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स्वतंत्रता दिवस: सुनहरी यादें... 1947 से अब तक आजादी के जश्न में शामिल होने वाली शख्सियतों ने साझा किए अनुभव
Thu, 15 Aug 2024 09:15 AM IST
विजय पुंडीर
संतोष कुमार, अमर उजाला, नई दिल्ली
संतोष कुमार, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: विजय पुंडीर
Updated Thu, 15 Aug 2024 09:15 AM IST
सार
15 अगस्त 1947 की सुबह न किसी का खौफ और न पीड़ा, बस जश्न का माहौल, सचमुच उस दिन दिल्ली जश्न में डूब गई। नन्हें हाथों से बच्चों ने दीवारों पर आजादी के गीत लिखे। ये वही बच्चे हैं, जो अब बुजुर्ग हो गए हैं। इनमें से करीब एक हजार लोगों ने 100 की उम्र पार कर ली है।
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Independence Day
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
वह गुलामी की पीड़ा थी, जिसने आजादी की जंग से देश का दिली रिश्ता कायम किया और आजादी हासिल कर लेने की खुशी राष्ट्रीय पर्व बन गई। 15 अगस्त 1947 की सुबह न किसी का खौफ और न पीड़ा, बस जश्न का माहौल, सचमुच उस दिन दिल्ली जश्न में डूब गई। नन्हें हाथों से बच्चों ने दीवारों पर आजादी के गीत लिखे। ये वही बच्चे हैं, जो अब बुजुर्ग हो गए हैं। इनमें से करीब एक हजार लोगों ने 100 की उम्र पार कर ली है।
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यह सवाल अलहदा है कि 1947 की इनकी यादें धुंधली हुई हैं, जुबान लड़खड़ाती है, सुनाई भी ऊंचा पड़ता है, लेकिन आजादी के जश्न की बात आते ही इनकी आंखों में चमक आ जाती है। अमर उजाला ने इन्हीं की यादों को कुरेदा है। पेश हैं रिपोर्ट....
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जश्न ए आजादी में घटी भागीदारी
अगस्त 1947 की सुबह हम सभी बच्चे स्कूल पहुंच गए। यह बताते हुए वहां टाफियां बांटी गई कि अब हम आजाद हो गए हैं। कई दोस्तों को तो स्कूल में ही आजादी मिलने का पता पहली बार चला। इसके बाद हर साल स्कूल में बच्चे प्रभात फेरियां निकालते। सबके हाथ में तिरंगा होता। जगह-जगह मिठाइयां-बताशे बांटे जाते थे। 1961 में पहली बार लाल किले के जश्न में शामिल हुआ। सुरक्षा का कोई तामझाम नहीं था। आसानी से मुख्य आयोजन स्थल तक पहुंचना संभव था। उस दिन बारिश भी हुई थी। फिर भी, हम सभी डटे रहे। ऐसा कई सालों तक चलता रहा। लेकिन आज सुरक्षा का बहुत ताम-झाम है। आम लोगों की भागीदारी इसमें घटती जा रही है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में सभी को भागीदार बनना चाहिए। -जयदेव कृष्णावत, भारतीय सेना से सेवानिवृत्त स्टोर सुपरिंटेंडेंट, मादीपुर गांव'
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दीवारों पर नारे लिखे, रात में निकाला जुलूस
जादी के समय उनकी उम्र 9-10 वर्ष थी। घर पर जब आजादी मिलने की बात पता लगी तो भाइयों के साथ बाहर निकल पड़ी। हमने तय किया कि गलियों में आजादी के नारे लिखने हैं। रंग व कालिख जुटाई और रात में ही दीवारों को नारों से रंग दिया। रात भर गांव में सबकी जुबान पर आजादी मिलने की ही बात थी। याद पड़ता है कि घर के बड़ों ने मिलकर तय किया कि सुबह सब जश्न मनाएंगे। फिर क्या था? सुबह का इंतजार कौन करता। 14 अगस्त की रात दो बजे ही निकल पड़े। घर के बाहर देखा तो काफी लोग नारे लगाते हुए जुलूस के रूप में जा रहे थे। उनके साथ ही जुलूस में शामिल हो गए। दिन भर भागदौड़ ही चलती रही। पहली बार सबने अपने-अपने हिसाब से खुशी का इजहार किया। बाद के आयोजन योजना के अनुसार होने लगे। -रामरती यादव, नांगलोई सईदान
पहले दिन की यादें सुनहरी हैं...
पंद्रह अगस्त की सुबह हमने आजाद हिंदुस्तान में सांस ली थी। उस वक्त मेरी उम्र 14 साल के करीब थी। उस दिन तड़के ही नींद खुल गई। पहले पिताजी के साथ यमुना में स्नान किया। वहां से लौटने तक लाल किले के सामने करीब 200 लोग जमा थे। प्रधानमंत्री के आने से पहले पुरुषों और महिलाओं ने प्रभात फेरियां निकालीं। ढोल-मजीरा बजाते, आजादी के तराने गाते-गाते सब आगे बढ़ रहे थे। याद आता है, चांदनी चौक में मियां करीम की दुकान का छप्पर। जहां शाम को मुफ्त में भोजन परोसा गया। ऊंची मजार पर देर रात तक महफिल सजी। मैदान की गुफ्तगूं भी याद आती है। आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाए जाते। -लाला श्याम लाल, मालीवाड़ा, नई सड़क, चांदनी चौक
जादी के समय उनकी उम्र 9-10 वर्ष थी। घर पर जब आजादी मिलने की बात पता लगी तो भाइयों के साथ बाहर निकल पड़ी। हमने तय किया कि गलियों में आजादी के नारे लिखने हैं। रंग व कालिख जुटाई और रात में ही दीवारों को नारों से रंग दिया। रात भर गांव में सबकी जुबान पर आजादी मिलने की ही बात थी। याद पड़ता है कि घर के बड़ों ने मिलकर तय किया कि सुबह सब जश्न मनाएंगे। फिर क्या था? सुबह का इंतजार कौन करता। 14 अगस्त की रात दो बजे ही निकल पड़े। घर के बाहर देखा तो काफी लोग नारे लगाते हुए जुलूस के रूप में जा रहे थे। उनके साथ ही जुलूस में शामिल हो गए। दिन भर भागदौड़ ही चलती रही। पहली बार सबने अपने-अपने हिसाब से खुशी का इजहार किया। बाद के आयोजन योजना के अनुसार होने लगे। -रामरती यादव, नांगलोई सईदान
पहले दिन की यादें सुनहरी हैं...
पंद्रह अगस्त की सुबह हमने आजाद हिंदुस्तान में सांस ली थी। उस वक्त मेरी उम्र 14 साल के करीब थी। उस दिन तड़के ही नींद खुल गई। पहले पिताजी के साथ यमुना में स्नान किया। वहां से लौटने तक लाल किले के सामने करीब 200 लोग जमा थे। प्रधानमंत्री के आने से पहले पुरुषों और महिलाओं ने प्रभात फेरियां निकालीं। ढोल-मजीरा बजाते, आजादी के तराने गाते-गाते सब आगे बढ़ रहे थे। याद आता है, चांदनी चौक में मियां करीम की दुकान का छप्पर। जहां शाम को मुफ्त में भोजन परोसा गया। ऊंची मजार पर देर रात तक महफिल सजी। मैदान की गुफ्तगूं भी याद आती है। आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाए जाते। -लाला श्याम लाल, मालीवाड़ा, नई सड़क, चांदनी चौक