरकारी स्कूलों में भेजने की बजाए मस्जिदों, मदरसों में दीनी तालीम दिलाना ही उचित समझते हैं या फिर प्राइमरी तक शिक्षा दिला कर रह जाते हैं।
यह महिलाएं खेतों के कामों, पशुओं की देखभाल करने, चूल्हा-चाकी और घरेलू कार्यों को संभालने के बावजूद अपने इस हुनर के लिए समय निकाल ही लेती हैं।
अनपढ़ होते हुए कला से उनकी निरक्षरता कभी नहीं झलकती। चंगेरी, बीजना कला में डलियों में गेंहू की सीखों से हिन्दी, अंग्रेजी में नाम लिखना, फूल, गमले, पशु, पक्षी बनाना मानों उनके बाएं हाथ का खेल है।
रोटी रखने के लिये बनाई जाने वाली चंगेरी व हाथ का पंखा बनाने की तैयारी में यह महिलाएं बैसाख के महीने से ही जुट जाती हैं। यह गेंहू की कटाई के समय गेंहू की बालों की लंबी-लंबी सीकों को तोड़ लेती हैं।
उसके बाद इन सीकों को विभिन्न रंगों में रंग लेती हैं। चंगेरी और डलियों को महिलाएं खासतौर से सावन के महीने में बनाती हैं।
इसके दो कारण होते हैं एक तो महिलाओं को खेत खलिहान का खास काम नहीं होता दूसरे बरसात के मौसम में नमी होने के कारण सीकों में भी नमी आ जाती है, जिसकी वजह से यह टूटती नहीं हैं।
इस कला से जुड़ी मिसकीना, रूखसाना, समीना का कहना है कि वह इन चंगेरी ओर बीजनों को घरेलू इस्तेमाल के लिये बनाती हैं या फिर रिश्तेदारियों में इन्हें एक सौगात के रूप में भेंट किया जाता है।
उन्होंने बताया कि एक चंगेरी बनाने में 8 से 10 दिन लग जाते हैं, यदि उन्हें पूरा समय दिया जाए तो वह एक चंगेरी एक-दो दिन में तैयार कर सकती हैं।
याद रहे कि वर्ष 1989-90 में मेवात के दौरे पर 22 देशों के सदस्यों की यूनिसेफ की टीम यहां का दौरा करने आई थी, उसने भी इस कला की जमकर तारीफ की थी। वह अपने साथ चंगेरी और बीजना ले गई थी।
करीब छह साल पहले भी यूके की एक संस्था ने मेवात के खंड नगीना में 25 गांवाें का दौरा किया था। उन्होंने विश्वास दिलाया था कि मेवात की इस अद्भुत कला को लंदन के बाजारों में बेचा जाएगा।
वर्ष 1993-94 में डीआरडीए गुड़गांव की ओर से मेवात की इस कला को बढ़ावा देने के लिए मेवात की 35 महिलाओं को खंड पुन्हाना के रहीडा, बीसरू और इन्दाना में ट्रेनिंग दी गई थी। उस समय डीआरडीए ने विश्वास दिलाया था कि ट्रेनिंग देकर भारी संख्या में उत्पाद बनाए जाएंगे और उन्हें विदेशों में बेचा जाएगा। मेवात में एक चंगेरी 100 से 150 रुपये तक में आसानी से मिल सकती है, जिसे विदेशों में एक हजार से ऊपर में आसानी से बेचा जा सकता है। -एसईडीएस संस्था के महासचिव डॉ. अब्दुल अजीज