मोक्षधाम पर हावी जाति बंधन, कैसे होगा मुक्त?
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शरीर से आत्मा निकल जाने पर भी जाति-धर्म के ये बंधन पीछा नहीं छोड़ते। यही वजह है कि सुनपेड़, सीकरी, भनकपुर, नंगला जोगियान जैसे गांवों में आज भी हर व्यक्ति की अंत्येष्टि अपनी जाति व समाज के श्मशानघाट में ही होती है। इन गांवों में एक नहीं चार-चार जातिगत श्मशान घाट हैं। वर्षों पुरानी व्यवस्था के खिलाफ कई बार आवाज उठी लेकिन एकजुटता की कमी के कारण परंपरा खत्म नहीं हुई।
हालांकि, कबूलपुर बांगर की पुरानी पंचायत ने गांव में चार श्मशानों को सार्वजनिक बनाकर इतिहास रचा था। इसके बाद अन्य गांवों में आवाज उठी, लेकिन सिरे नहीं चढ़ पाई। सामाजिक समरसता मंच 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती के मौके पर इन गांवों में बैठक कर इन कुरीति के खिलाफ आवाज बुलंद करेगा। इस कवायद का अब ग्राम पंचायत भी खुलकर समर्थन कर रही है।
बदलते वक्त के साथ-साथ समाज को भी जातिगत रूढ़ियों को त्यागना चाहिए। दिवंगत व्यक्ति के शरीर में कोई जाति नहीं होती। हिंदू धर्म रीति के अनुसार अंतिम संस्कार वाले मोक्षधामों को जाति बंधन से मुक्त किया जाना चाहिए।- गंगाशंकर मिश्र, विभाग प्रमुख, सामाजिक समरसता मंच
गांव में चार श्मशान घाट हैं। पंचायत और गांव के बुजुर्गों की इस पुरानी परंपरा को लेकर दो महीने से काम कर रहे हैं। अधिकांश लोगों की सहमति मिल गई है। उम्मीद है कि हमें सफलता मिलेगी।- सचिन माढोतिया, सरपंच भनकपुर
मृत्यु यानि मोक्ष की कोई जाति नहीं होती। उसी प्रकार मोक्षधामों को भी जातिबंधन से मुक्त किया जाना चाहिए। हमारा गांव इस परंपरा से जकड़ा हुआ है। 20 अप्रैल को होने वाली ग्राम सभा में इस विषय को उठाया जाएगा।- इंद्रेश, सरपंच, गांव सीकरी