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Pollution NCR : दिल्ली की हवाओं में तेजी से घुल रहा है पराली का धुआं, फिलहाल नहीं मिलने वाली 'जहर' से मुक्ति

Thu, 14 Nov 2024 02:20 AM IST
दुष्यंत शर्मा संतोष कुमार, नई दिल्ली
संतोष कुमार, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 14 Nov 2024 02:20 AM IST
सार

विशेषज्ञ बताते हैं कि जिस तरह से उत्तर भारत में पराली जलाने के मामले दिख रहे हैं, उसके हिसाब से फिलवक्त इसमें बड़े पैमाने पर कमी आने का अंदेशा नहीं है।

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Stubble smoke is rapidly dissolving in the air of Delhi
Delhi Pollution - फोटो : pti

विस्तार

पराली का धुआं भी नवंबर में दिल्ली की हवाओं पर भारी पड़ रहा है। पहले पखवाड़े में अब तक दिल्ली में धूल के महीन कणों पीएम2.5 में रोजाना औसतन 20 फीसदी हिस्सा पराली के धुएं का रहा है। जबकि अक्तूबर के चार दिनों को छोड़कर इसका हिस्सा बेहद कम रहा था। विशेषज्ञ बताते हैं कि जिस तरह से उत्तर भारत में पराली जलाने के मामले दिख रहे हैं, उसके हिसाब से फिलवक्त इसमें बड़े पैमाने पर कमी आने का अंदेशा नहीं है।

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भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक, इस सीजन में पहली बार 8 अक्तूबर को दिल्ली में पराली का धुआं पहुंचा था। उस दिन इसकी हिस्सेदारी महज 0.122 फीसदी रही थी। इसके बाद 12 दिनों तक इसमें बड़ी बढ़ोतरी नहीं दिखी। 21 अक्तूबर को आए तीन फीसदी से ज्यादा के उछाल के साथ यह 23 अक्तूबर को पहली बार दो अंकों में पहुंच गया। 23 अक्तूबर को पराली के धुएं का हिस्सा 15.92 फीसदी पहुंच गया। आगे दो दिनों तक मात्रा कमोवेश स्थिर रही। इसके बाद फिर से गिरावट दर्ज की गई।
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मौसमी दशाएं बदलने के साथ एक नवंबर को पराली के धुएं की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी। 31 अक्तूबर के 27 फीसदी से बढ़कर एक नवंबर को 35 फीसदी पहुंच गया। हालांकि, पीएम2.5 में पराली के धुएं का हिस्सा कम हुआ है, लेकिन इसकी मात्रा औसतन 20 फीसदी के करीब रही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि बीते चार दिन से उत्तर भारत में पराली जलने के मामले तेजी से बढ़े हैं। इस बीच हर दिन एक हजार से ज्यादा फायर काउंट दर्ज हैं। जाहिर तौर पर अभी पराली के धुएं से दिल्ली का राहत मिलती नहीं दिख रही है। इसका हिस्सा 15-25 फीसदी रहने का अंदेशा है।
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12 सालों में सबसे कम जली पराली
नवंबर में पराली के धुएं का हिस्सा बेशक तेजी से बढ़ा है, लेकिन बीते सालों की तुलना में इस साल उत्तर भारत में पराली जलने की घटनाएं कम हुई हैं। आईआईटीएम ने 2012 से 2024 के बीच का आंकड़ा साझा किया है। इसमें 15 सितंबर से 12 नवंबर के बीच पराली जलाने के मामले दर्ज हैं। इसके हिसाब से 2024 लगातार दूसरा साल रहा है, जब पराली जलाने के मामलों में गिरावट दर्ज की गई है। बीते दो महीनों में अभी तक 35,868 मामले दर्ज किए गए हैं। जबकि बीते साल का आंकड़ा 52,465 का था।

इस बीच सबसे ज्यादा पराली 2016 में जली थी। उस दौरान करीब 1,22,916 पराली जलाने की घटनाएं हुई थी। 2020 व 2021 में भी कमोवेश यही स्थिति थी। लेकिन इसके बाद तेजी से गिरावट आई है। विशेषज्ञ इसकी वजह किसानों को मिलने वाले वैकल्पिक तरीकों के साथ जागरूकता व सरकार की तरफ से चलाए जा रहे अभियानों से जोड़कर देख रहे हैं।


जानिए पीएम10 व पीएम 2.5
हवा में मौजूद महीन कणों को पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) कहते हैं। आकार के आधार पर इनको पीएम10 या पीएम2.5 में बांटा गया है। जिन कणों का आकार 10 माइक्रोन या माइक्रोमीटर तक होता है, उनको पीएम10 कहते हैं। जबकि जिनका आकार 2.5 माइक्रोन तक होता है, उसे पीएम2.5 कहा जाता है। इतने महीन कण सांस के जरिए फेफडों तक पहुंच जाते हैं और पूरे श्वसन तंत्र पर असर डालते हैं। जो कण जितना महीन होगा, शरीर के लिए वह उतना ही घातक है। पश्चिमी देशों में पीएम1 की मात्रा भी मापी जाती है। भारत में हवा ठीक तब मानी जाती है, जब एक घन मीटर में पीएम2.5 की मात्रा 60 या इससे कम हो। जबकि पीएम10 के लिए यह आंकड़ा 100 है।
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