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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   The battle to clean the Yamuna is three decades old, and despite spending crores, the result has been zero

Clean Yamuna Campaign: तीन दशक पुरानी है यमुना को साफ करने की जंग, करोड़ों खर्च करने के बाद भी नतीजा रहा सिफर

Sat, 01 Nov 2025 06:44 AM IST
दुष्यंत शर्मा नितिन राजपूत, नई दिल्ली
नितिन राजपूत, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 01 Nov 2025 06:44 AM IST
सार

आलम यह है कि सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और दिल्ली हाईकोर्ट तक हर अदालत बार-बार फटकार लगा रही है, जुर्माना ठोक रही है, लेकिन प्रशासन और सरकार टालमटोल करने में लगी है।

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The battle to clean the Yamuna is three decades old, and despite spending crores, the result has been zero
यमुना नदी file - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजधानी की जीवनदायिनी यमुना नदी को साफ करने की लड़ाई 30 साल से ज्यादा पुरानी है, लेकिन मौजूदा समय में भी दिल्ली का 22 किमी हिस्सा नदी को सीवेज की नाली बना रहा है। आलम यह है कि सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और दिल्ली हाईकोर्ट तक हर अदालत बार-बार फटकार लगा रही है, जुर्माना ठोक रही है, लेकिन प्रशासन और सरकार टालमटोल करने में लगी है। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि इतना पैसा, इतने आदेश फिर भी यमुना क्यों मरी हुई है?

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इस सबके बीच सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की हालिया रिपोर्ट ने कहा है कि यमुना नदी को साफ करना नामुमकिन नहीं है। बस इसके लिए पुरानी योजनाओं से हटकर नई सोच और सख्त कार्रवाई की जरूरत है। सीएसई की रिपोर्ट में इंडिया एन्वायरनमेंट पोर्टल के मुताबिक, यमुना को बचाने की लड़ाई 1990 के दशक की शुरुआत में पहली जनहित याचिका के साथ अदालतों में शुरू हुई थी।
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हाल ही में कुछ और महत्वपूर्ण पड़ाव हुए। इसमें सितंबर 2012-2013 की जनहित याचिका और 2013 व 2014 के विविध आवेदनों के जवाब में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पर्यावरण मंत्रालय को यमुना की सफाई के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया। वहीं, जुलाई 2018 में एनजीटी ने एक निगरानी समिति (यमुना मॉनिटरिंग कमेटी) का गठन किया। इसके अलावा, अक्तूबर 2018 में यमुना निगरानी समिति (वाईएमसी) द्वारा एनजीटी को कार्ययोजना प्रस्तुत की गई।
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सख्त निर्देश के बावजूद भी सुधार नहीं...
रिपोर्ट में बताया गया है कि जनवरी 2023 में प्रदूषित यमुना पर एक और जनहित याचिका दायर की गई। एनजीटी ने दिल्ली के मुख्य सचिव को अन्य प्राधिकरणों और हरियाणा व उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों के साथ समन्वय करके प्रगति की निगरानी करने का आदेश दिया। ऐसे में उपराज्यपाल वीके. सक्सेना की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई। जनवरी और जुलाई 2023 में एनजीटी को स्थिति रिपोर्ट सौंपी गई।

अक्तूबर 2023 में एनजीटी ने नालियों की निकासी, अनाधिकृत कॉलोनियों और जेजे क्लस्टरों में सीवर लाइन बिछाने, एसटीपी निर्माण, औद्योगिक अपशिष्ट और मल प्रबंधन व अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग पर काम पूरा नहीं करने के लिए दिल्ली सरकार को फटकार लगाई। अगस्त 2024 में एनजीटी ने यमुना प्रदूषण के मामले का स्वतः संज्ञान लिया और नदी में प्रदूषण के स्तर और दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) द्वारा प्रबंधित एसटीपी की दक्षता पर चिंता व्यक्त की। नवंबर 2024 में एनजीटी ने यमुना में बहने वाले सीवेज के प्रबंधन के लिए कदम न उठाने पर डीजेबी की खिंचाई की। डीजेबी और दिल्ली नगर निगम पर 25.22 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।

6,856 करोड़ से ज्यादा खर्च किए सफाई पर
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले चार साल 2017-2022 में दिल्ली सरकार ने यमुना सफाई पर 6,856 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए। यही नहीं, शहर में 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) हैं, जो 80-100 फीसदी गंदे पानी को साफ करने की क्षमता रखते हैं। करीब 80 फीसदी इलाका सीवर लाइनों से जुड़ा है। फिर भी नदी गंदी बनी हुई है। इसके अलावा, दिल्ली में यमुना का सिर्फ 22 किलोमीटर का हिस्सा है, जो पूरी नदी का दो फीसदी है। लेकिन, यहीं से 80 फीसदी प्रदूषण आता है। साल के 9 महीने नदी में पानी नहीं बहता, सिर्फ 22 नालों का गंदा पानी और कचरा बहता है।

यमुना गंदी क्यों?
सीएसई ने अपनी रिपोर्ट में यमुना गंदी क्यों है, इसका कारण भी बताया है। इसकी शुरुआत दिल्ली में कितना गंदा पानी बनता है, इसका सही आंकड़ा नहीं है। इससे शुरू होती है। साथ ही, कई इलाकों में सीवर नहीं है। ऐसे में टैंकर गंदगी नदी या नालों में डाल देते हैं। यही नहीं, साफ किया पानी भी गंदे नालों में मिल जाता है, सफाई बेकार हो जाती है।

अब तक क्या हुआ?
रिपोर्ट के मुताबिक, एसटीपी की संख्या और क्षमता बढ़ाई गई है। वहीं, सख्त नियम तो बनाए गए है, लेकिन कई प्लांट मानक पूरा नहीं कर पाते। दूसरी ओर, नालों से गंदगी रोकने के लिए इंटरसेप्टर सीवर बनाए गए हैं। वहीं, अनाधिकृत कॉलोनियों में सीवर लाइनें भी बिछाईं गई है। इसके अलावा, फैक्टरियों के कचरे पर नियंत्रण किया, लेकिन गुणवत्ता में कमी है।


सीएसई की 5 सलाह, ऐसे होगी यमुना साफ

  • टैंकरों पर निगरानी: सभी टैंकर रजिस्टर हों, गंदगी एसटीपी तक पहुंचे। पाइपलाइन से सस्ता और तेज।
  • साफ पानी नालों में न डालें: साफ पानी को अलग रखें, गंदे से मिलने न दें।
  • साफ पानी का इस्तेमाल: अभी सिर्फ 10-14 फीसदी साफ पानी इस्तेमाल होता है, बाकी बर्बाद।
  • पुन: उपयोग के लिए नियम: नदी में डालने के बजाय इस्तेमाल के लिए साफ करें, इससे खर्च बचेगा।
  • बड़े नालों पर फोकस: नजफगढ़ और शाहदरा नाले 84 फीसदी प्रदूषण देते हैं, इनकी योजना दोबारा बनाएं।

मरी हुई यमुना दिल्ली की शर्म है। यह नीचे के शहरों पर भी बोझ डालती है। सही योजना से इसे बचाया जा सकता है। यमुना की सफाई पर साल से करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, लेकिन सिर्फ पैसा काफी नहीं। हमें अलग तरीके से सोचना और काम करना होगा।
-सुनीता नारायण, महानिदेशक, सीएसई

वजीराबाद में दिल्ली आने के बाद यमुना का नामोनिशान मिट जाता है।
-सुष्मिता सेनगुप्ता, सीएसई

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