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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   The trial court granted relief even though bail was pending in the High Court.

Delhi NCR News: हाईकोर्ट में जमानत लंबित होने के बाद भी ट्रायल कोर्ट ने दी राहत

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 17 Dec 2025 07:55 PM IST
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उच्च अदालत ने जताई कड़ी आपत्ति, पोक्सो एक्ट में आरोपी की हाइकोर्ट में लंबित थी जमानत याचिका
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने पोक्सो एक्ट के तहत दुष्कर्म के मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को जमानत देने पर कड़ी आपत्ति जताई है। मामले में आरोपी की जमानत याचिका हाईकोर्ट में लंबित थी। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने इस प्रथा को फोरम शॉपिंग को बढ़ावा देने वाला बताते हुए कहा कि निचली अदालतों को ऐसी स्थिति में अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए।
मामला साहिल नाम के आरोपी से जुड़ा है जिस पर नाबालिग से दुष्कर्म का आरोप है। हाईकोर्ट में जमानत याचिका लंबित रहते हुए आरोपी ने ट्रायल कोर्ट में अलग से अर्जी दाखिल की। ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता और उसके पिता के मुकदमे में दुश्मन हो जाने के आधार पर आरोपी को नियमित जमानत दे दी। हाईकोर्ट को जब इसकी जानकारी हुई तो उसने ट्रायल जज से रिपोर्ट और स्पष्टीकरण मांगा। अदालत ने कहा कि हालांकि कानूनन ट्रायल कोर्ट को जमानत पर फैसला लेने से कोई पूर्ण रोक नहीं है, लेकिन न्यायिक शिष्टाचार व अनुशासन के सिद्धांत के तहत निचली अदालत को ऊपरी अदालत में लंबित याचिका के बारे में जानने के बाद कम से कम आरोपी से हाईकोर्ट की अर्जी वापस लेने को कहना चाहिए था।
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उच्च अदालत ने निचली अदालतों के जजों को दी सलाह
उच्च अदालत ने आरोपी के वकील की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने ट्रायल कोर्ट से हाईकोर्ट में लंबित याचिका का तथ्य छिपाया, जो सामग्री तथ्य का दमन है। हालांकि, जांच अधिकारी ने अपनी जवाबी रिपोर्ट में हाईकोर्ट में लंबित याचिका का जिक्र किया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने इससे अधिक सावधानी नहीं बरती। हालांकि, हाईकोर्ट ने पीड़िता और उसके पिता के हॉस्टाइल हो जाने के आधार पर दी गई जमानत में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया, क्योंकि इससे न्याय के हितों को नुकसान पहुंचेगा। ट्रायल कोर्ट की चूक को नोट करते हुए हाईकोर्ट ने दिल्ली की सभी निचली अदालतों के जजों को सलाह दी कि जमानत अर्जी पर विचार करने से पहले स्टेटस रिपोर्ट या वकीलों के बयान से यह सुनिश्चित कर लें कि ऊपरी अदालत में कोई समान याचिका लंबित तो नहीं है।
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