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निठारी कांड के दोषी कोली को नहीं होगी फांसी

Thu, 29 Jan 2015 01:38 AM IST
Updated Thu, 29 Jan 2015 01:38 AM IST
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Surendra koli sentenced life time imprisonment from allahabad high court.

निठारी कांड के दोषी सुरेंद्र कोली की दया याचिका पर निर्णय लेने में देरी को हाईकोर्ट ने असंवैधानिक करार देते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया है।

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राज्यपाल और राष्ट्रपति की ओर से कोली की दया याचिका खारिज करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल की खंडपीठ ने कहा कि प्रदेश सरकार ने दया याचिका राष्ट्रपति के पास भेजने में 26 माह का समय लिया।

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इस देरी की जायज वजह सरकार के पास नहीं है। हालांकि पीठ ने दया याचिका के निस्तारण में केंद्र सरकार की ओर से लिए गए समय को उपयुक्त करार दिया है। पीठ ने सुरेंद्र की ओर से अनावश्यक याचिकाएं दाखिल कर समय बर्बाद करने की सरकार की दलील को बेबुनियाद माना।
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फांसी देने में हुए ‌विलंब के आधार पर दायर की थी या‌चिका

Surendra koli sentenced life time imprisonment from allahabad high court.

खंडपीठ ने कहा कि दया याचिकाओं के निस्तारण में तीन वर्ष तीन माह का लंबा समय लगा। इस देरी को सही करार देने के लिए सरकार ने जो तथ्य बताए हैं वह न्यायालय को भ्रमित करने वाले हैं। इस बीच फाइल सरकारी विभागों में लटकी रही और डीएम व जेल अधीक्षक ने रिपोर्ट भेजने में डेढ़ वर्ष का समय लिया।

गृह विभाग ने बिना क्षेत्राधिकार दया याचिका अस्वीकार करने की संस्तुति की और विधि विभाग ने न सिर्फ इसे स्वीकार किया बल्कि इसी आधार पर राज्यपाल के पास अपनी रिपोर्ट भेज दी। राज्यपाल के विधि सलाहकार ने भी उनके संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी करते हुए बिना सोचे समझे सरकार की संस्तुति को स्वीकार करने की सलाह दी। यह विलंब संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत बंदी को प्राप्त मौलिक अधिकार का हनन है।

फांसी की सजा के खिलाफ कोली की अपील सुप्रीमकोर्ट की ओर से 11 सितंबर 2009 को खारिज कर दी गई थी। इसके बाद 15 फरवरी 2011 को कोली ने डासना जेल अधीक्षक के माध्यम से सरकार के समक्ष दया याचिका प्रस्तुत की थी। राज्यपाल ने दो अप्रैल 2013 को दया याचिका खारिज कर दी।

कोली को ‌मिली उम्रकैद की सजा

Surendra koli sentenced life time imprisonment from allahabad high court.

खंडपीठ ने फांसी की सजा देने के लिए जारी डेथ वारंट को भी असंवैधानिक करार दिया। कोर्ट के मुताबिक डेथ वारंट जारी करने में दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों को नजरअंदाज किया गया। कोली को जेल की तनहाई में नियम विरुद्ध तरीके से रखा गया जबकि फांसी की सजा को तब तक नहीं माना जा सकता है जब तक कि सुप्रीमकोर्ट बंदी की अपील खारिज नहीं कर देता है। खंडपीठ ने इसे बंदी के मानवाधिकार का हनन करार दिया।


चौदह वर्षीय किशोरी के मामले में सुनाई गई थी फांसी की सजा
सुरेंद्र कोली को 14 वर्षीय बालिका रिंपा हलधर के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट की ओर से सजा के खिलाफ अपील खारिज होने के बाद कोली की दया याचिका भी खारिज कर दी गई।

इसके बाद पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेसी और सुरेंद्र कोली ने याचिका दाखिल कर राज्यपाल और राष्ट्रपति के निर्णय को चुनौती दी थी। दया याचिका के निस्तारण में हुए अनावश्यक विलंब के आधार पर फांसी को उम्रकैद में तब्दील करने की प्रार्थना की गई थी।

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