केजरीवाल ने कहा, देश की सामर्थ्यवान जनता ही राजनीतिक विकल्प देगी

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Updated Sat, 01 Aug 2020 12:50 PM IST
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अरविंद केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल - फोटो : अमर उजाला

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का साफ कहना है कि जनता ही देश को राजनीतिक विकल्प देगी। और जनता इसके लिए सामर्थ्यवान है। भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। विदेशों में भारतीय मेधा का सम्मान इसका उदाहरण है। उन्होंने कहा कि करीब छह साल दिल्ली के सीएम रहने के दौरान उन्हें अहसास है कि कितनी ज्यादा तरक्की की जा सकती थी, जो पहले नहीं हो पाई। आइये जानते हैं क्या कहते हैं विकास के मुददे पर केजरीवालः-
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2014 लोकसभा चुनाव में गुजरात मॉडल की चर्चा होती थी। दिल्ली का विकास मॉडल, जो आपने तैयार किया है, इसे देश के स्तर पर प्रसारित करने की कोई योजना है क्या?
देखिए, प्रचार-प्रसार तो अपने आप होता रहता है। दिल्ली के अंदर पांच साल में स्कूल ठीक हुए, अस्पताल ठीक हुए, मोहल्ला क्लीनिक बन गए, बिजली 24 घंटे आने लग गई, बिजली फ्री हो गई, पानी फ्री हो गया, इन सारी चीजों को पूरा देश देख रहा है। इसमें ज्यादा बताने की  जरूरत नहीं लगती। दिल्ली के अनुभव से मैं यही कहूंगा, कि हमारे देश ने जितनी तरक्की की है, उससे 100 गुना ज्यादा तरक्की कर सकता है। हमारे देश में काबिलियत थी। हमारे देश में सारे संसाधन हैं। किस चीज की कमी है। पहाड़ हैं, नदियां हैं, जंगल हैं, सारी जड़ी बूटियां हैं, सभी किस्म की फसलें हैं, दूसरे सारे संसाधन हैं, हमारे देश के लोग बुद्धिमान हैं, यही लोग विदेशों में गजब का काम करते हैं? इस सबके बावजूद अपना देश तरक्की क्यों नहीं कर पाया। अगर पांच साल में दिल्ली के स्कूल अच्छे हो सकते हैं तो पचास साल में देश के स्कूल अच्छे क्यों नहीं हो सकते।
जब इतना अच्छा काम हुआ है तो दूसरे राज्यों के लोगों को समझा क्यों नहीं पाते?
आज हमारे देश में राष्ट्रीय स्तर पर दो पार्टियां हैं, कांग्रेस और भाजपा। दोनों पार्टियों की क्या स्थिति है, वह राजस्थान में दिख रहा है। नैतिक मूल्य का पतना देखिये, राजस्थान में एक पार्टी जमकर विधायक खरीदने में लगी है तो दूसरी पार्टियों के विधायक बिक रहे हैं। मंडी में बैठे हैं दोनों। मतलब ऐसे समय में जब पूरा देश कोरोना से जूझ रहा है, चीन का संकट सामने खड़ा है, तब पूरे देश को एकसाथ संगठित होकर इनका मुकाबला करना चाहिए था।

क्या दूसरे राज्यों में चुनाव लड़ने की योजना है?
दूसरे कई राज्यों में अच्छा संगठन है और आप दिल्ली के अपने काम के दम पर चुनाव भी लड़ेगी। लेकिन सफलता मिलेगी या नहीं मिलेगी, यह केवल काम पर निर्भर नहीं करता है।

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यूपी में सक्रियता बढ़ी है आप की। कुछ योजना है क्या?
अभी यूपी के लिए यह निर्णय लिया गया है कि आने वाले समय में जो पंचायत के चुनाव होने हैं, पार्टी उसमें हिस्सा लेगी।

प्रधानमंत्री के प्रति इस बार आप नरम दिख रहे हैं?
ऐसा कुछ नहीं, मेरा पहला ध्येय है कि जिन लोगों ने हमें वोट दिया और भरोसा करके वोट दिया कि हम उनकी जिंदगी को सुधारेंगे, उनके लिए काम करना जरूरी है।

नई शिक्षा नीति को आप किस तरह देखते हैं?
नई शिक्षा नीति में कई अच्छी चीजें हैं। लेकिन नीति को लागू करने का कोई खाका नहीं है। अच्छी-अच्छी कई सारी बातें हैं, बयान हैं। यह लागू कैसे होगा, इस बारे में नीति में कुछ पता नहीं चलता।

क्या राज्यों से बात नहीं हुई थी?
राज्यों के पास जो ड्राफ्ट पॉलिसी आई थी, वह बिलकुल अलग थी, जो फाइनल पॉलिसी आई वह बिलकुल अलग है।

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चीन के साथ टकराव की स्थिति बनी हुई है जबकि कुछ दिन पहले ताल्लुकात बहुत अच्छे थे। कैसे देखते हैं?
समस्या यहीं है। 62 में भी चीन के साथ रिश्ते अच्छे थे, लेकिन चीन ने धोखा दिया। इस बार भी चीन के साथ रिश्ते अच्छे थे, चीन ने धोखा दिया। इससे हमें सबक लेने की जरूरत है। पड़ोसी होने के नाते दोस्ती का हाथ बढ़ाते रहना चाहिए, लेकिन उसी वक्त हमें सजगता भी बरतनी होगी। वो जैसे ही हटती है, उसका फायदा चीन उठाता है। इस समय सारा देश अपनी सेना के साथ खड़ा है। केंद्र सरकार के साथ खड़ा है। सारा देश चाहता है कि किसी भी कीमत पर जमीन हमें वापस चाहिए।

क्या उपराज्पाल से संबंध थोड़ा तल्ख हुए हैं वकीलों की नियुक्ति के मामले में?
देखिए, उपराज्यपाल से हमारे संबंध मधुर हैं। मुद्दों पर कभी-कभी मतभेद हो जाता है। वकीलों की नियुक्ति के मामले में भी यही हुआ है। मेरा मानना है कि दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा पैदा करने के लिए जो भी दोषी हैं, उन्हें सख्त सजा मिलनी चाहिए। निर्दोष को परेशान या दंडित नहीं किया जाना चाहिए। जहां तक पैनल की नियुक्ति का सवाल है दिल्ली पुलिस की जांच पर विभिन्न न्यायालयों की ओर से पिछले दिनों उंगली उठाई गई है। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायधीश सुरेश कुमार ने दिल्ली दंगे के संबंध में दिल्ली पुलिस पर टिप्पणी की थी ...दिल्ली पुलिस न्यायिक प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल कर रही है। ...सेशन कोर्ट ने भी दिल्ली पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए थे। इस स्थिति में दिल्ली पुलिस के वकीलों के पैनल को मंजूरी देने से दिल्ली दंगों की निष्पक्ष जांच पर संदेह था। इसके अलावा आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत है कि जांच पूरी तरह से अभियोजन से स्वतंत्र होनी चाहिए। दिल्ली पुलिस दंगों की जांच एजेंसी रही है, ऐसे में उनके वकीलों के पैनल को मंजूरी देने से निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। जांच एजेंसी को वकीलों को तय करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। वकीलों को जांच एजेंसी से स्वतंत्र होना चाहिए। पूरे देश और दुनिया में यह सिद्धांत सबसे अहम माना जाता है और इसका उल्लंघन दिल्ली में हुआ है।

क्या केंद्र सरकार का दबाव था?
बिलकुल, केंद्र सरकार के दबाव में उपराज्यपाल ने दिल्ली सरकार के वकीलों के पैनल को खारिज किया है।

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