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प्रसिद्ध वकील संतोष हेगड़े ने कहा- लोकतंत्र का मतलब सिर गिनना नहीं, दिल भी जोड़े सरकार
Tue, 15 Dec 2020 06:17 PM IST
संजीव कुमार झा
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Tue, 15 Dec 2020 06:17 PM IST
सार
- संतोष हेगड़े ने कहा- लोकतंत्र में विरोध टालने के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया में बदलाव जरूरी
- किसी भी कानून को बनाने के पहले संबंधित पक्षों से राय लेना, संसद में चर्चा होना जरूरी
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प्रसिद्ध वकील संतोष हेगड़े
विस्तार
शाहीन बाग मामले में गतिरोध टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से मध्यस्थ बनाए गए वरिष्ठ वकील संतोष हेगड़े ने कहा है कि लोकतंत्र में सरकार और लोगों के बीच बार-बार हो रहे टकराव को टालने के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया में बदलाव करना जरूरी है। कानून बनाने से पहले कानून से जुड़े सभी पक्षों से बातचीत की जानी चाहिए। इस पर संसद में भी चर्चा होनी चाहिए। इससे कानून और संविधान पर लोगों का भरोसा बढ़ेगा और लोकतंत्र मजबूत होगा। उन्होंने कहा कि राज्य हो या केंद्र उसे बार-बार अध्यादेश लाने से बचना चाहिए।
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आरोप है कि केंद्र सरकार ने नागरिकता कानून या कृषि कानून लाने से पहले इससे जुड़े किसी भी पक्ष से चर्चा नहीं की जिसके कारण इन कानूनों से प्रभावित लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर हो गए।
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संतोष हेगड़े ने अमर उजाला से कहा कि सरकार को कानून बनाने से पहले यह अवश्य सोचना चाहिए कि इसके बनने से समाज के किस वर्ग को परेशानी हो सकती है। अगर कानून बनाते समय ही उनके भरोसे को जीत लिया जाए तो कानून बनने के बाद होने वाली परेशानियों से बचा जा सकता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का अर्थ केवल लोगों के सिर गिनना नहीं होना चाहिए, इसकी बजाय सरकार को लोगों का दिल जीतना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि जब उन्होंने शाहीन बाग मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी, तब उन्होंने टकराव के बीच एक रास्ता निकालने की कोशिश की थी। उन्होंने महसूस किया था कि लोग चाहते थे कि सरकार उनसे बातचीत करे, मामले पर उनकी राय समझे और उनकी शंकाओं का दूर करे। शायद उनकी बातचीत की कोशिश का ही असर था कि दिल्ली दंगों के दौरान भी शाहीन बाग में कुछ गलत नहीं होने पाया।
हेगड़े के मुताबिक शाहीन बाग मामले में कई राजनीतिक दल सक्रिय थे। इसके बारे में किसी एक पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती। इस तरह के मामलों में अक्सर राजनीति हो जाती है। यहां तक कि शाहीन बाग के भी कई लोग इस आंदोलन के जरिए स्वयं अपने लिए राजनीतिक अवसर तलाश रहे थे।
कानून बनाने में जनता की भागीदारी क्यों नहीं?
सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य वकील अश्विनी उपाध्याय भी कानून बनाने की प्रक्रिया में बड़े बदलाव के समर्थक रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कानून बनाने की प्रक्रिया में बदलाव की भी मांग की है। अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि हमारा संविधान स्वयं कहता है कि इसे 'जनता के द्वारा, जनता के लिए' बनाया गया है, लेकिन वर्तमान प्रक्रिया में जनता की भागीदारी कानून बनाने में नहीं है। इसे कुछ अधिकारियों, मंत्रियों के द्वारा बना दिया जाता है। पर्याप्त समय पहले जानकारी न दिये जाने के कारण संसद में भी इस पर सार्थक चर्चा नहीं हो पाती क्योंकि सांसद भी इन कानून की बारीकियों के बारे में कुछ नहीं जानते होते हैं।
ऐसी होनी चाहिए प्रक्रिया
उन्होंने कहा कि कानून बनाने से पहले उसका ड्राफ्ट सरकार की वेबसाइट पर डाल दिया जाना चाहिए। इसके बाद 60 दिनों तक लोग उस पर अपनी प्रतिक्रिया या राय दे सकें, इसके लिए समय दिया जाना चाहिए। इससे देश के लोग सीधे अपने तौर पर, या अपने जनप्रतिनिधियों के जरिए उस पर अपनी राय रख सकेंगे। इससे सरकार यह जान सकेगी कि लोग इस कानून के बारे में क्या सोचते हैं। अगर ऐसा हो तो कानून बनने के बाद कानून के विरोध में डाली जाने वाली जनहित याचिकाओं की संख्या में भी कमी आ जाएगी।