ट्रक और ऑटो से शहर में तीन साल में दोगुना हुआ प्रदूषण
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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए हर प्रयास कर रहा है, लेकिन साइबर सिटी में प्रदूषण धीरे-धीरे घुल रहा है।
जिले के चारों से गुजरती एक्सप्रेस वे और हाईवे से सैंकड़ों ट्रक यहां भी प्रदूषण का आंकड़ा हर दिन बढ़ा रहा है। इसके अलावा ऑटो और बिजली की आंख मिचौली से जेनरेटर का इस्तेमाल और प्रदूषण बढ़ा रहा है।
गुड़गांव के चारों ओर मुख्य रूप से चार सड़कें है। गुड़गांव-जयपुर रोड और दिल्ली-गुड़गांव-अलवर और गुड़गांव-पटौदी-रेवाड़ी और दिल्ली-गुड़गांव-फरीदाबाद हाईवे शामिल है।
पहले तीन सड़कों पर भारी वाहन जयपुर और राजस्थान के दूसरे जिले से आते हैं। गुड़गांव होते हुए दिल्ली सीमा में प्रवेश करते हैं।
इसके अलावा फरीदाबाद हाईवे पर पत्थर के खनन और आवागमन के साथ यहां से ट्रक गुजरती है। इन सड़कों से सैंकड़ों ट्रक गुजरने से यहां रात में प्रदूषण का ग्राफ कम नहीं होता है।
पर्यावरण के मुद्दे पर लंबे समय तक काम करने वाले ज्यूलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व निदेशक एचएस सैनी बताते है अगर पुराने वाहनों को सड़कों से हटा दिया जाए, तो गुड़गांव के प्रदूषण में एक साल के अंदर एक तिहाई से अधिक कमी आ सकती है।
ऑटो भी बढ़ा रहा है प्रदूषण का ग्राफ
सड़क के मुख्य चौराहों पर प्रदूषण का स्तर 900 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक से घटकर सामान्य 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक पहुंच सकता है। रात में प्रदूषण पर नियंत्रण पाने में आसानी होगी।
बता दें कि हाल ही में किए अध्ययन में शहर का प्रदूषण स्तर दोगुने के करीब पहुंच गया था। प्रमुख चौराहों पर प्रदूषण सात से 13 गुना अधिक मिला था।
साइबर सिटी में सार्वजनिक वाहन की माकूल बंदोबस्त नहीं होने के कारण लोगों के आने जाने का सबसे बड़ा साधन ऑटो है। पूरे जिले में करीब 35 हजार ऑटो चलते हैं।
जो प्रदूषण बढ़ाने में बड़ा योगदान दे रहा है। इसमें एक चौथाई 10 साल पुराने डीजल की गाड़ियां है। प्रदूषण विभाग के वैज्ञानिक बताते है कि कम वायु में डीजल या पेट्रोल के जलने से कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस अधिक मात्रा में पैदा होती है।
करीब 100 नैनो पार्टिकल मैटर निकलते है, जिससे पर्टिकुलेट मैटर की संख्या में इजाफा होता है। कार्बन मोनो ऑक्साइड के साथ नाइट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा अधिक निकलती है। जो खतरनक है।
इसमें पॉल्यूशन कैटालिस्ट नहीं होने की वजह से प्रति लीटर डीजल या पेट्रोल पर 96 फीसदी अधिक प्रदूषण पैदा होती है। जबकि नए गाड़ियों पर कैटालिस्ट होने की वजह से इसमें प्रदूषण का स्तर कम होगा।