स्टीफेंस के छात्र के निलंबन पर लगाई रोक
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दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज के छात्र देवांश मेहता और प्रिंसिपल वालसन थंपू के बीच चल रहे विवाद में आज कोर्ट ने एक आदेश पारित किया है।
गौरतलब है कि बृहस्पतिवार को स्टीफेंस छात्र जिसे प्रिंसिपल ने कॉलेज से निलंबित कर दिया था ने अदालत में याचिका दायर की थी। उसी याचिका की सुनवाई आज दिल्ली हाईकोर्ट ने की।
अपने आदेश में कोर्ट ने देवांश के निलंबन पर 21 अप्रैल तक के लिए रोक लगा दी है। अदालत ने सुनवाई को अगली तारीख तक के लिए टाल दिया है। वहीं दूसरी ओर देवांश के निलंबन से गुस्साए छात्र कॉलेज के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं।
ई-मैगजीन पर उठा विवाद
डीयू के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में ई-मैगजीन को लेकर उठा विवाद अदालत तक जा पहुंचा है। ई-मैगजीन के संपादक और स्टीफेंस के छात्र देवांश मेहता ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपने संस्पेंशन और ई-मैगजीन पर लगे बैन के खिलाफ बृहस्पतिवार को याचिका दायर की।
देवांश मेहता जो दर्शनशास्त्र के तृतीय वर्ष के छात्र हैं उनकी याचिका के अनुसार, प्रिंसिपल वालसन थंपू ने उनके खिलाफ अनुचित ढंग से कार्रवाई की है। इस तरह के किसी एक्शन को अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन और लोकतंत्र की हत्या माना जाएगा जिससे तानाशाही में बढोतरी होगी।
देवांश ने अपने खिलाफ उठाए गए कदम के लिए आर्टिकल 226 के अंतर्गत एक याचिका डाली है और अपने खिलाफ हो रहे सभी कार्यों को अवैध करार दिया है।
जांच कमेटी में छात्र को बोलने का नहीं है अधिकार
अपनी याचिका में देवांश ने कहा है कि उनके खिलाफ जो एक व्यक्ति वाली जांच कमेटी बनाई गई है वह खुद प्रिंसिपल ने बनाई है। यहां यह भी व्यवस्था है कि पीड़ित अपनी फैसला लेने की प्रक्रिया में शामिल भी नहीं हो सकता। हाईकोर्ट आज इस मामले की सुनवाई करेगी।
मेहता ने अपनी याचिका में ये भी कहा है कि हालांकि उसने प्रिंसिपल थंपू का इंटरव्यू बिना पूछे छापा है और वो भी अपमानित करने वाला नहीं है। ऐसे में उनके खिलाफ मानहनन करने का वारंट जारी करते हुए इतना गंभीर एक्शन कैसे लिया जा सकता है।
याचिका में आगे कहा गया है कि चूंकि भारतीय संविधान के आर्टिकल 19(1) में सभी को प्रेस के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी है इसलिए अभिव्यक्ति कभी भी दुर्व्यवहार में नहीं गिनी जा सकती। संविधान के अनुसार सबको सार्वजनिक रूप से अपनी बात कहने का हक है।
'सोच समझकर प्रिंसिपल ने किया सस्पेंड'
मेहता ने अपनी याचिका में ये भी जिक्र किया है कि डीयू का यह कर्तव्य है कि वह देखे कि उससे मान्यता प्राप्त कॉलेज यूनिवर्सिटी के नियमों के अनुसार चल रहे हैं कि नहीं। और इस केस में उनका व्यवहार कहीं से भी विश्वविद्यालय के नियमों और अनुशासन को भंग नहीं करता।
मेहता ने कहा कि प्रिंसिपल थंपू द्वारा उनके खिलाफ करवाई जा रही जांच साफतौर पर जानबूझकर किया गया है। इसके साथ ही प्रिंसिपल का उनको सस्पेंड करने और उनका नाम प्राइज लिस्ट में से काट देना उनकी छवि खराब करने के लिए किया गया है। इसके बारे में उनका तर्क है कि क्योंकि जांच कमेटी की रिपोर्ट आने से पहले ही प्रिंसिपल उनकी अवमानना कर चुके थे।
क्या है पूरा विवाद
गौरतलब है कि डीयू के स्टीफेंस कॉलेज से निकलने वाली ई-मैगजीन के हालिय संस्करण के संपादक ने प्रिंसिंपल वालसन थंपू पर एक स्पूफ इंटरव्यू छापा था। इसी के बाद प्रिंसिपल वालसन थंपू ने मैगजीन के इस संस्करण को बैन कर दिया गया था।
यह मामला यहीं नहीं थमा बैन करने मैगजीन एडिटर देवांश मेहता के खिलाफ कार्रवाई करते हुए प्रिंसिपल ने उनका नाम जल्द होने वाले एक अवार्ड समारोह की लिस्ट से भी हटा दिया।
मालूम हो कि यह अवार्ड छात्र के अच्छे व्यवहार और एक्सट्रा एक्टिविटीज में भाग लेने के लिए दिया जाने वाला था। इसे खुद सीएम केजरीवाल देने वाले थे।
नाम हटाए जाने के बाद छात्र ने इसका विरोध किया और कॉलेज फैकल्टी भी इसमें शामिल हो गई। बाद में प्रिंसिपल ने सख्त रवैया अपनाते हुए देवांश को सस्पेंड कर दिया।
जिसके बाद देवांश ने दिल्ली उच्चा न्यायालय में इसके खिलाफ बृहस्पतिवार को एक याचिका दायर कर दी। जिसका आज सुनवाई सुनिश्चित की गई है।