Delhi High Court: तेजिंदर सिंह की याचिका खारिज, पूर्व आर्मी चीफ को रिश्वत की पेशकश का आरोप
न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने आरोप तय करने को लेकर दो अगस्त, 2019 के निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली पूर्व ले. जनरल तेजिंदर सिंह की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल तेजिंदर सिंह के खिलाफ आरोप तय किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। तेजिंदर सिंह पर टाट्रा ट्रक खरीद के लिए तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल वी. के. सिंह को घूस देने की कथित पेशकश करने का आरोप है।
न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने आरोप तय करने को लेकर दो अगस्त, 2019 के निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली पूर्व ले. जनरल तेजिंदर सिंह की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि जहां तक अभियोजन मामले में विभिन्न प्रकार की छूट और विरोधाभासों का संबंध है तो यह सुनवाई का विषय है और ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इस मामले में कोई सामग्री नहीं है। अदालत ने कहा यह स्पष्ट किया जाता है कि इस फैसले में की गई टिप्पणियां आरोप तय करने के आदेश की वैधता के मुद्दे के निर्धारण को लेकर की गई हैं। इस अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई मंतव्य नहीं दिया है। इसका निर्धारण रिकॉर्ड पर रखे गए साक्ष्यों के मूल्यांकन और सुनवाई की समाप्ति के बाद निचली अदालत द्वारा किया जाएगा।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के अनुसार शिकायतकर्ता तत्कालीन थलसेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने 30 मार्च और 10 अप्रैल 2012 को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि 22 सितम्बर 2010 को उनके कार्यालय में मुलाकात के दौरान तेजिंदर सिंह ने टाट्रा ट्रक सहित 1,676 हाई मोबिलिटी व्हिकल्स (एचएमवी) की खरीद संबंधी फाइल मंजूर करने के एवज में रवि ऋषि नामक व्यक्ति की ओर से 14 करोड़ रुपये घूस की पेशकश की थी। शिकायत के आधार पर प्रारंभिक जांच की गई थी और बाद में सीबीआई ने अक्टूबर 2012 में भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की अधिनियम की धारा 12 के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की थी।
तेजिंदर सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और प्रमोद कुमार दुबे ने दलील दी कि आरोप तय करने का निचली अदालत का आदेश निर्धारित कानून के विपरीत है, क्योंकि भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 12 के तहत किसी अपराध के पक्ष में कोई आधार नहीं दिया गया था।
सीबीआई के वकील ने इस दलील का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है और निचली अदालत की ओर से पारित आदेश में कोई हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।