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ट्रेन गैंगरेप पीड़िता को तीन लाख मुआवजा दे रेलवे : हाईकोर्ट
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यात्रियों की सुरक्षा रेलवे की जिम्मेदारी, निजी लोगों के अपराध का हवाला देकर नहीं बच सकता दायित्व
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम फैसले में भारतीय रेलवे को ट्रेन में गैंगरेप की पीड़िता को तीन लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहने के लिए रेलवे जिम्मेदार है।
न्यायमूर्ति अमित बंसल की एकल पीठ ने कहा कि रेलवे अधिनियम के तहत यह मामला अवांछित घटना की श्रेणी में आता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैध टिकट वाले यात्रियों को सुरक्षित यात्रा उपलब्ध कराना रेलवे का कानूनी दायित्व है। अपराध निजी व्यक्तियों ने किया हो, तब भी रेलवे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
मामला 27 अगस्त 2012 का है, जब बिहार में एक यात्री ट्रेन के डिब्बे में पीड़िता के साथ गैंगरेप हुआ था। इसके बाद पीड़िता के पिता ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में शिकायत दर्ज कराई। आयोग ने 2014 में पीड़िता को तीन लाख रुपये मुआवजा देने की सिफारिश की थी। इस सिफारिश को चुनौती देते हुए रेलवे ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया।
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रेलवे ने दलील दी कि अपराध निजी लोगों ने किया, ट्रेन उस समय खड़ी थी और कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। अदालत ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि रेलवे अधिनियम की धारा 123(सी) और 124ए के तहत रेलवे पर 'नो-फॉल्ट लायबिलिटी' लागू होती है। इसलिए घटना के लिए प्रत्यक्ष गलती सिद्ध न होने पर भी मुआवजा देना होगा। अदालत ने रेलवे की याचिका खारिज करते हुए जमा राशि ब्याज सहित दो सप्ताह के भीतर पीड़िता को जारी करने का निर्देश दिया।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम फैसले में भारतीय रेलवे को ट्रेन में गैंगरेप की पीड़िता को तीन लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहने के लिए रेलवे जिम्मेदार है।
न्यायमूर्ति अमित बंसल की एकल पीठ ने कहा कि रेलवे अधिनियम के तहत यह मामला अवांछित घटना की श्रेणी में आता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैध टिकट वाले यात्रियों को सुरक्षित यात्रा उपलब्ध कराना रेलवे का कानूनी दायित्व है। अपराध निजी व्यक्तियों ने किया हो, तब भी रेलवे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
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मामला 27 अगस्त 2012 का है, जब बिहार में एक यात्री ट्रेन के डिब्बे में पीड़िता के साथ गैंगरेप हुआ था। इसके बाद पीड़िता के पिता ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में शिकायत दर्ज कराई। आयोग ने 2014 में पीड़िता को तीन लाख रुपये मुआवजा देने की सिफारिश की थी। इस सिफारिश को चुनौती देते हुए रेलवे ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया।
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रेलवे ने दलील दी कि अपराध निजी लोगों ने किया, ट्रेन उस समय खड़ी थी और कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। अदालत ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि रेलवे अधिनियम की धारा 123(सी) और 124ए के तहत रेलवे पर 'नो-फॉल्ट लायबिलिटी' लागू होती है। इसलिए घटना के लिए प्रत्यक्ष गलती सिद्ध न होने पर भी मुआवजा देना होगा। अदालत ने रेलवे की याचिका खारिज करते हुए जमा राशि ब्याज सहित दो सप्ताह के भीतर पीड़िता को जारी करने का निर्देश दिया।