'व्यक्ति झूठ बोल सकता है': बारह साल बाद पत्नी की डायरी से मिला इंसाफ, दहेज-हत्या के आरोप से पति और परिवार बरी
Delhi Court: दिल्ली उच्च न्यायालय के 2010 के एक फैसले का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि ऐसी कोई धारणा नहीं है कि विवाहित महिला द्वारा अपने ससुराल या अपने माता-पिता के घर पर की गई हर आत्महत्या का कारण यह होना चाहिए कि वह अपने पति या ससुराल वालों के हाथों उत्पीड़न झेल रही थी।
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साकेत कोर्ट ने पति और उसके परिवार के सदस्यों को दहेज हत्या के आरोप में 12 साल बाद बरी कर दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल पाहुजा की अदालत ने कहा कि मृतक की डायरी में, अभियुक्त व्यक्तियों के विरुद्ध दहेज की मांग या उत्पीड़न या क्रूरता का एक भी आरोप नहीं था, न ही उसने अपने सुसाइड नोट में अपनी मृत्यु के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराया था। ऐसे में शिकायतकर्ता के वकील की दलीलों में यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि उसने आत्महत्या क्यों की। अदालत ने कहा कि ऐसा कोई अनुमान नहीं है कि विवाहित महिला द्वारा की गई हर आत्महत्या उत्पीड़न के कारण ही होती है।
अदालत पति योगेश कुमार और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ एक मामले की सुनवाई कर रही थी, जो मालवीय नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, कुमार ने फरवरी 2012 में मधु से विवाह किया था, तथा कुछ महीनों के भीतर ही सितंबर में क्रूरता तथा दहेज की मांग के कारण उसे फांसी लगाकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा। न्यायालय ने महिला की माँ, तीन भाइयों तथा बहन सहित महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ये असंगतताओं, सुधारों तथा निराधार आरोपों से प्रभावित थीं।
अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाहों द्वारा न्यायालय के समक्ष दिए गए बयानों में पर्याप्त अंतर हैं, चूँकि वे पिछले बयानों का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए ऐसी गवाही न्यायालय के विश्वास को प्रेरित नहीं करती, इसलिए उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। दिल्ली उच्च न्यायालय के 2010 के एक फैसले का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि ऐसी कोई धारणा नहीं है कि विवाहित महिला द्वारा अपने ससुराल या अपने माता-पिता के घर पर की गई हर आत्महत्या का कारण यह होना चाहिए कि वह अपने पति या ससुराल वालों के हाथों उत्पीड़न झेल रही थी।
व्यक्ति झूठ बोल सकता है परिस्थितियां नहीं
अदालत ने कहा कि यह एक प्रसिद्ध कहावत है कि पुरुष झूठ बोल सकते हैं, लेकिन परिस्थितियाँ नहीं विवाह के सात साल के भीतर वैवाहिक घर में अप्राकृतिक मृत्यु का एकमात्र तथ्य अपने आप में आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। साक्ष्यों के अभाव में आरोपियोंको दोषमुक्त करार दिया जाता है।