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सत्य निकेतन दुर्घटना: दाल में काला था, लेकिन कोर्ट के आदेशों के बावजूद कमजोर नींव पर होता रहा निर्माण का खेल

Mon, 07 Sep 2026 07:14 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 07 Sep 2026 07:14 AM IST
सार

सत्य निकेतन, जिसे पहले जेजे कॉलोनी के रूप में जाना जाता था, करीब 15 साल से हाईकोर्ट की निगरानी से जुड़े मामले में रहा है।

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Satya Niketan Accident: Construction on weak foundations continued despite court orders
Delhi building collapse - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सत्य निकेतन में हादसे का शिकार हुई पांच मंजिला इमारत में ज्यादातर छात्र केरल, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बताए जा रहे हैं। छात्र यहां 12 से 15 हजार रुपये प्रति बेड किराये पर रह रहे थे। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इमारत के बेसमेंट में निर्माण कार्य चल रहा था। उनका दावा है कि काम के दौरान पानी भरने से नींव कमजोर हो गई थी। हादसे के बाद बगल की इमारत भी झुकी हुई नजर आई, जिससे आसपास के लोगों में चिंता बढ़ गई। एक स्थानीय निवासी ने बताया कि ऊपरी मंजिलों पर करीब 20-25 छात्र रहते थे। 

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कभी रखरखाव का काम होते नहीं देखा
स्थानीय निवासी प्रियंका ने बताया कि वह 20-22 वर्षों से इलाके में रह रही हैं। प्रियंका के मुताबिक, हादसे वाली इमारत 20 साल से अधिक पुरानी थी और इतने वर्षों में उसमें रखरखाव का काम होते नहीं देखा गया। उन्होंने खुली नालियों और सीवर व्यवस्था पर भी सवाल उठाए।
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कोर्ट के आदेशों के बावजूद सत्य निकेतन में निर्माण का खेल
पांच मंजिला पीजी इमारत ‘हॉस्टल डेज’ के अचानक ढहने ने राजधानी में अवैध निर्माण और एमसीडी की निगरानी व्यवस्था पर फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, इमारत के बेसमेंट में निर्माण कार्य चल रहा था। आशंका है कि काम के दौरान पुराने ढांचे के पिलर कमजोर हुए और इसी वजह से इमारत भरभराकर गिर गई। हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि निर्माण गतिविधि की जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
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सत्य निकेतन का यह हादसा सैदुल्लाजाब में कुछ महीने पहले हुए भवन हादसे की भी याद दिलाता है। सैदुल्लाजाब में इमारत गिरने के बाद हाईकोर्ट में एमसीडी के उस दावे पर सवाल उठे थे, जिसमें निगम ने कहा था कि संबंधित भवन में कोई निर्माण कार्य नहीं चल रहा था। वहीं, स्थानीय लोगों ने लगातार निर्माण और भवन में बदलाव किए जाने की बात कही थी। हादसे के बाद निगम के दावे की विश्वसनीयता पर सवाल उठे और अदालत ने अवैध निर्माण को लेकर नाराजगी भी जताई थी।

दिल्ली हाईकोर्ट में अवैध निर्माण से जुड़े मामले लंबे समय से सुनवाई के दायरे में हैं। 19 जनवरी 2026 को जौहरी फार्म, जामिया नगर से जुड़े मामले में अदालत ने एमसीडी को तथ्यों की जांच कर नियमों के मुताबिक कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बाद भी विभिन्न याचिकाओं की सुनवाई में अदालत ने निगम को मौके का निरीक्षण करने, नोटिस जारी करने और जरूरत पड़ने पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करने के निर्देश दिए। मार्च-अप्रैल में अदालत ने कुछ मामलों में अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई से बचने के लिए बार-बार याचिका दायर करने वालों पर जुर्माना भी लगाया।


15 साल से निगरानी में है सत्य निकेतन
सत्य निकेतन, जिसे पहले जेजे कॉलोनी के रूप में जाना जाता था, करीब 15 साल से हाईकोर्ट की निगरानी से जुड़े मामले में रहा है। लगभग 2009-10 के मामले में अदालत ने सर्वे का आदेश दिया था कि पुनर्वास भूमि का व्यावसायिक दुरुपयोग तो नहीं हो रहा। यह मामला सीधे अवैध निर्माण से नहीं, बल्कि भूमि उपयोग से संबंधित था। पुराने न्यायिक रिकॉर्ड और मौजूदा निर्माण गतिविधियों को साथ रखकर यह जांचना जरूरी है कि नियमों की निगरानी और उनका पालन सुनिश्चित करने में कहीं गंभीर चूक तो नहीं हुई।

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