फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Waiting for test tube baby in AIIMS till 2023

अमर उजाला खासः एम्स में टेस्ट ट्यूब बेबी के लिए 2023 तक की वेटिंग

Sat, 28 Sep 2019 04:51 AM IST
दुष्यंत शर्मा परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 28 Sep 2019 04:51 AM IST
सार

  • इसके पीछे सबसे बड़ी वजह पिछले कुछ वर्षों में बांझपन से ग्रस्त मरीजों की संख्या का बढ़ना है
  • डॉक्टरों के अनुसार एम्स में अब तक 4 हजार से ज्यादा टेस्ट ट्यूब केस हो चुके हैं
  • करीब एक हजार मरीज अभी उपचाराधीन हैं
  • फिलहाल नए मरीजों को करीब चार साल तक की वेटिंग दी जा रही है

विज्ञापन
Waiting for test tube baby in AIIMS till 2023
एम्स दिल्ली

विस्तार

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में टेस्ट ट्यूब बेबी के लिए वर्ष 2023 तक की वेटिंग मिल रही है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह पिछले कुछ वर्षों के भीतर बांझपन ग्रस्त मरीजों की संख्या का बढ़ना है। 

विज्ञापन


डॉक्टरों के अनुसार, एम्स में अब तक 4 हजार से ज्यादा टेस्ट ट्यूब केस हो चुके हैं, जबकि करीब एक हजार मरीज अभी उपचाराधीन हैं। ऐसे में फिलहाल नए मरीजों को करीब चार साल तक की वेटिंग दी जा रही है।
विज्ञापन


प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग के वरिष्ठ डॉक्टर सुनेश कुमार बताते हैं कि आईवीएफ तकनीक को लेकर एम्स देश का सबसे बेहतर संस्थान है। बीते कुछ वर्षों में टेस्ट ट्यूब बेबी के लिए मरीजों की संख्या काफी अधिक पहुंची है। ऐसे में वेटिंग चार वर्ष तक की है।
विज्ञापन
विज्ञापन


एम्स की वार्षिक रिपोर्ट 2017-18 के अनुसार, दिल्ली, बिहार, यूपी, राजस्थान और हरियाणा से सर्वाधिक मरीज एम्स में टेस्ट ट्यूब बेबी के लिए पहुंचते हैं। करीब 4655 केस पुराने और 1091 नए मरीज एम्स में पंजीकृत हैं। सप्ताह में एक दिन आईवीएफ की ओपीडी होती है।

डॉक्टरों की मानें तो आईवीएफ के लिए एम्स को पहली प्राथमिकता देने के पीछे सफलता दर भी है। इस तरह के मामलों में अक्सर मरीज या उसके परिजन भरोसेमंद संस्थान का चुनाव करते हैं। कई बार उन्हें डर लगा रहता है कि ज्यादा फीस देने के बाद भी फायदा होगा या नहीं, जबकि एम्स में आने के बाद पहले ही उन्हें बता दिया जाता है कि दुनिया भर में आईवीएफ की सफलता दर करीब 35 फीसदी के आसपास ही है।

पुरुष-महिला दोनों को मिलता है उपचार
एम्स में वर्ष 2008 से आईवीएफ सुविधा उपलब्ध है। एम्स में आईवीएफ की कीमत भी निजी क्षेत्रों की तुलना में काफी कम है। डॉ. सुनेश कुमार ने बताया कि 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिला को आईवीएफ के लिए एम्स नहीं लेता है। चूंकि इस उम्र के बाद शारीरिक रूप से मरीज के साथ काफी चुनौतियां बढ़ जाती हैं। इतना ही नहीं एम्स एकमात्र ऐसा संस्थान है जहां पुरुष और महिला दोनों के लिए बांझपन का उपचार उपलब्ध है। इसके तहत करीब 14 श्रेणियों के तहत उपचार मिलता है। इसमें डोनर एग से लेकर अत्याधुनिक आईसीएसआई और आईयूआई उपचार तक शामिल है।


जन्मजात विकारों का चलता है पता
डॉ. सुनेश कुमार बताते हैं कि प्रसूति एवं स्त्री रोग को लेकर एम्स काफी सफलताएं हासिल कर चुका है। गर्भावस्था के दौरान अगर सही तरह से जांच हो तो जन्मजात विकारों की पहचान समय पर हो सकती है। इसके लिए एम्स में खास तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। गर्भावस्था में ही शिशु के जन्मजात विकारों की पहचान होने से उसे समय पर चिकित्सा मिल सकती है। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed