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Delhi NCR News: अस्पताल की दहलीज से आंदोलन को मिली नई ऊर्जा, जनसमर्थन ने बदला पूरा परिदृश्य

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 24 Jul 2026 09:09 PM IST
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The movement gained new momentum from the hospital threshold; public support transformed the entire landscape
पोस्टर के साथ प्रदर्शन करती छात्रा। - फोटो : Amar Ujala
वांगचुक को अस्पताल ले जाने की कार्रवाई बनी टर्निंग पॉइंट, भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर नई ताकत मिली
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अमर उजाला ब्यूरो


नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का आंदोलन 28वें दिन ऐसे मोड़ पर पहुंच गया, जहां उसका स्वरूप और प्रभाव दोनों बदलते दिखाई दिए। शुरुआती दिनों में सीमित जनभागीदारी और घटते उत्साह से जूझ रहा आंदोलन सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद अचानक व्यापक जनसमर्थन हासिल करने में सफल रहा। आंदोलन की समीक्षा बताती है कि यह पूरा घटनाक्रम आंदोलन के लिए निर्णायक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
सीजेपी ने 20 जून को नीट पेपर लीक मामले और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था। 28 जून से सोनम वांगचुक अनशन पर बैठ गए, लेकिन लगातार तीन सप्ताह तक प्रदर्शन अपेक्षित जनसमर्थन नहीं जुटा सका। जंतर-मंतर पर भीड़ सीमित रही और कई बार धरनास्थल लगभग खाली नजर आया। संगठन के भीतर भी इस स्थिति को लेकर चिंता थी।
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हालात 18 जुलाई को बदले, जब स्वास्थ्य बिगड़ने पर दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। उन्हें सफेद चादर से ढककर प्रदर्शन स्थल से हटाए जाने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं। इसके बाद आंदोलन को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर नई ताकत मिली। सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई, विपक्षी दल खुलकर समर्थन में आए और कई नेताओं ने जंतर-मंतर पहुंचकर एकजुटता दिखाई।
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अस्पताल से जारी वांगचुक के संदेश ने भी आंदोलनकारियों का मनोबल बढ़ाया। उन्होंने इसे आजादी का दूसरा आंदोलन बताते हुए संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया। इसके बाद जंतर-मंतर और आसपास की सड़कों पर लोगों की संख्या लगातार बढ़ती गई। युवाओं, छात्रों, नौकरीपेशा लोगों, महिलाओं और बुजुर्गों की भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार दिया।
20 जुलाई के संसद मार्च में भी यह बदला हुआ स्वरूप देखने को मिला। पुलिस की बैरिकेडिंग, लाठीचार्ज और आंसू गैस के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने संसद मार्ग की ओर बढ़ने का प्रयास किया। इससे स्पष्ट हुआ कि आंदोलन अब केवल परीक्षा संबंधी विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकार पर राजनीतिक और जनदबाव बनाने की दिशा में आगे बढ़ चुका है।
दिलचस्प यह भी है कि बृहस्पतिवार देर रात वांगचुक का अनशन समाप्त होने के बाद भी आंदोलन की गति धीमी नहीं पड़ी। शुक्रवार को भी जंतर-मंतर पर लोगों की भीड़ बनी रही। प्रदर्शनकारी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर कायम हैं। वहीं, केंद्र सरकार के साथ शुरू हुई सकारात्मक बातचीत ने आंदोलनकारियों में यह भरोसा भी पैदा किया है कि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार हो सकता है।
अस्पताल पहुंचने से पहले आंदोलन था ठहराव में
वांगचुक को अस्पताल ले जाने से पहले आंदोलन उतना सशक्त जनसमर्थन नहीं जुटा पा रहा था। पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दे के बावजूद भीड़ सीमित थी और कई दिनों तक धरनास्थल पर एक हजार से कम लोग पहुंचे। यही कारण था कि संगठन के भीतर आंदोलन की दिशा और प्रभाव को लेकर चिंता बढ़ने लगी थी।

अनशन टूटा, लेकिन आंदोलन नहीं
अनशन समाप्त होने के बाद भी आंदोलन की धार बरकरार रही। प्रदर्शनकारी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं। सरकार के साथ संवाद शुरू होने से उनमें भरोसा बढ़ा है कि आंदोलन निर्णायक मोड़ तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि अनशन खत्म होने के बाद भी जनसमर्थन और उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी।
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